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Measles Immunization Day 2019 : खसरे का खतरे को समझना भी है जरूरी 

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में खसरे के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। देश में पोलियो के समान खसरा मुक्ति के लिए भी अभियान स्तर पर कार्य जारी हैं। कैसे करें अपना बचाव, बता रही हैं स्वाति गौड़ 

बचपन में हुए खसरे यानी मीजल्स की बुरी और कष्टदायी यादें मन में ताउम्र रहती हैं। पूरे शरीर पर छोटे-बड़े सफेद व लाल चकत्ते निकल आना, तेज बुखार, सुस्ती, नाक बहना, आंखें लाल, खान-पान पर पाबंदी और घर से निकलना भी बंद। जाहिर है बच्चे और अभिभावक, दोनों के लिए समय परेशानी भरा होता है। खसरा, आमतौर पर बचपन में ही होता है। 

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में खसरे से होने वाली मौतों का आंकड़ा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। साल 2015 में खसरे से विश्वभर में 1 लाख 34 हजार लोगों की मौत हो गयी थी। इनमें से करीब 36 प्रतिशत, यानी लगभग  49,200 मौतें अकेले भारत में हुई थीं। इसे देखते हुए भारत सरकार की ओर से पोलियो की तरह ही अब खसरा मुक्त भारत अभियान पर भी कार्य किया जा रहा है, जिसके तहत साल 2020 तक देश को खसरा मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि खसरे के प्रति जागरूकता और सही समय पर उठाए गये कदम से भी इस बीमारी के प्रकोप को कम किया जा सकता है।  

क्या होता है खसरा  
यह एक संक्रामक रोग है, जो संक्रमित व्यक्ति के छींकने, खांसने, छूने, जूठा खाना खाने आदि से फैलता है। इसका वायरस गले और नाक में पाया जाता है। यदि यह संक्रमण गर्भावस्था के दौरान हो जाये तो शिशु के लिए जानलेवा भी हो सकता है। खसरा दो प्रकार का होता है। 

’पहला है मीजल्स जो कि रुबिओला नामक वायरस से फैलता। ’दूसरा है जर्मन मीजल्स, जो रुबैला नामक वायरस से फैलता है। इसका अंदेशा अजन्मे शिशुओं में ज्यादा होता है। 

दरअसल, जब संक्रमित व्यक्ति छींकता या खांसता है तो उसके मुंह या नाक से निकलने वाले वायरस (विषाणु) हवा में फैल जाते हैं, जो स्वस्थ्य व्यक्ति को अपनी चपेट में ले लेते हैं। एक बार  जब खसरे का वायरस शरीर के अंदर प्रवेश कर लेता है, तो यह सांस की नली, फेफड़ों और त्वचा के साथ-साथ शरीर के बाकी अंगों को भी संक्रमित कर देता है। 

खसरे का खतरा कुपोषण के शिकार बच्चों और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को ज्यादा होता है। हालांकि सही उपचार मिलने पर 7-10 दिन के भीतर यह ठीक हो जाता है।  

टीकाकरण है जरूरी 
खसरे से बचाव का सुरक्षित व कारगर उपाय, टीकाकरण है, जिसे मीजल्स-मम्स-रूबैला वैक्सीन (एमएमआर)के नाम से जाना जाता है। खसरे का पहला टीका बच्चे को 12 से 15 माह की उम्र के बीच दिया जाता है। दूसरा टीका 4 से 6 साल की उम्र के बीच लगाते हैं। यदि निश्चित आयु पर टीका ना लगवाया गया हो तो बाद में जरूर लगवा लेना चाहिए।

ना करें नजरअंदाज  

आमतौर पर खसरे के लक्षण संक्रमण के 10 या 12 दिन बाद दिखाई देने लगते हैं, जिसमें तेज बुखार, नाक बहना, आंखें लाल हो जाना, आंखों में जलन, खांसी होना शरीर पर छोटे-छोटे लाल चकत्ते होना शामिल है। इसके अलावा मुंह के अंदर वाले हिस्से में छोटे-छोटे सफेद दाग बन जाते हैं। शुरुआत में यह चकत्ते मुंह तथा गर्दन के ऊपरी हिस्से पर होते हैं, जो धीरे-धीरे शरीर के निचले हिस्सों पर भी फैलने लगते हैं। खसरे में यदि खांसी हो जाए तो वह करीब दो सप्ताह तक बनी रहती है। बच्चों को खसरा होने पर कभी-कभी उन्हें कान का संक्रमण, निमोनिया, डायरिया और उल्टी की समस्याएं भी हो सकती हैं। कुछ जटिल स्थितियों में दिमाग को भी नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे मरीज की मौत भी हो सकती है। 

(हमारे विशेषज्ञ: डॉ. आलोक कुमार द्विवेदी, सलाहकार-बाल रोग विशेषज्ञ, क्लाउड नाइन हॉस्पिटल, नोएडा से बातचीत पर आधारित।)

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