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International Epilepsy Day 2019 : सही समय पर समझ में आ जाए तो लाइलाज नहीं है मिर्गी

ज्यादा देखभाल और सहानुभूति की होती है जरूरत
ज्यादा देखभाल और सहानुभूति की होती है जरूरत

मिर्गी भी दूसरे रोगों की तरह ही एक रोग है। समय पर उचित उपचार मिल जाए तो रोगी पूरी तरह ठीक होकर सामान्य जीवन जी सकता है। 11 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मिर्गी दिवस के मौके पर मिर्गी के उपचार व उससे जुड़े मिथकों की जानकारी दे रही हैं शमीम खान 

मानसिक रोगियों को शारीरिक रोगियों के मुकाबले ज्यादा देखभाल और सहानुभूति की जरूरत होती है, लेकिन होता इसके उलट है। मिर्गी रोगियों को भारत में ही नहीं दुनियाभर में कई सामाजिक भेदभावों व समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अधिकतर लोगों को रोग की जानकारी ही नहीं है। इंडियन एपिलेप्सी एसोसिएशन  के अनुसार दुनियाभर में करीब 5 से 6 करोड़ लोग मिर्गी से पीड़ित हैं। अकेले भारत में ही इनकी संख्या करीब 1 से 2 करोड़ है। 

हमारे देश में औसतन प्रति हजार में से 5-6 लोग इस रोग से पीड़ित हैं। भारत में तो 70 फीसदी रोगियों को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार उचित इलाज ही नहीं मिल पाता। हालांकि देश में मिर्गी रोगियों की संख्या प्रति वर्ष पांच लाख की दर से बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, प्रतिवर्ष 25 लाख लोग इसकी चपेट में आ जाते हैं। 
 

मिर्गी के दौरे
मिर्गी के दौरे

जो दौरे किसी विशेष प्रेरक जैसे तेज बुखार, शराब या बीपी कम होने के कारण नहीं पड़ते, उन्हें मिर्गी कहा जाता है। इसमें दौरे बार-बार पड़ते हैं। जब मस्तिष्क में स्थायी रूप से परिवर्तन हो जाता है और मस्तिष्क असामान्य संकेत भेजता है, तब मिर्गी के दौरे पड़ते हैं। इससे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली गड़बड़ा जाती है, जिससे व्यक्ति के ध्यानकेंद्रन की क्षमता और व्यवहार बदल जाता है। हालिया शोधों में यह बात सामने आई है कि सिर्फ 15 फीसदी मामलों में ही इस रोग का कारण पारिवारिक इतिहास होता है, जो पुरानी अवधारणा के विपरीत है। वैसे अधिकतर में 5 से 20 की उम्र में इसके लक्षण दिख जाते हैं। पर कुछ को बाद में भी यह बीमारी हो सकती है।

लक्षण 
इस बीमारी के लक्षण इस पर निर्भर करते हैं कि मस्तिष्क का कौन-सा भाग इससे प्रभावित हुआ है और यह गड़बड़ी किस तरह से मस्तिष्क के बाकी भागों में फैल रही है।  यह लक्षण सभी में अलग हो सकते हैं। मिर्गी का सबसे प्रमुख लक्षण है जागरूकता और चेतना की कमी। शरीर की गति, संवेदनाएं  और मूड आदि प्रभावित होना भी है। कुछ लोगों को विचित्र अनुभूतियां होती हैं, जैसे शरीर में झुनझुनाहट होना, उस गंध को सूंघना, जो वास्तव में वहां होती ही नहीं है, या भावनात्मक बदलाव। इसके अलावा चाल गड़बड़ा जाना, देखने, सुनने और स्वाद को पहचानने में गड़बड़ी, मूड खराब होना और बेहोशी जैसे लक्षण भी दिखाई देते हैं।

कारण

  • गिरने से सिर पर गहरी चोट लग जाना। 
  • स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर, डिमेंशिया और अल्जाइमर्स जैसी बीमारियां। संक्रमण जैसे मेनिन्जाइटिस, मस्तिष्क में फोड़ा हो जाना और एड्स। 
  • जन्मजात मानसिक समस्याएं। 
  • भावनात्मक दबाव व नींद की कमी।
  • गर्भावस्था के दौरान कुछ जटिलताएं हो जाना। 
  • अत्यधिक शराब का सेवन। 
  • मस्तिष्क की रक्त कोशिकाओं की असामान्यता

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जांच व उपचार 
जांच व उपचार 

मिर्गी का पता लगाने के लिए शारीरिक जांच के साथ ही मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की गहन जांच की जाती है। इसकी सबसे प्रमुख जांच ईईजी (इलेक्ट्रोएनसेफैलोग्राम) है,  जिसमें मस्तिष्क की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी को जांचा जाता है। जो लोग मिर्गी से पीड़ित होते हैं, उनमें मस्तिष्क की गतिविधियां असामान्य पाई जाती हैं। वैसे दौरा खत्म होने के बाद या दो दौरों के बीच में मस्तिष्क सामान्य हो जाता है। मस्तिष्क के प्रभावित हिस्से को जानने के लिए विशेषज्ञ सीटी स्कैन या एमआरआई भी करवा सकते हैं। 

मिर्गी के बारे में जानकारी होते ही सही उपचार की कोशिश की जानी चाहिए। दवाओं, खासकर एंटीकॉन्व्युलसैंट ड्रग्स से उपचार संभव है। सही उपचार में देरी और लापरवाही नहीं करनी चाहिए। आमतौर पर इसका उपचार, दौरे कितने गंभीर हैं, कितने अंतराल में पड़ते हैं, रोगी की उम्र, सेहत व मेडिकल हिस्ट्री पर निर्भर करता है। मस्तिष्क की सर्जरी भी दौरे खत्म करने के लिए सर्वश्रेष्ठ विकल्प हो सकती है।  

रिसेक्टिव सर्जरी
यह मिर्गी का उपचार करने के लिए सबसे अधिक प्रचलित सर्जरी है। इस सर्जरी में, सर्जन रोगी के मस्तिष्क के उस भाग को निकाल देता है, जहां दौरे पड़ते हैं। रिसेक्टिव सर्जरी का सबसे सामान्य प्रकार टेम्पोरल लोबेक्टोमी है। यह मिर्गी के उपचार में सबसे कारगर सर्जरी है। इससे दौरे पड़ने की संख्या को कम करने में सहायता मिलती है, साथ ही मस्तिष्क के स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त होने की आशंका कम हो जाती है। 

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डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन (डीबीएस) थेरेपी
डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन (डीबीएस) थेरेपी

डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन (डीबीएस) थेरेपी एक सर्जिकल उपचार है। यह उस स्थिति में असरदार है, जिन्हें दवाओं से नियंत्रित करना संभव नहीं है। यह उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी है, जिनके रोग की स्थिति गंभीर है और सर्जरी से मस्तिष्क के उस भाग को निकालना संभव नहीं है, जो मिर्गी का कारण हैं। डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन (डीबीएस) में, सर्जन मस्तिष्क के विशेष भाग में इलेक्ट्रोड्स आरोपित कर देता है। इन इलेक्ट्रोड्स को जेनरेटर से जोड़ दिया जाता है, जिसे कॉलर बोन के पास छाती में आरोपित किया जाता है, जो मस्तिष्क को विद्युतीय स्पंदन भेजता है और दौरे पड़ना पूरी तरह बंद हो जाते हैं। डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन द्वारा उपचार कराने का सुझाव उन लोगों को दिया जाता है, जिन्हें दौरे अधिक पड़ते हैं। कई बार दौरों की संख्या एक दिन में 15 से ज्यादा बढ़ जाती है। 

मिर्गी पीड़ित ध्यान रखें

  • संतुलित भोजन और पर्याप्त नींद लें। 
  • एल्कोहल और अन्य नशीली दवाएं, जो ट्रिगर का काम करती हैं, उनसे दूर रहें। 
  • हमेशा मेडिकल अलर्ट ब्रेसलेट पहनें, ताकि दौरा पड़ने पर उसका उपचार किया जा सके। 
  • मिर्गी रोगी गाड़ी न चलाएं। वैसे मिर्गी रोगियों को लाइसेंस जारी करने के हर राज्य के अपने नियम हैं। 
  • ऐसे लोगों को ऊंचे स्थानों पर नहीं चढ़ना चाहिए या अकेले तैरने नहीं जाना चाहिए।  
  • भारी मशीनों पर काम नहीं करना चाहिए। 
  • हमेशा अपनी दवाएं साथ रखनी चाहिए। 

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रोग से जुड़ी गलतफहमियां 
रोग से जुड़ी गलतफहमियां 

इस बीमारी के साथ सबसे दुखद यह है कि इससे पीड़ित तीन-चौथाई लोगों को उचित उपचार ही नहीं मिल पाता। हमारे देश में मिर्गी के 70 प्रतिशत मरीज गांवों में रहते हैं, जहां बड़ी संख्या में अभी भी लोग इसे बुरी आत्मा का प्रभाव मानने के कारण रोगी और उसके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर देते हैं। कई लोग भूत-प्रेत भगाने वालों या तांत्रिकों के चक्कर लगाने लगते हैं, जिससे रोग और भी गंभीर हो जाता है। यह धारणाएं पूरी तरह बेबुनियाद और गलत हैं। यह रोग मस्तिष्क की गड़बड़ी के कारण होता है। चूंकि मस्तिष्क इलेक्ट्रोकेमिकल एनर्जी का उपयोग करता है, इसलिए मस्तिष्क की इलेक्ट्रिक प्रॉसेस में कोई भी अवरोध उसकी कार्यप्रणाली को असामान्य बना देता है। कई मिथक इस प्रकार हैं... 

मिथक और तथ्य 
मिथक: मिर्गी ऊपरी हवा या जादू-टोने के कारण होती है।
तथ्य: मिर्गी का जादू-टोने या भूत-प्रेत से कोई संबंध नहीं है। मिर्गी एक मेडिकल समस्या है। यह एक मानसिक रोग है, जो मस्तिष्क में शॉर्ट सर्किट होने से होता है, जिसके कारण पीड़ित को दौरे 
पड़ते हैं।    

मिथक: मिर्गी एक गंभीर संक्रामक रोग है।
तथ्य: मिर्गी एक संक्रामक रोग नहीं है और यह रोगी व्यक्ति के संपर्क में आने से नहीं फैलता है। इस रोग से पीड़ित लोग सामान्य वैवाहिक जीवन जी सकते हैं। यह रोग शारीरिक संबंधों से नहीं फैलता है। इस रोग के मां से बच्चों में होने की आशंका केवल 5 फीसदी होती है।  

मिथक: मिर्गी एक जन्मजात आनुवंशिक रोग है।
तथ्य: किसी को किसी भी समय मिर्गी रोग हो सकता है। कुछ में यह जन्मजात होता है तो कुछ में वयस्क होने पर पहला दौरा पड़ता है। हालांकि आनुवंशिकता एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन मिर्गी के दूसरे प्रमुख कारण भी हैं, जैसे सिर में लगी गहरी चोट, ब्रेन ट्यूमर और स्ट्रोक। अधिकतर मामलों (लगभग 65-70%) में रोग के कारणों का पता नहीं है। 

मिथक: मिर्गी से बुद्धिमत्ता प्रभावित होती है।
तथ्य: जिन लोगों को मिर्गी होती है उनका आईक्यू लेवल भी उतना ही होता है, जितना सामान्य लोगों का होता है। हां, इस रोग से पीड़ित लोगों को सीखने में परेशानी हो सकती है। दवाओं के कारण उनमें उनींदापन व थकान भी बढ़ती है।  

मिथक: मिर्गी गंभीर रोग है, जिसमें बार-बार दौरे पड़ते हैं।
तथ्य: कई लोगों को बार-बार दौरे पड़ते हैं, किसी को रोज, तो किसी को साल में एक बार। कुछ लोग बेहतर तरीके से इसका प्रबंधन कर लेते हैं, जिससे उन्हें लंबे समय तक दौरा नहीं पड़ता है। हालांकि कई लोगों में उपचार के बाद भी बार-बार दौरे पड़ते हैं। मिर्गी प्रत्येक रोगी को अलग-अलग प्रकार से प्रभावित करती है।   

मिथक: मिर्गी रोगी सामान्य जीवन नहीं जी सकते।
तथ्य: मिर्गी की बीमारी पीड़ित को  पढ़ाई और कार्यस्थल पर अच्छा प्रदर्शन करने से नहीं रोक सकती। इस रोग से पीड़ित लोग शादी कर सकते हैं, अपना परिवार बढ़ा सकते हैं। मिर्गी एक मेडिकल कंडीशन है, जिसमें दवाओं और दूसरे उपायों के द्वारा प्रबंधन करके सामान्य जीवन जिया जा सकता है। हां, ऐसे लोगों को ड्राइविंग और स्विमिंग से दूर रहना चाहिए।   

मिथक: मिर्गी के रोगी को तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
तथ्य: अकसर मिर्गी के दौरे मेडिकल इमरजेंसी नहीं होते हैं। लेकिन अगर दौरा पांच मिनट या उससे अधिक समय तक रहता है या लगातार दौरे पड़ते हैं और रोगी को दौरों के बीच में होश भी नहीं आता है या पीड़ित गिर जाता है या जिसे दौरा पड़ा है वह डायबिटीज का रोगी या गर्भवती महिला है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

मिथक: दौरा पड़ने पर तुरंत ही उसके मुंह में चम्मच या उंगली डाल देना चाहिए।
तथ्य: यह गलत है। बलपूर्वक रोगी के मुंह में कुछ डालने पर इससे दांतों और मसूड़ों को नुकसान पहुंच सकता है। सही तरीका है कि पीड़ित के सिर को सहारा देकर थोड़ा ऊंचा करते हुए एक करवट लेटा दें, उसे चोटिल होने से बचाएं और ध्यान रखें कि व्यक्ति सामान्य रूप से सांस ले पाए। कुछ लोग दौरा पड़ने पर पीड़ित को जूता सुंघाते हैं, यह पूरी तरह निराधार उपाय है।     

(विशेषज्ञ : डॉ. मनोज खनल, मुख्य सलाहकार न्यूरोलॉजी, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, शालीमार बाग, नई दिल्ली। डॉ. कुणाल बहरानी, एचओडी न्यूरोलॉजी, एशियन हॉस्पिटल, फरीदाबाद)

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  • Web Title:International Epilepsy Day 2019 Know about the treatment of epilepsy facts and myths