SIR ने मिला दिए दो बिछड़े भाई, 35 साल पहले अस्पताल से हो गए थे लापता
एसआईआर के लिए कागज लेने अपने पुराने स्कूल पहुंचे सीताराम को अपना परिवार मिल गया। 35 साल पहले सीताराम अस्पताल से गायब हो गए थे। बीएलओ ने दोनों को मिलाने में मदद की।

वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने के लिए मांगे गए एक कागज ने 35 साल से बिछड़े दो भाइयों को मिला दिया। साढ़े तीन दशक तक जिस भाई को परिवार मरा हुआ मान चुका था, बुधवार को सामने आते ही दोनों गले लगकर फफक पड़े। अमृतसर में रह रहे 55 वर्षीय सीता राम बुधवार को जींद के मनोहरपुर गांव स्थित राजकीय विद्यालय पहुंचे। पंजाब में एसआईआर (वोटर लिस्ट सत्यापन प्रक्रिया) के तहत उन्हें स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट (एसएलसी) सौंपना था। इसी के लिए वह अपने पुराने स्कूल पहुंचे, जहां एईआरओ रमेश कुमार मौजूद थे। रमेश ने बताया कि सीता राम ने इसी स्कूल में 10वीं तक पढ़ाई की थी, लेकिन परीक्षा पास नहीं कर सके थे। सत्यापन के लिए उन्हें एसएलसी की जरूरत थी।
भाई के नाम से खुला राज
एईआरओ रमेश कुमार ने बीएलओ कृष्ण कुमार से परिवार की पड़ताल कराई। सीता राम ने बताया कि उनके भाई का नाम दलबीर है। बीएलओ दलबीर सिंह को पहचानते थे। उन्होंने तुरंत फोन कर बताया कि सीता राम उनका सगा भाई है। दलबीर ने कहा—मैं अभी स्कूल आ रहा हूं। चंद मिनटों बाद जब दलबीर स्कूल पहुंचे और सामने 35 साल बाद छोटे भाई को देखा तो दोनों की आंखें बह निकलीं।
परिवार पर बोझ नहीं बनना चाहते थे
सीता राम ने चुनाव अधिकारियों को बताया कि 35 साल पहले परिवार ने उन्हें पोलियो के इलाज के लिए पंजाब के संगरूर स्थित एक केंद्र में भर्ती कराया था। एक महीने बाद जब परिजन उनका हालचाल लेने पहुंचे, तो स्टाफ ने बताया कि सीता राम कहीं चले गए हैं। जब परिवार के लोग उनका हाल जानने वहां पहुंचे तो केंद्र के कर्मचारियों ने उन्हें बताया कि वह वहां से जा चुके हैं। इसके बाद परिवार ने सीताराम की तलाश शुरू कर दी। कई साल बीत गए, लेकिन उनके बारे में कोई जानकारी नहीं मिली। काफी प्रयासों के बाद भी जब परिवार उन्हें ढूंढ नहीं पाया तो उन्होंने सीताराम के मिलने की उम्मीद छोड़ दी। परिवार ने सालों-साल ढूंढने के बाद उम्मीद छोड़ दी थी। इतने सालों बाद सीता राम ने खामोशी तोड़ी। बताया कि वे अपाहिज हो चुके थे और परिवार पर बोझ बनना चाहते थे।
सीताराम को मिल गई नौकरी
सीताराम ने बताया कि वह अपनी शारीरिक स्थिति के कारण परिवार पर बोझ नहीं बनना चाहते थे, इसलिए उपचार केंद्र छोड़ दिया था। सीताराम ने बताया कि पंजाब में रहने के दौरान उन्होंने एक निजी स्कूल में सहायक के रूप में काम किया और बाद में उन्हें स्थायी नौकरी मिल गई।


