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गंभीर मामला हो सकता है कान में दर्द, जानें क्यों होता है कान में दर्द

pain in ear

कई बार घरेलू उपचार से ठीक करने की कोशिशों में कान से जुड़ी समस्याएं बहरेपन का कारण बन जाती हैं। ज्यादा दिन तक कान दर्द की अनदेखी करना सही नहीं। क्या करें, जानें... 

दो या तीन दिन से ज्यादा कान दर्द रहने पर डॉक्टर से संपर्क करना ही बेहतर है। सफदरजंग अस्पताल के ई.एन.टी सर्जन व प्रो. डॉ. सुधीर मांझी बताते हैं,‘कान के मध्य से लेकर गले के पीछे मौजूद यूस्टेकियन ट्यूब के अवरुद्ध होने से अकसर कान में दर्द होने लगता है। कान के मध्य में सूजन या संक्रमण होने लगता है, जिससे दर्द होता है। कान में फुंसी होना, वैक्स का बहुत ज्यादा या कम बनना आदि सामान्य समस्याएं लापरवाही करने पर बहरेपन तक ले जा सकती है। 

कान दर्द दो तरह से होता है। एक, जब कान के बाहरी या अंदरूनी हिस्से में गड़बड़ी के कारण दर्द होता है। दूसरा, जब शरीर के अन्य  हिस्से में हुई समस्या जैसे दांत में दर्द  या गला खराब होने पर कान में दर्द होता है। 

ये हो सकते हैं कारण 

यूस्टेकियन ट्यूब में अवरोध : कान एक नली से नाक के पिछले व गले के ऊपरी हिस्से से जुड़ा होता है। साइनस और टॉन्सिल होने पर इसी कारण कान के भीतर दर्द महसूस होता है। कान में सूजन आ जाती है और यूस्टेकियन ट्यूब बंद होने लगती है। कान में मवाद बनने लगता है, जो कान के पर्दे को नुकसान पहुंचाता है। इसके अलावा जब  महिलाएं छोटे बच्चों को करवट से लिटा कर दूध पिलाती हैं, तो कई बार दूध मध्य कान में पहुंच जाता है और संक्रमण पैदा कर देता है। कान में दर्द ,सूजन ,या कान से मवाद निकलना इसके लक्षण हैं। 

कान में मैल जमा होना : जिन लोगों की त्वचा बहुत तैलीय होती है, उनको वैक्स की परेशानी ज्यादा होती है। वैक्स नाखून की तरह बढ़ता है। इसके निकलने के कुछ दिनों बाद ही यह फिर से बनने लगता है। ज्यादा समय तक वैक्स जमा रहने से वह सख्त हो जाता है और कैनाल को ब्लॉक कर देता है। इस कारण कान में दर्द होता है और कम सुनाई देने लगता है। 

ओटाइटिस  मीडिया : यह कान के मध्य में होने वाला संक्रमण है। बच्चों को ज्यादा होता है। डब्ल्यू एचओ के अनुसार दो हफ्ते से अधिक संक्रमण रहने पर उसे क्रॉनिक इन्फेक्शन माना जाता है। यह बहरेपन का खतरा बढ़ाता है, पर यह ठीक हो सकता है।  संक्रमण के आम कारणों में सर्दी या फ्लू का वायरस, धूल से एलर्जी शामिल हैं। इसमें तेज बुखार, कान में दर्द, सुनने में कठिनाई या कान से पस निकलता है।   

कान के पर्दे का चोटिल होना : कान की भीतरी ट्यूब बेहद संवेदनशील होती है। हल्का सा अधिक दबाव पड़ने पर यह ट्यूब चोटिल हो जाती है, जिससे दर्द होने लगता है।  कान से पस भी निकलने लगता है। ज्यादा समय तक यह समस्या रहने से आस-पास की हड्िडयां गलने लगती है। बैरोट्रॉमा की समस्या, सिर पर गंभीर चोट, बहुत तेज आवाज, ओटाइटिस मीडिया, मध्य कान में संक्रमण जैसे कारण भी पर्दे को नुकसान पहुंचाते हैं। 

साइनस संक्रमण : यह संक्रमण वायरस, बैक्टीरिया या फंगस से हो सकता है। साइनस में संक्रमण होने या अवरोध होने से कान में हवा का दबाव प्रभावित होता है, जिससे दर्द होने लगता है। 

ऑटोमीकोसिस : बारिश के मौसम में कान में फंगल इन्फेक्शन हो सकता है। यह उमस के कारण हो जाता है। इसके मरीज को सीधे कूलर के सामने नहीं सोना चाहिए। इसमें  तेज दर्द और खुजली होती है।

ईयर बैरोट्रॉमा : इसके तहत बाहरी दबाव के कारण कान का अंदरूनी भाग चोटिल हो जाता है। बाहरी दबाव हवा या पानी का दबाव हो सकता है। इयर बैरोट्रॉमा आमतौर पर स्काई डाइविंग, स्कूबा डाइविंग या हवाई जहाज उड़ानों के दौरान अनुभव होता है। हवा के बुलबुले लगातार कान के भीतरी दबाव से संतुलन बनाने के लिए हलचल करते रहते हैं। बैरोट्रॉमा के कारणों में गले में सूजन, एलर्जी से नाक का बंद होना, श्वसन संक्रमण, दबाव में अचानक परिवर्तन शामिल हैं। मधुमेह रोगियों को खास एहतियात की जरूरत होती है। 

कैसे बचाव करें
- कानों को बार-बार न धोएं। पिन, तिल्ली, चाबी आदि कान में ना डालें। 
- अच्छी क्वालिटी का हेड फोन इस्तेमाल करें। लगातार तेज आवाज में हेड फोन लगाकर सुनने से बचें।
- त्वचा व बालों के उत्पाद अच्छी क्वालिटी के इस्तेमाल करें। 
- तैराकी करते हुए कान में पानी न जाने दें। कान दर्द है तो तैराकी न करें। 
- मांसपेशियों को सक्रिय रखने के लिए नियमित प्राणायाम आदि व्यायाम करें। 
- कान में वैक्स बहुत बनती है तो हर चार माह बाद डॉक्टर से सफाई करवाएं। 
- कान में हल्का दर्द है तो शुरुआती उपचार के तौर पर ठंडे पानी के कपड़े से कान के बाहरी हिस्से पर सेंक दें।  
- दवा डॉक्टर की सलाह से ही लें। 

दीपिका शर्मा

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