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19 नबम्बर, 2019|4:44|IST

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Chamki Bukhar : जल्द इलाज से बच सकती है मासूमों की जानें, Expert से जानें इसके लक्षण, कारण और उपाय

chamki fever

चमकी बुखार एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) का ही एक प्रकार है। इसके लक्षण दिखते ही अच्छे अस्पताल में भर्ती कराने से मरीज की जान बचाई जा सकती है। लक्षण शुरू होने और इलाज शुरू करने के बीच जितना कम समय लेंगे मरीज की जान बचने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। अंतराल ज्यादा होगा तो जान बचाना मुश्किल हो जाता है। एईएस में बच्चे की मृत्यु दर अधिक होने का कारण यही है कि इलाज में देरी हो रही है। ये बातें पीएमसीएच के शिशु रोग विभाग के एईएस विशेषज्ञ डॉ. गोपाल शरण ने कही। 

डॉ. गोपाल शरण ने बताया कि जैपनीज इंसेफलाइटिस वायरस एईएस बीमारी का सबसे महत्वपूर्ण कारक है। जेई अधिकतर गांव के बच्चों में ही होता है। इसमें भी तेज बुखार और चमकी होती है। दरअसल, जेई क्यूलेक्स मच्छर के काटने से होता है। यह रात में काटता है। यह मानसून से पहले और मानसून के बाद जब खेतों में पानी जमा हो जाता तब होता है। इसका इलाज भी अन्य एईएस की तरह ही होता है।

एईएस वायरल व बैक्टीरियल इंफेक्शन से भी हो सकता है। ड्रग या केमिकल से भी हो सकता है। यह बीमारी किसी भी समय हो सकती है, लेकिन गर्मी व बारिश में केस बहुत बढ़ जाते हैं। 

ये हैं चमकी के लक्षण
- एईएस में अचानक तेज बुखार होता है

- मरीज बेहोश होने लगता है। 

- बच्चे की मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है। 

- कुछ बच्चों में मिर्गी जैसा दौरा आता है, जबकि कुछ बच्चों में नहीं भी आता। 

कैसे पड़ा चमकी नाम
इस बीमारी में कुछ मामलों में मिर्गी के दौरे भी पड़ते हैं। इसी वजह से इसे आम बोलचाल की भाषा में चमकी बुखार के नाम से भी जाना जाता है। 

चमकी बुखार के कारण 
चमकी बुखार से पीड़ित बहुत बच्चों में ग्लूकोज की कमी पाई गई है। यह समझा जा रहा है कि बच्चा रात में खाली पेट सोया था। खाली पेट कच्ची लीची खाने से भी शुगर की कमी पाई गई। कच्ची लीची में हाइपोग्लाइसीन-ए केमिकल होता है। बीज में एमसीपीजी नामक विषैला केमिकल होता है।
 बच्चे खाली पेट इसे खाते हैं तो इन दोनों के कारण उल्टी, बुखार, खून में चीनी की कमी एवं चमकी के लक्षण देखे गए हैं। हालांकि, अब भी पूरी तरह से यह स्थापित नहीं हो पाया है कि लीची ही एईएस का मुख्य कारण है। 

जेई का टीका लगावाएं 
जैपनीज इंसेफलाइटिस का टीका सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध है। यह मुफ्त में दिया जाता है। टीके को नौ माह से 15 साल की उम्र तक दिया जा सकता है। पहला टीका नौ से 12 महीने की उम्र में दिया जाता है। दूसरा 16 से 24 माह में पड़ता है।

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