DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बूंद-बूंद प्राण फूंकते मातृ दुग्ध बैंक

breast milk

विगत 4 अप्रैल को शिल्पा भारद्वाज जयपुर के सांगानेरी गेट के निकट स्थित एक सरकारी अस्पताल में भर्ती हुईं। उसी दिन उन्होंने एक स्वस्थ शिशु बालक को जन्म दिया। इसके 12 घंटे बाद प्रसूति संबंधी जटिलताओं की वजह से उनकी मौत हो गई। उनका परिवार दुख से घिर गया, लेकिन जल्द ही परिवार का ध्यान इस आवश्यकता पर केंद्रित हुआ कि नवजात के आहार की व्यवस्था कैसे हो। 

यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तैयार जुलाई, 2018 में जारी एक रिपोर्ट ‘कैप्चर द मॉमेंट’ बताती है कि जन्म के बाद नवजात को ब्रेस्ट फीडिंग या स्तनपान से वंचित रखना जानलेवा हो सकता है। इन्हीं दो संगठनों द्वारा 2016 में जारी एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, भारत, इंडोनेशिया, चीन, मैक्सिको और नाइजीरिया में अपर्याप्त ब्रेस्ट मिल्क या मातृ दुग्ध के कारण हर वर्ष 2,36,000 नवजात की मौत हो जाती है। शिल्पा भारद्वाज का परिवार भी इस तथ्य से वाकिफ था और नहीं चाहता था कि उनके परिवार का नवजात भी इन्हीं आंकड़ों में कहीं शामिल हो जाए। तभी इस परिवार को एक मित्र के जरिए जयपुर में ही चलने वाले अमृत मिल्क बैंक का पता चला।  

Read Also : हेल्थ टिप्स: सेहतमंद रहने और वजन नियंत्रित रखने के लिए करें इन 8 फलों का सेवन

इनया फाउंडेशन नामक संस्था महात्मा गांधी अस्पताल के साथ मिलकर यह बैंक चलाती है। पता चला कि यहां से बोतल में प्रसंस्कृत मानव दुग्ध मिल सकता है। डॉक्टर ने बताया कि नवजात को प्रतिदिन 10 बोतल दूध की जरूरत पड़ेगी। हर दो घंटे पर दूध पिलाना होगा और एक बोतल में 30 मिलीलीटर दूध होगा। अमृत मिल्क बैंक ने उस जरूरतमंद नवजात के लिए तत्काल 25 बोतल दूध दे दिए। नवजात के चाचा गौरव का कहना है, ‘हमारे साथ त्रासदी हुई, तब हमें ऐसी किसी सेवा के बारे में पता चला। यह सेवा बच्चे के लिए जीवनदायी साबित हुई।’ 

इनके जैसे कई हैं, जिन्हें ऐसे किसी बैंक के होने की जानकारी मिली है। ऐसे कुछ बैंक स्वतंत्र रूप से चल रहे हैं, तो कुछ मेडिकल कॉलेजों से जुड़कर चल रहे हैं। ऐसा ही एक दुग्ध बैंक चेन्नई के इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ ऐंड हॉस्पिटल फॉर चिल्ड्रेन के साथ जुड़कर सेवारत है। अगले महीने प्रकाशित होने जा रही एक रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में ऐसे 60 से अधिक बैंक हैं। ऐसे और अनेक बैंकों की जरूरत है। भारत में बेहद कम वजनी बच्चों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। यहां बच्चों में मृत्यु दर और रुग्णता दर भी बहुत ज्यादा है। एक पोर्टल इंडियास्पेंड द्वारा वर्ष 2016 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल 7,00,000 से अधिक नवजातों की मौत हो जाती है। प्रति 1000 जन्म के बीच 29 नवजात काल के गाल में समा जाते हैं, क्योंकि उनका वजन कम होता है और उनका जन्म भी समय-पूर्व होता है।

इंडियन अकादमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की रिपोर्ट के अनुसार, समय पूर्व जन्मे ऐसे कम वजनी बच्चों को मातृ दुग्ध उपलब्ध कराने से उन्हें सेहत के साथ-साथ अनेक प्रकार के संक्रमणों से बचाने में भी मदद मिलती है। रिपोर्ट गुहार लगाती है कि सरकार, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और नागरिक समाज को मिलकर मातृ दुग्ध बैंक का प्रचार करना चाहिए। यदि सगी मां का दूध उपलब्ध नहीं है या अपर्याप्त है, तब भी प्रसंस्कृत मातृ दुग्ध सर्वश्रेष्ठ विकल्प है। मातृ दुग्ध के जरिए भारत में पांच वर्ष से कम उम्र में होने वाली 1,60,000 मौतों को रोका जा सकता है। केंद्र सरकार ने जुलाई, 2017 में स्तनपान प्रबंधन केंद्र संबंधी राष्ट्रीय दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जो हर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा केंद्र पर लागू होंगे, ताकि सभी बच्चों तक दूध की पहुंच सुनिश्चित की जा सके।

Read Also : Plastic Surgery Day : सिर्फ मॉडल ही नहीं कराती हैं ये सर्जरी, जानें इससे जुड़े ये 6 मिथ और हकीकत 

आदर्श दुग्ध दानदाता -

हर वह महिला आदर्श दानदाता है, जिसका स्वास्थ्य ठीक है और जिसके पास अपने बच्चे को पिलाने के बाद भी अतिरिक्त दुग्ध उपलब्ध है। ज्यादा दवा या नशा करने वाली महिलाएं, विभिन्न बीमारियों से संक्रमित महिलाएं दानदाता बनने योग्य नहीं हैं। सबसे बड़ा काम है, महिलाओं को सक्रिय दुग्धदान के लिए तैयार करना। यूनिसेफ के अनुसार, स्तनपान अभ्यास के मामले में दक्षिण एशियाई देशों के बीच भारत का स्थान नीचे है। भारत में 41 प्रतिशत नवजातों को ही जन्म के एक घंटे के अंदर स्तनपान लाभ मिलता है और छह महीने से कम उम्र के 55 प्रतिशत से भी कम बच्चों को पर्याप्त स्तनपान नसीब होता है। यूनिसेफ इंडिया की मानें, तो भारत में उच्च और निम्न आर्थिक वर्ग में माताएं समान रूप से कमजोर स्वास्थ्य और कुपोषण की शिकार हैं। कई बार लोग पहली खुराक के रूप में नवजात को शहद या मिश्री जल चटाते हैं। 

आज मिल्क बैंकों के पास समर्पित परमार्शदाता हैं, जो दुग्धदान की योग्य माताओं को प्रेरित करते हैं। ऐसी माताएं भी दानदाता के रूप में कारगर हैं, जिनके नवजात किसी कारण से गहन चिकित्सा कक्ष में भर्ती हैं और जिनको दूध उतरता है। ऐसी माताओं का एक आम प्रश्न होता है कि भगवान जाने, आप इस दूध का क्या करेंगे? क्या आप इस दूध को बेचेंगे? ऐसे सवाल उठाने वाली माताओं को तैयार करने के लिए यह दिखाना पड़ता है कि उनके या अन्य माताओं के दूध का क्या सदुपयोग किया जा रहा है। ऐसी माताओं को राजस्थान की पन्ना धाय (उदय सिंह द्वितीय की पालक) की कहानी सुनाई जाती है। महिलाओं को तैयार करने के लिए अनेक प्रकार के वीडियो दिखाए जाते हैं। उन्हें बताया जाता है कि उनका दान अनेक बच्चों को जीवनदान देगा।

अमृत मिल्क बैंक की एक परामर्शदाता या काउंसलर ममता चौधरी बताती हैं कि एक से एक अजीब कहानियां हैं, कुछ महिलाएं तो ऐसी भी होती हैं, जो बताती नहीं हैं कि उन्हें पर्याप्त दूध नहीं उतर रहा। उन्हें लगता है कि परिवार उनका तिरस्कार करेगा। ऐसी महिलाएं चुपचाप अपने लिए आई चाय तक नवजात को पिला देती हैं। 

दक्षिण दिल्ली के एक निजी अस्पताल से जुड़े अमारा ह्यूमन मिल्क बैंक के सदस्य सोशल मीडिया के जरिए भी महिलाओं को तैयार करते हैं। वर्ष 2016 में स्थापित अमारा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थापित पहला मातृ दुग्ध बैंक है। दिल्ली के इस बैंक ने भारत में पहली बार घर से ही दूध एकत्र करने की सेवा शुरू की। दानदाता महिलाओं को जरूरी जांच के लिए अस्पताल भी नहीं आना पड़ता है। इन महिलाओं को प्रशिक्षित किया जाता है कि दूध कैसे निकालकर किस तरह से किस तापमान में रखना है। 

पहला मातृ दुग्ध बैंक -

देश का पहला मातृ दुग्ध बैंक मुंबई में 1989 में स्थापित किया गया था। लोकमान्य तिलक म्युनिसिपल मेडिकल कॉलेज ऐंड जनरल हॉस्पिटल में इसकी शुरुआत अर्मिदा फर्नांडिज ने की थी। नवजात शिशु विभाग में भर्ती शिशु जब फॉर्मूला मिल्क या कृत्रिम मिल्क के कारण दस्त और संक्रमण के शिकार होने लगे थे, तब इस बैंक की स्थापना आवश्यक हो गई थी। इस तथ्य को अच्छी तरह से समझ लिया गया कि मातृ दुग्ध का कोई विकल्प नहीं हो सकता। इसके लिए जरूरी है कि अगर एक मां के पास दूध नहीं है, तो कोई दूसरी मां सेवा के लिए आगे आ जाए। अस्पताल की डॉक्टर जयश्री मोंडकर कहती हैं, जब मातृ दुग्ध बैंक बन गया, तब अस्पताल में नवजात बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार साफ नजर आने लगा। 

मांग और आपूर्ति में अंतर -

देश के मातृ दुग्ध बैंकों में जितनी आपूर्ति है, उससे कहीं अधिक मांग है। चेन्नई आईसीएच में नवजात शिशु विभाग की प्रमुख डॉक्टर सी एन कमलारतनम बताती हैं, ‘जब हमने बैंक शुरू किया था, तब प्रतिदिन 1,500 मिलीलीटर दूध की मांग थी, लेकिन हम महज 1000-1200 मिलीलीटर दूध ही जुटा पाते हैं। आज बहुत प्रयासों के बाद हम हर वर्ष 250 लीटर से अधिक दूध नहीं जुटा पा रहे हैं और हमें ज्यादा दूध की जरूरत है। हम दूसरे अस्पतालों को दूध मुहैया कराने में नाकाम हो रहे हैं। हमें ऐसे बच्चों के लिए भी दूध जुटाना पड़ता है, जिन्हें उनके माता-पिता ने त्याग दिया है।’ 

कहीं मुफ्त, कहीं शुल्क - 

दुग्ध बैंक सेवा आमतौर पर मुफ्त है, लेकिन अमारा मिल्क बैंक गैर-बीपीएल कार्डधारकों से प्रति बोतल 200 रुपये का शुल्क लेता है। इस धन का इस्तेमाल बैंक की सुविधाओं के विकास में किया जाता है। आमतौर पर दूध सीधे अस्पतालों या शिशु रोग विशेषज्ञों को मुहैया कराया जाता है, ताकि उसके दुरुपयोग को रोका जा सके। जयपुर का अमृत मिल्क बैंक 1,200 से ज्यादा नवजात की सेवा कर चुका है और अनेक अस्पतालों से उसके पास मांग पहुंचती है। जयपुर के महात्मा गांधी अस्पताल में नवजातों के लिए केवल इसी दूध का इस्तेमाल हो रहा है और फॉर्मूला दूध का उपयोग बिल्कुल बंद हो चुका है। लोग जैसे-जैसे ऐसे बैंक के बारे में जान रहे हैं, वैसे-वैसे इसकी जरूरत बढ़ती जा रही है। 

मातृ दुग्ध विकास -

देश में मातृ दुग्ध बैंक अलग-अलग प्रकार से संचालित हो रहे हैं, लेकिन पाथ जैसे कुछ संगठन हैं, जो तकनीक और प्रक्रियागत दिशा-निर्देश का एक मानक बनाने में मदद कर रहे हैं, लेकिन अभी भी लंबा रास्ता तय करना है। आज अमारा मानव दुग्ध बैंक अकेला ऐसा बैंक है, जहां दूध में उपलब्ध तत्वों का विश्लेषण करना संभव है। मातृ दुग्ध में भी यह देखा जाता है कि उसमें कितना प्रोटीन और कितना फैट है। इसकी सूचना दूध के बोतल पर दर्ज की जाती है। आज कमजोर नवजात शिशुओं को आवश्यकता के हिसाब से पोषक दूध देना संभव है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Breast Milk for new born baby