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26/11 आतंकी हमला बरसी : जांबाजों को आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिला

 एनएसजी कमांडो सुनील यादव (ऊपर से बाएं) को 2008 में बेस्ट कमांडो का अवॉर्ड मिला था। फाइल फोटो

मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले के खिलाफ कमांडो ऑपरेशन में अहम भूमिका निभाने वाले गुरुग्राम के जाबांज कमांडो सुनील यादव आज अभाव में जीवन गुजारने को मजबूर हैं। हमले में दुश्मन की गोली का शिकार होकर 40 दिन तक अस्पताल में रहे कमांडो से हर साल 26 नवंबर को नेता और प्रशासनिक अधिकारी मिलने आते हैं, लेकिन सिर्फ आश्वासन देकर ही वापस लौट जाते हैं।  

पटौदी से तीन किलोमीटर दूर सफेदार नागर गांव में रहने वाले कमांडो सुनील का कहना है कि हमले के तत्काल बाद राज्य और केंद्र सरकार द्वारा की गई घोषणाओं का लाभ भी उन्हें अब तक नहीं मिला है। वह कहते हैं कि देश के लिए उनकी सात जानें कुर्बान हैं, लेकिन जब देश के नेता और अधिकारी झूठ बोलते हैं तो दुख होता है। 

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आज भी याद है पूरा घटनाक्रम : कमांडो सुनील बताते हैं कि छठी मंजिल से उन्होंने अपना ऑपरेशन शुरू किया था। उनका साथ होटल के कुछ कर्मचारी दे रहे थे। वह विदेशी भाषा में बात करके फंसे हुए लोगों को समझा रहे थे। साथ ही ताले खोलने में हमारी मदद कर रहे थे। मोर्चा लेते हुए जब मैं ताज की तीसरी मंजिल पर पहुंचा, तो वहां एक कमरे में छिपकर बैठी एक अधेड़ उम्र की विदेशी महिला को बाहर निकाला। मैं अगले कमरे की ओर बढ़ा, तभी दरवाजा खुलते ही घात लगाकर बैठे आंतकवादी ने कई राउंड फायर कर दी। एक होटल कर्मचारी घायल हो गया। जवाबी गोलीबारी के बीच मैंने दोनों लोगों को खींचकर गोलियों के दायरे से बाहर किया। तभी तीन गोलियां मेरे पीछे धंस चुकी थीं। दो गोलियां कूल्हे पर लगी और एक गोली पीछे चाकू पर आकर लगी।  

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ताज के अंदर खौफनाक मंजर : ताज के अंदर का आंखों देखा हाल बयान करते समय कमांडो सुनील यादव की आखें नम हो गईं। उन्होंने बताया कि ताज होटल को बुरी तरह जलाया गया और कई जगह पर आगजनी की गई थी। उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा रोंगटे खड़े करनेवाला मंजर रसोई के पास का था। ग्राउंड फ्लोर स्थित रसोई में ज्यादातर स्टाफ को आतंकवादियों ने मार दिया था। सीढ़ियों का रास्ता रोकने के लिए 15-20 शवों को एक सीढ़ी-एक शव के हिसाब से बिछा दिया गया था। 

कमांडो के लिए थे भगवान जैसे भाव : हम जैसे ही कमरों में दाखिल होते, पहले तो लोग डर के मारे सांसें रोककर खड़े हो जाते थे। जैसे ही उन्हें समझ आता था कि हम उन्हें बचाने आए हैं तो वह रोने लगते थे, हमसे गले मिलते। मैंने इन लोगों की आंखों में अपने प्रति एक भगवान के आ जाने जैसा भाव देखा।

65 कमांडो ने लिया था हिस्सा 

सुनील यादव ने बताया कि एनएसजी में साल 2008 में बेस्ट कमाडो प्रतियोगिता हुई थी। 65 कमांडो ने हिस्सा लिया था। इस में फायरिंग, स्वीमिंग, रनिंग सहित अन्य कई प्रतियोगिताएं हुई थीं। उसमें वह पहले नंबर पर आए थे। उनको एनएसजी के स्थापना दिवस पर गृह मंत्री द्वारा सर्वश्रेष्ठ कमांडो का अवार्ड मिला था।

दिल्ली पुलिस में सिपाही की नौकरी मिली

सुनील ने बताया कि वह साल 2000 में सेना की नौंवी पैरामिल्ट्री स्पेशल फोर्स में शामिल हुए थे। उसके आठ साल बाद 2008 में प्रतिनियुक्ति पर एनएसजी में दो साल के लिए आए थे। इसी साल 27 नवंबर 2008 को मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के साथ होटल ताज में पहुंचे थे। उसके बाद साल 2010 में दोबारा से अपनी फोर्स वापस चले गए। इसके बाद उन्होने जेबीटी और स्नातक की पढ़ाई की गई। साल 2016 में फौज से सेवानिवृत्त हो गए। फिर वह एक निजी कंपनी में निजी सुरक्षा अधिकारी लगे। 14 मई 2018 में दिल्ली पुलिस में सिपाही के पद पर नौकरी मिली है। अभी ट्रेनिंग पर हैं।

एनएसजी कमांडो को नहीं दिया प्लॉट

फरीदाबाद |  एनएसजी कमांडो (नेशनल सिक्योरिटी गार्ड) जसाना गांव निवासी फिरे चंद कमांडो के उस दल में शामिल थे, जिसे पाकिस्तान से आए हुए आतंकवादियों के खात्मे का जिम्मा सौंपा गया था। होटल ताज में आतंकियों से लोहा लेने के दौरान पैरा कमांडो आतंकियों की गोली लगने से घायल हुए थे। गांव की पंचायत ने वीरता के लिए उन्हें 100 गज का प्लॉट देने की घोषणा की थी। प्रस्ताव पास कर जिला उपायुक्त को भी भेजा था। मगर,10 वर्ष बाद भी पंचायत द्वारा घोषित प्लॉट कमांडो को नहीं मिला है।  

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जसाना गांव निवासी फिरे चंद ने ‘हिन्दुस्तान' को बताया कि मुंबई हमले के वक्त अलग नजारा था। उनके इलाके की 84 बिरादरियों की पंचायत ने उन्हें सम्मानित किया था। पंचायत ने उन्हें 100 गज का प्लॉट देने की घोषणा की थी। मगर, आज तक उन्हें प्लॉट नहीं मिला है। जिला सैनिक बोर्ड के जरिए वह प्रशासनिक अधिकारियों से मिल चुके हैं। वह गांव में जिस ढानी में रहते हैं, वहां 10 घर हैं। वहां घरेलू बिजली लाइन नहीं है। वहां कृषि बिजली लाइन का फीडर है। जिस कारण उनकी ढानी में 20-22 घंटे बिजली नहीं आ रही है। उनकी ढानी की ओर जाने वाला रास्ता कच्चा है। इस बारे में अधिकारियों से मांग की गई है। मगर, कुछ नहीं हुआ है। फिलहाल वह स्पेशल पुलिस ऑफिसर के तौर पर काम कर रहे हैं। यहां होमगार्ड से भी कम वेतन मिलता है। 

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मालदीव और कारगिल की लड़ाई में ले चुके हैं लोहा : तीन नवंबर 1988 को मालदीव और वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध में भी हिस्से ले चुके हैं। वहीं जम्मू-कश्मीर, नगालैंड, मणिपुर, आसाम और अरुणाचल प्रदेश में भी उग्रवादियों से लोहा ले चुके हैं। उन्हें तीन गैलेंट्री अवार्ड भी मिल चुके हैं। गैलेंट्री अवार्ड विजेताओं की पेंशन में भी पांच वर्ष से बढ़ोतरी नहीं हुई है।

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