‘जितनी देर करोगे, उतना बढ़ेगा हर्जाना’- सरकारी जमीन पर कब्जे के आरोप में यूसुफ पठान को कोर्ट की चेतावनी
गुजरात हाईकोर्ट ने वडोदरा की सरकारी जमीन विवाद मामले में यूसुफ पठान को 4 सप्ताह का समय दिया है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि मामले में जितनी देरी होगी, उतना अधिक हर्जाना देना पड़ सकता है। नगर निगम ने उन पर वर्षों से जमीन पर कब्जा बनाए रखने का आरोप लगाया है।

पूर्व भारतीय क्रिकेटर और सांसद यूसुफ पठान एक बार फिर कानूनी विवाद में घिर गए हैं। गुजरात हाईकोर्ट ने वडोदरा की एक सरकारी जमीन से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान उन्हें चेतावनी देते हुए कहा- “मामले के समाधान में जितनी अधिक देरी होगी, उतना ही अधिक हर्जाना (डैमेजेज) देना पड़ सकता है।” कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई जब यूसुफ पठान की ओर से राज्य सरकार की 1999 की नीति के तहत राहत पाने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया।
जमीन पर कब्जा मिला, तो भी हर्जाना लग सकता है- HC
इंडियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी.एन. रे की खंडपीठ ने पठान को चार सप्ताह का समय दिया है, ताकि वे इंटरनेशनल खिलाड़ियों को जमीन अलॉट करने से जुड़ी गुजरात सरकार की नीति के तहत अपना दावा आगे बढ़ा सकें। हालांकि अदालत ने साफ कहा कि इस दौरान यदि जमीन पर कब्जा जारी रहता है, तो उस अवधि को भी हर्जाने की गणना में शामिल किया जा सकता है।
कमेटी और बोर्ड ने मंजूरी दी थी, फिर कहां फंसा पेंच?
दरअसल, यह मामला वडोदरा के तांदलजा इलाके में स्थित 978 वर्गमीटर के एक जमीन से जुड़ा है। यूसुफ पठान ने साल 2012 में गुजरात सरकार की खेल नीति के तहत इस जमीन के अलॉटमेंट के लिए आवेदन किया था। वडोदरा नगर निगम (VMC) की स्टैंडिंग कमेटी और जनरल बोर्ड ने प्रस्ताव को मंजूरी देकर राज्य सरकार के पास भेजा था, लेकिन शहरी विकास विभाग ने जून 2014 में इस मांग को खारिज कर दिया।
न जमीन का अलॉटमेंट हुआ, न कीमत का भुगतान- HC
इसके बावजूद नगर निगम का आरोप है कि यूसुफ पठान ने जमीन पर फेंसिंग कर रखी है। सालों से उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। निगम का कहना है कि जमीन का अलॉटमेंट कभी भी अंतिम रूप से नहीं हुआ। न ही तय कीमत का भुगतान किया गया। इसी आधार पर नगर निगम ने इसे अतिक्रमण का मामला बताते हुए नोटिस भी जारी किया था।
भले राहत मिले, लेकिन कब्जे के समय तक का होगा हिसाब
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि सार्वजनिक भूमि पर बिना कानूनी अधिकार के कब्जे को सामान्य उपयोग नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि ऐसे मामलों में हर्जाना दंडात्मक (Punitive) प्रकृति का भी हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि भले ही भविष्य में यूसुफ पठान को नीति के तहत कोई राहत मिल जाए, लेकिन जमीन के उपयोग और कब्जे की अवधि का हिसाब अलग से किया जाएगा।
2014 में आवेदन खारिज हुआ, तो कब्जा किस आधार पर रहा?
इससे पहले भी अदालत ने टिप्पणी की थी कि यदि 2014 में सरकार ने आवेदन खारिज कर दिया था तो उसके बाद जमीन पर कब्जा किस आधार पर जारी रहा। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया था कि यदि आवंटन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई और भुगतान नहीं किया गया, तो सार्वजनिक जमीन का उपयोग कैसे किया जा सकता है। फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तक यूसुफ पठान को राहत तो दी है, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट कर दिया है कि देरी की कीमत उन्हें भारी पड़ सकती है।
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Ratan Guptaरतन गुप्ता एक डिजिटल हिंदी जर्नलिस्ट/ कॉन्टेंट प्रोड्यूसर हैं। वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान की स्टेट न्यूज टीम के साथ काम कर रहे हैं। वह क्राइम, राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर न्यूज आर्टिकल और एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखते हैं।
रतन गुप्ता वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर स्टेट न्यूज टीम में काम करते हैं। इस टीम में हिंदी पट्टी के 8 राज्यों दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात से जुड़ी खबरों की कवरेज करते हैं। उनका लेखन खास तौर से क्राइम, राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रहता है।
लाइव हिंदुस्तान में बीते 2 साल से काम करते हुए रतन ने ब्रेकिंग न्यूज, राजनीतिक घटनाक्रम और कानून-व्यवस्था से जुड़ी खबरों पर लगातार लेखन किया है। इसके साथ ही वह एक्सप्लेनर स्टोरीज लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं, जहां जटिल मुद्दों को सरल और तथ्यपरक भाषा में पाठकों के सामने रखते हैं।
रतन गुप्ता ने बायोलॉजी में ग्रेजुएशन किया है, जिसके बाद उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की है। साइंस बैकग्राउंड होने के कारण उनकी न्यूज और एनालिसिस स्टोरी में साइंटिफिक टेंपरामेंट, लॉजिकल अप्रोच और फैक्ट-बेस्ड सोच साफ दिखाई देती है। वह किसी भी मुद्दे पर रिपोर्टिंग करते समय दोनों पक्षों की बात, मौजूद तथ्यों और आधिकारिक स्रोतों को प्राथमिकता देते हैं, ताकि यूजर तक संतुलित और भरोसेमंद जानकारी पहुंचे।
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