बंदूक की नोक पर भर्ती, रूस से 'बॉडी बैग' में लौटा हरियाणा का अंकित; जानें पूरी कहानी

Apr 05, 2026 08:10 am ISTHimanshu Jha लाइव हिन्दुस्तान
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अंकित के बड़े भाई रघुवीर जांगड़ा और पूरे परिवार ने अपने बेटे को बचाने के लिए हर दरवाजा खटखटाया। परिवार ने दिल्ली और चंडीगढ़ के अधिकारियों, रूसी दूतावास, विदेश मंत्रालय (MEA) और रक्षा मंत्रालय से बार-बार गुहार लगाई।

बंदूक की नोक पर भर्ती, रूस से 'बॉडी बैग' में लौटा हरियाणा का अंकित; जानें पूरी कहानी

हरियाणा के फतेहाबाद जिले के कुम्हारिया गांव में मातम छाया हुआ है। 23 साल के अंकित जांगड़ा की अस्थियां और अवशेष शनिवार को जब उसके गांव पहुंचे, तो न केवल एक परिवार का सपना टूटा, बल्कि उन सैकड़ों भारतीय युवाओं की सुरक्षा पर भी बड़ा सवालिया निशान लग गया जो बेहतर भविष्य की तलाश में विदेश जाकर युद्ध की आग में फंस गए हैं। अंकित ने आखिरी बार कहा था, "हमें बचा लीजिए... हमारी जान किसी भी पल खतरे में पड़ सकती है।"

'द ट्रिब्यून' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 10 सितंबर 2025 को अंकित जांगड़ा ने अपनी जान की भीख मांगी थी। वह रूस के कब्जे वाले यूक्रेनी इलाके में फंसा हुआ था। उस कॉल के 24 घंटे के भीतर उससे संपर्क टूट गया। महीनों के इंतजार और प्रार्थनाओं के बाद, शुक्रवार को उसके परिवार को वह खबर मिली जिससे वे सबसे ज्यादा डरते थे। अंकित अब इस दुनिया में नहीं रहा।

कैसे शुरू हुआ यह 'मौत का सफर'?

अंकित जांगड़ा फरवरी 2025 में स्टडी वीजा पर मॉस्को गया था। वहां उसने एक कॉलेज में लैंग्वेज कोर्स में दाखिला लिया और अपना खर्च चलाने के लिए एक रेस्टोरेंट में पार्ट-टाइम काम करना शुरू किया। अंकित और उसके दोस्त विजय पूनिया को एक महिला एजेंट ने ऊंचे वेतन वाली नौकरियों का लालच दिया। पढ़ाई और छोटी नौकरियों के बहाने गए इन युवाओं को धोखे से रूसी सेना में भर्ती कर लिया गया। अंकित के साथ हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के लगभग 15 अन्य युवक भी थे।

वापसी का रास्ता सिर्फ मौत

अंकित ने अपनी आखिरी बातचीत में जो खुलासे किए, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले थे। उसने बताया कि उन्हें रूस से करीब 200-300 किमी दूर कब्जे वाले क्षेत्र सेलिडोव में रखा गया था। उन्हें 15 दिन की ट्रेनिंग के बाद 20 लाख रुपये और 1.5-2 लाख रुपये मासिक वेतन का वादा किया गया था, लेकिन उन्हें कभी वहां से जाने नहीं दिया गया। ये युवा ब्रेड और जैम पर जिंदा थे। अंकित ने बताया था कि उनके समूह के 5 साथियों की पहले ही मौत हो चुकी थी।

बंदूक की नोक पर भर्ती

जब इन युवाओं ने वापस घर जाने की जिद की, तो रूसी अधिकारियों ने उन पर बंदूकें तान दीं। अधिकारियों का कहना था, "या तो यहां मरोगे या दुश्मन को मारोगे, वापस जाने का कोई रास्ता नहीं है।"

परिवार की अंतहीन गुहार

अंकित के बड़े भाई रघुवीर जांगड़ा और पूरे परिवार ने अपने बेटे को बचाने के लिए हर दरवाजा खटखटाया। परिवार ने दिल्ली और चंडीगढ़ के अधिकारियों, रूसी दूतावास, विदेश मंत्रालय (MEA) और रक्षा मंत्रालय से बार-बार गुहार लगाई। सिरसा सांसद कुमारी शैलजा और रोहतक सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने भी विदेश मंत्री को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की थी। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद, अंकित को जिंदा वापस नहीं लाया जा सका। अब परिवार की सबसे बड़ी चिंता अंकित के दोस्त विजय पूनिया को लेकर है, जिसका अभी तक कोई सुराग नहीं मिला है।

रूस में जबरन भर्ती का पैटर्न

अंकित की कहानी कोई इकलौती घटना नहीं है। पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां भारतीय युवाओं को हेल्पर या मल्टी-टास्किंग स्टाफ के नाम पर रूस बुलाया गया और फिर उन्हें अग्रिम मोर्चे पर लड़ने के लिए मजबूर किया गया। भारत में सक्रिय कई संदिग्ध एजेंट सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को निशाना बना रहे हैं।

भारत सरकार ने रूस से कई बार अनुरोध किया है कि धोखे से भर्ती किए गए भारतीयों को कार्यमुक्त किया जाए, लेकिन युद्ध की भीषणता के बीच यह प्रक्रिया बेहद जटिल और धीमी साबित हो रही है।

गांव में पसरा सन्नाटा

शनिवार को जब अंकित का पार्थिव शरीर दिल्ली पहुंचा और फिर उसके गांव कुम्हारिया ले जाया गया, तो वहां का माहौल हृदयविदारक था। गांव वाले आक्रोशित हैं और सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उनके कई सवाल हैं। उस महिला एजेंट पर कार्रवाई कब होगी जिसने इन युवाओं को मौत के मुंह में धकेला? विजय पूनिया कहां है? क्या सरकार अन्य लापता युवाओं को सुरक्षित वापस लाने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगी?

Himanshu Jha

लेखक के बारे में

Himanshu Jha

बिहार के दरभंगा जिले से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु शेखर झा डिजिटल मीडिया जगत का एक जाना-माना नाम हैं। विज्ञान पृष्ठभूमि से होने के बावजूद (BCA और MCA), पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और मीडिया को ही अपना कर्मक्षेत्र चुना।


एक दशक से भी अधिक समय का अनुभव रखने वाले हिमांशु ने देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों जैसे दैनिक भास्कर, न्यूज़-18 और ज़ी न्यूज़ में अपनी सेवाएं दी हैं। वर्तमान में, वे वर्ष 2019 से लाइव हिन्दुस्तान के साथ जुड़े हुए हैं।


हिमांशु की पहचान विशेष रूप से राजनीति के विश्लेषक के तौर पर होती है। उन्हें बिहार की क्षेत्रीय राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति की गहरी और बारीक समझ है। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों को बेहद करीब से कवर किया है, जो उनके वृहद अनुभव और राजनीतिक दृष्टि को दर्शाता है।


काम के इतर, हिमांशु को सिनेमा का विशेष शौक है। वे विशेष रूप से सियासी और क्राइम बेस्ड वेब सीरीज़ देखना पसंद करते हैं, जो कहीं न कहीं समाज और सत्ता के समीकरणों को समझने की उनकी जिज्ञासा को भी प्रदर्शित करता है।

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