हिमाचल प्रदेश के लोगों को सुप्रीम कोर्ट से राहत, इन पेड़ों की कटाई पर अब नहीं कोई रोक
परमेश्वर ने बताया कि शीर्ष अदालत में इस तरह के पेड़ों को काटने के लिए याचिकाएं आमतौर पर सर्दियों के मौसम के बाद बड़ी संख्या में दायर की जाती हैं और न्यायालय ने पूर्व में राज्यों को इस तरह की मंजूरी देने के लिए एक समिति गठित करने का निर्देश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हिमाचल प्रदेश के लोगों को राहत देते हुए स्पष्ट किया कि राज्य में निजी भूमि पर सूखे, गिरे हुए, फफूंद से प्रभावित और सड़े हुए खैर के पेड़ों को काटने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। खैर के पेड़ पान में इस्तेमाल होने वाले 'कत्थे' और उच्च गुणवत्ता वाली लकड़ी के उत्पादन के लिहाज से महत्वपूर्ण होते हैं, और आमतौर पर ये पेड़ हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर तथा उत्तराखंड के कुछ हिस्सों के पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
पीठ ने बताया आदेश में दो बार हो चुका संशोधन
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पर्वतीय राज्य में पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगाने वाली शीर्ष अदालत के 1996 के आदेश में 16 फरवरी 2018 और 10 मई 2023 को पहले ही संशोधन किया जा चुका है, जिससे खैर के पेड़ों की कटाई की अनुमति मिल गई है।
हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप करने से कर दिया था इनकार
इस मामले में अदालत मित्र नियुक्त किए गए वरिष्ठ अधिवक्ता के.परमेश्वर ने बताया कि हाई कोर्ट ने यह कहते हुए मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था कि मामला उच्चतम न्यायालय में लंबित है। पीठ ने उल्लेख किया कि याचिकाकर्ताओं ने पहले खैर के सूखे पेड़ों को काटने की अनुमति के लिए जिला वन अधिकारी से संपर्क किया था और अनुमति न मिलने पर उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया था। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने निजी जमीनों पर ऐसे पेड़ों की कटाई के संबंध में स्पष्टीकरण के लिए शीर्ष अदालत का रुख किया।
आमतौर पर सर्दियों में आती है ऐसी याचिकाएँ
परमेश्वर ने कहा कि शीर्ष अदालत में इस तरह के पेड़ों को काटने के लिए याचिकाएं आमतौर पर सर्दियों के मौसम के बाद बड़ी संख्या में दायर की जाती हैं और न्यायालय ने पूर्व में राज्यों को इस तरह की मंजूरी देने के लिए एक समिति गठित करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश्वर सूद ने बताया कि राज्य ने अभी तक ऐसी कोई समिति गठित नहीं की है और न ही उन्हें नियंत्रित करने वाले कोई नियम हैं।
जबकि पीठ ने ऐसी समिति के गठन के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार को 10 मई, 2023 के अपने पूर्व निर्देश का पालन करने का निर्देश दिया था, ताकि ऐसे पेड़ों की कटाई से संबंधित अनुमति को लेकर कार्रवाई की जा सके। उच्चतम न्यायालय ने साल 2018 में आदेश दिया था कि खैर के पेड़ों की कटाई सीधे वन विभाग या हिमाचल प्रदेश राज्य वन निगम द्वारा की जानी चाहिए, और कटाई का काम किसी भी निजी एजेंसी को नहीं सौंपा जाना चाहिए, या ठेके पर नहीं दिया जाना चाहिए।
इसमें कहा गया था कि वन विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पेड़ों की कटाई वाले प्रत्येक क्षेत्र की वीडियोग्राफी नियमित अंतराल पर अलग से की जाए ताकि कटाई से पहले, कटाई के दौरान और कटाई के बाद जंगल की स्थिति और दशा को स्पष्ट रूप से दर्शाया जा सके।
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