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हिंदी न्यूज़ गुजरातGujarat Elections: गुजरात में भाजपा के सामने ये पांच बड़ी चुनौतियां, कैसे पार लगेगी नैया?

Gujarat Elections: गुजरात में भाजपा के सामने ये पांच बड़ी चुनौतियां, कैसे पार लगेगी नैया?

विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा के लिए गुजरात की लड़ाई इस बार साल 2017 से ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। जानिए गुजरात विधानसभा चुनावों में भाजपा के सामने क्या हैं बड़ी चुनौतियां और कितनी है उम्मीद...

Gujarat Elections: गुजरात में भाजपा के सामने ये पांच बड़ी चुनौतियां, कैसे पार लगेगी नैया?
Krishna Singhमौलिक पाठक,अहमदाबादThu, 24 Nov 2022 10:16 PM
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गुजरात में लगातार सातवीं बार सत्ता पर काबिज होने की कोशिश में लगी BJP तमाम चुनौतियों से जूझ रही है। 2017 की तरह भाजपा को भले ही किसी बड़े विरोध का सामना नहीं करना पड़ रहा है, लेकिन त्रिकोणीय मुकाबले में उसके सामने दूसरी तरह की चिंताएं हैं। पिछले चुनाव में भाजपा को किसानों के मुद्दे, जीएसटी, नोटबंदी, बेरोजगारी और पाटीदार आंदोलन जैसी तमाम चुनौतियों से जूझना पड़ा था। साल 2017 में लगभग 70 फीसदी मतदान हुआ था, तब पाटीदार जैसा समुदाय, जो कभी भाजपा का मजबूत वोट-बैंक था, बड़ी संख्या में सामने आकर भाजपा के खिलाफ मतदान किया था। आइए जानते हैं भाजपा के लिए इस बार की कौन सी 5 बड़ी चुनौतियां हैं.. 

भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने की कोशिश में AAP
आम आदमी पार्टी की एंट्री के चलते गुजरात की कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला हो चला है। गुजरात के शहरी और अर्ध-शहरी इलाके भाजपा के लिए गढ़ रहे हैं। इनमें आम आदमी पार्टी सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। गुजरात की 182 विधानसभा सीटों में से 84 या तो अर्ध-शहरी या शहरी प्रकृति की सीटें हैं, जबकि 98 ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र हैं। आम आदमी पार्टी ने मुफ्त बिजली, बेरोजगारों और महिलाओं को मासिक भत्ता और मुफ्त स्वास्थ्य सेवा और मुफ्त शिक्षा की पेशकश करके लोकप्रियता हासिल की है।

एंटी इनकंबेंसी कम करने की कवायद कितनी कारगर 
भाजपा ने सत्ता विरोधी रुझान को थामने के लिए अधिकांश दिग्गजों के टिकट काट दिए हैं। 182 में से 42 मौजूदा विधायकों को टिकट नहीं दिया है। गौरतलब है कि भाजपा ने वर्षों की सत्ता विरोधी लहर से निपटने के लिए अपने मुख्यमंत्री विजय रुपाणी समेत पूरे मंत्रिमंडल को बदल दिया था। रुपाणी, पूर्व उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल, पूर्व शिक्षा मंत्री भूपेंद्र सिंह चुडासमा और पूर्व ऊर्जा मंत्री सौरभ पटेल समेत कई बड़े नेता इस बार मैदान में नहीं हैं। 

बागियों की चुनौती से पार पाना मुश्किल
एंटी इनकंबेंसी से पार पाने के लिए जिन नेताओं के टिकट काटे गए हैं, उनमें से कई ने बगावत कर दी है। यही कारण है कि भाजपा को इस बार बागियों की तगड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। प्रदेश भाजपा के दिग्गजों ने पहले तो मान-मनौवल के फॉर्मूले पर काम किया लेकिन जिन क्षेत्रों में बात नहीं बनी वहां पार्टी की ओर से सख्त कार्रवाई की गई है। नतीजतन भाजपा 18 नेताओं को निलंबित कर चुकी है। इनमें 17 नेताओं ने निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में नामांकन दाखिल किया था जबकि एक कांग्रेस के टिकट पर मैदान में है। 

पहले चरण की चुनौती
निलंबित किए गए सात नेताओं में से दो हर्षद वसावा और अरविंद लाडानी, नंदोद और केशोद सीटों से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। हर्षद वसावा एक आदिवासी नेता हैं, जबकि अरविंद लाडानी भाजपा के पूर्व विधायक हैं। एक अन्य नेता छत्रसिंह गुंजारिया, जिन्हें भाजपा ने निलंबित किया है, सुरेंद्रनगर जिला पंचायत के निर्वाचित सदस्य हैं। उन्हें कांग्रेस ने धांगधरा सीट से उतारा है। पहले चरण के चुनाव में कुल छह नेता भाजपा के लिए चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं।

दूसरे चरण में ज्यादा बागी
5 दिसंबर को दूसरे चरण के चुनाव के लिए 93 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान होगा। इस चरण के लिए चुनौती बने 12 नेताओं को भाजपा ने निलंबित किया है। टिकट नहीं मिलने के कारण ये नेता निर्दलीय ताल ठोंक रहे हैं। निलंबित नेताओं में मौजूदा विधायक मधु श्रीवास्तव भी शामिल हैं। श्रीवास्तव के लिए वाघोडिया निर्वाचन क्षेत्र एक मजबूत गढ़ रहा है। वह इस सीट से निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत दर्ज कर चुके हैं। इस बार जब वह एकबार फिर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में हैं, भाजपा के लिए गंभीर चुनौती पेश कर सकते हैं।

नए उम्मीदवारों से नाराजगी 
इसी तरह बड़ौदा डेयरी के अध्यक्ष दिनेश पटेल पाडरा से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं। बीजेपी ने पटेल की जगह पादरा से नगरसेवक चैतन्य सिंह जाला पर दांव लगाया है जिससे वह नाराज हैं। एक बीजेपी नेता ने बताया कि वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें समझाने के लिए उन तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन बागी नेता अपने रुख पर अड़े हुए हैं।  

पार्टी के इस कदम का विरोध कर रहे नेता 
भाजपा ने इस बार कांग्रेस से पाला बदलकर आए कई नेताओं को टिकट दिया है। एक भाजपा नेता ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि BJP के बागी, जो निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं, कांग्रेस से आए नेताओं का विरोध कर रहे हैं जिन्हें टिकट दिया गया है।

कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी
भाजपा सूत्र का कहना है कि इस बार कहीं कहीं पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी देखी जा रही है। उन्हें लगता है कि उनको उन नेताओं के लिए काम करना होगा, जिनका वह पहले विरोध कर रहे थे। ऐसे में पार्टी के नए नेताओं को इन कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने में भी समय लगेगा। इससे पार्टी इन जगहों पर अपने मूल मतदाताओं को मतदान केंद्र तक ले जाने की चुनौती से जूझेगी।  

अभी भी पीएम मोदी ही चेहरा 
इस बार भी भाजपा प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता पर निर्भर है जबकि कांग्रेस को अपने उम्मीदवारों और उनकी लोकप्रियता पर भरोसा है, खास तौर पर सौराष्ट्र और आदिवासी बेल्ट में, जहां लगभग 90 सीटें हैं। कांग्रेस ने साल 2017 में इनमें से अधिकतम पर जीत हासिल की थी। भाजपा के पूरे अभियान का नेतृत्व प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं। भाजपा को पीएम मोदी की छत्र छाया है, तो कांग्रेस को अपने उम्मीदवारों के रसूख पर भरोसा है। गौरतलब यह भी कि कांग्रेस के पास इस बार कोई बड़ा चेहरा पूरी ताकत और सक्रियता से नजर नहीं आता है। 

कम हो सकता है जीत का अंतर 
भाजपा सूत्र की मानें तो कई सीटें ऐसी हैं जहां जीत का अंतर 2017 के विधानसभा चुनावों की तुलना में बहुत कम हो सकता है। सनद रहे 2017 के गुजरात चुनावों में भाजपा को 182 में से 99 सीटें ही मिली थीं। बीते 27 वर्षों के चुनावी इतिहास में भाजपा का यह सबसे खराब प्रदर्शन था। इस बार भाजपा को कम मतदान की आशंका है। हालांकि, जमीन पर कोई बड़े पैमाने पर उसके खिलाफ विरोध नहीं देखा जा रहा है। इससे भाजपा को 2017 की तुलना में अपनी सीटें बढ़ाने में मदद मिल सकती है। भाजपा ने पिछले चुनाव में शहरी गुजरात में 84 विधानसभा सीटों में से  64 और ग्रामीण गुजरात में 98 में से 35 सीटों पर जीत हासिल की थी। 

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