खराब माली हालत से जूझ रहा हिमाचल, सुक्खू सरकार 700 करोड़ रुपये का और कर्ज उठाएगी
खराब माली हालत से जूझ रहे हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार को अपनी वित्तीय जरूरतें पूरी करने के लिए एक बार फिर कर्ज का सहारा लेना पड़ रहा है। राज्य सरकार 700 करोड़ रुपये का नया ऋण उठाएगी। यह रकम तय देनदारियों और विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल की जाएगी।

खराब माली हालत से जूझ रहे हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार को अपनी वित्तीय जरूरतें पूरी करने के लिए एक बार फिर कर्ज का सहारा लेना पड़ रहा है। राज्य सरकार 700 करोड़ रुपये का नया ऋण उठाएगी। यह रकम तय देनदारियों और विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल की जाएगी। वित्त विभाग ने शनिवार देर शाम इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी।
कितना लगेगा ब्याज
सरकार यह ऋण 7.56 प्रतिशत सालाना ब्याज की दर पर लेगी। ऋण उठाने के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी भी मिल चुकी है। संविधान के अनुच्छेद 293(3) के तहत राज्य सरकार को कर्ज लेने के लिए केंद्र की सहमति जरूरी होती है।
हिमाचल की वित्तीय स्थिति पिछले कुछ समय से सरकार के लिए बड़ी चिंता बनी हुई है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू कई मौकों पर राज्य पर बढ़ते वित्तीय दबाव का मुद्दा उठा चुके हैं। चालू वित्त वर्ष से केंद्र सरकार की ओर से राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद होने से राज्य की मुश्किलें बढ़ी हैं। हिमाचल सरकार के अनुसार आरडीजी बंद होने से राज्य को हर साल आठ हजार करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है।
आरडीजी ना बंद होता तो...
मुख्यमंत्री सुक्खू यह भी कह चुके हैं कि अगर केंद्र सरकार की ओर से आरडीजी बंद नहीं किया जाता तो हिमाचल वर्ष 2027 तक पूरी तरह आत्मनिर्भर बन जाता। उन्होंने आरडीजी के मुद्दे को राज्य के वित्तीय अधिकारों से भी जोड़ा है।
क्या-क्या हैं चुनौतियां
गौरतलब है कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में राजस्व जुटाने के साधन सीमित हैं। दूसरी ओर सरकार पर कर्मचारियों के वेतन और पेंशन के साथ कर्ज की किस्त और उस पर ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी है। इन तय देनदारियों को पूरा करने के साथ विकास कार्यों के लिए धन जुटाना भी सरकार के सामने चुनौती बनी हुई है।
पुरानी पेंशन योजना यानी ओपीएस बहाल किए जाने के बाद केंद्र सरकार ने हिमाचल प्रदेश की कर्ज लेने की सीमा भी तय की है। इससे राज्य के लिए अतिरिक्त कर्ज जुटाने की गुंजाइश सीमित हुई है। राज्य सरकार का कुल कर्ज भी एक लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर चुका है।
केंद्र से मिलने वाली सीमित वित्तीय सहायता और राज्य की सीमित आय के बीच सरकार को अपनी नियमित वित्तीय जिम्मेदारियां पूरी करनी पड़ रही हैं। वेतन, पेंशन, कर्ज की अदायगी और ब्याज भुगतान जैसे खर्च लगातार बने हुए हैं। इसी वित्तीय दबाव के बीच 700 करोड़ रुपये का नया ऋण उठाने का फैसला किया गया है।
रिपोर्ट : यूके शर्मा


