फोटो गैलरी

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

हिंदी न्यूज़ गुजरात22 पर 18 साल तक चला गुजरात दंगे का केस, ट्रायल में ही 8 मर गए; अब कोर्ट ने कहा- सबूत ही नहीं

22 पर 18 साल तक चला गुजरात दंगे का केस, ट्रायल में ही 8 मर गए; अब कोर्ट ने कहा- सबूत ही नहीं

गुजरात दंगा मामले में 17 लोगों के हत्या के 22 अभियुक्तों को गुजरात की एक अदालल ने सबूतों के आभाव की वजह से रिहा कर दिया। मरने वाले 17 लोगों में दो बच्चे भी शामिल थे।सभी पीड़ित अल्पसंख्यक समुदाय से थे।

22 पर 18 साल तक चला गुजरात दंगे का केस, ट्रायल में ही 8 मर गए; अब कोर्ट ने कहा- सबूत ही नहीं
Mohammad Azamलाइव हिंदुस्तान,अहमदाबादWed, 25 Jan 2023 09:57 AM

इस खबर को सुनें

0:00
/
ऐप पर पढ़ें

2002 में हुए गुजरात दंगे के एक केस में अदालत ने 22 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। दो दशक तक चले इस केस के ट्रायल के दौरान 8 आरोपियों की मौत भी हो चुकी है। गोधरा कांड के बाद हुए हिंसा में कलोल कस्बे में 17 लोगों की हत्या कर दी गई थी। मरने वालों में दो बच्चे भी शामिल थे। सभी पीड़ित अल्पसंख्यक समुदाय से थे। इस केस में 22 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। हालांकि, बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी।

इस मामले में बचाव पक्ष के वकील गोपाल सिंह सोलंकी ने बताया कि एडिशनल जज हर्ष त्रिवेदी की अदालन ने 22 अभियुक्तों को बरी कर दिया है जिसमें से 8 की मामले की सुनवाई के दौरान मौत हो चुकी है। उन्होंने बताया कि इस मामले में सबूतों का अभाव था इसलिए अदालत ने यह फैसला सुनाया। इस मामले में अभियोजन पक्ष का कहना है कि गुजरात दंगों के दौरान 17 पीड़ितों की हत्या कर दी गई थी। इसमें दो बच्चे भी शामिल थे। उन्होंने यह भी बताया कि हत्या करने के बाद आरोपियों ने सबूत मिटाने के लिए लाशों को आग के हवाले कर दिया था।

27 फरवरी, 2002 को अयोध्या से गुजरात लौट रही साबरमती ट्रेन के एक कोच में आग लगा दी गई थी। इसमें 59 कारसेवकों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद गुजरात के कई इलाकों में हिंसा भड़की थी। भड़की हिंसा की आंच गोधरा से तीस किलोमीटर दूर कलोल कस्बे के देलोल गांव में भी पहुंची थी। यहां कई घरों को आग के हवाले कर दिया गया था जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के 17 लोगों की मौत हो गई थी।

इस मामले में पुलिस जांच में सामने आया कि एक पुलिस अधिकारी ने पीड़ितों और गवाहों की शिकायत के बाद भी एफआईआर नहीं दर्ज की थी। पुलिस ने इस मामले की जांच शुरू की और घटना के लगभग 20 महीने के बाद दिसंबर 2003 में दोबारा एफआईआर करवाई गई थी। इस मामले में भगोड़े आरोपियों को 2004 में गिरफ्तार कर लिया गया था।

सोलंकी ने बताया कि इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों ने स्थानीय अदालत में जमानत याचिका दाखिल की थी जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था। इसके बाद आरोपी हाईकोर्ट पहुंच कर याचिका डाली। हाईकोर्ट ने उन्हें जमान दे दी। तब से सभी आरोपी जमानत पर थे।