शादी, तलाक से लिव-इन तक, गुजरात में UCC से क्या-क्या बदल जाएगा; 7 साल तक की जेल की सजा

Subodh Kumar Mishra लाइव हिन्दुस्तान, गांधीनगर
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गुजरात विधानसभा ने मंगलवार को 'गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक 2026' पारित कर दिया। इसमें शादी-विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों के बारे में एक समान कानूनी ढांचा प्रस्तावित किया गया है। इसी के साथ गुजरात यूसीसी लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया है।

शादी, तलाक से लिव-इन तक, गुजरात में UCC से क्या-क्या बदल जाएगा; 7 साल तक की जेल की सजा

गुजरात विधानसभा ने मंगलवार को 'गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक 2026' पारित कर दिया। इसमें शादी-विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों के बारे में एक समान कानूनी ढांचा प्रस्तावित किया गया है। इसी के साथ गुजरात यूसीसी लागू करने वाला दूसरा राज्य बन गया है।

गुजरात विधानसभा की 182 सीटों में से 161 सीटों पर भारी बहुमत होने के कारण बीजेपी के कई सदस्यों द्वारा प्रस्तावित कानून पर अपने विचार रखने के बाद यह विधेयक बहुमत से पारित कर दिया गया। उत्तराखंड के बाद गुजरात दूसरा ऐसा भारतीय राज्य बन गया है, जिसने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के लिए विधेयक पारित किया है। हालांकि, इस विधेयक के कोई भी प्रावधान अनुसूचित जनजातियों के लोगों पर लागू नहीं होंगे।

सदन में बिल पेश करते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा कि यूसीसी उन अहम सुधारों में से एक है, जिन्हें लागू करने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी दृढ़ हैं। सीएम ने कहा कि इस बिल को पेश करने का मुख्य मकसद सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित करना है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सुझाव दिया है कि यूसीसी महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।

रजिस्ट्रेशन कराने का प्रस्ताव

इस बिल में शादी और तलाक का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन कराने का प्रस्ताव है। इसका पालन नहीं करने पर 10000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। सभी लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रेशन कराना होगा और ऐसे रिश्तों के खत्म होने की जानकारी भी देनी होगी। लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुआ कोई भी बच्चा, उस जोड़े का वैध बच्चा माना जाएगा।

जबरदस्ती शादी के लिए 7 साल की जेल

गुजरात यूनिफॉर्म सिविल कोड बिल 2026 के मुताबिक, जिस महिला को उसका लिव-इन पार्टनर छोड़ देता है, वह गुजारा भत्ता मांगने की हकदार होगी। बहुविवाह पर रोक लगा दी गई है और जबरदस्ती या दबाव डालकर की गई शादियों के लिए सात साल तक की जेल हो सकती है। अदालत के आदेश के अलावा तलाक का कोई भी रूप दंडनीय होगा। इसके लिए 3 साल तक की कैद की सजा हो सकती है।यह बिल तलाक के बाद किसी भी शर्त के बिना दोबारा शादी करने को कानूनी बनाता है और 'हलाला' की प्रथा पर रोक लगाता है।

यह कानून किसी खास धर्म के लिए नहीं

इस कानून के पक्ष में दलील देते हुए उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी ने कहा कि हालांकि भारत 1947 में आजाद हो गया था, फिर भी नागरिक कानून धर्म, समुदाय और जाति के आधार पर अलग-अलग बने रहे। उन्होंने बताया कि इससे महिलाओं को काफी नुकसान हुआ है। नया कानून शादी, विरासत और उससे जुड़े मामलों के लिए एक जैसा कानूनी ढांचा तैयार करेगा। यह कानून किसी खास धर्म के लिए नहीं है। यह सभी नागरिकों के लिए है और कानून के तहत सभी को बराबर अधिकारों की गारंटी देता है।

20 लाख सुझाव और सिफारिशें मिलीं

सांघवी ने कहा कि इस बिल को एक लंबी सलाह-मशविरे की प्रक्रिया के बाद तैयार किया गया है। इसमें समाज के सभी वर्गों की बात सुनी गई। उन्होंने यह भी बताया कि बिल का मसौदा तैयार करते समय यूसीसी पैनल को 20 लाख सुझाव और सिफारिशें मिली थीं। संघवी ने कहा कि धोखे से या नकली पहचान का इस्तेमाल करके की गई शादियां एक सामाजिक बुराई बन गई हैं। यह एक संगठित अपराध बन गया है, जिसे रोका जाना चाहिए। यहां तक कि अदालतों ने भी ऐसी प्रथाओं को रोकने के निर्देश दिए हैं। संघवी ने कहा कि फ्रांस, जर्मनी, तुर्की, नेपाल, अजरबैजान और मुस्लिम-बहुसंख्यक आबादी वाले देशों सहित कई देशों में इसी तरह के कानून हैं।

कांग्रेस ने राजनीति से प्रेरित बताया

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और विधायक अमित चावड़ा ने आरोप लगाया कि इस विधेयक को पेश करना राजनीति से प्रेरित था। चावड़ा ने सवाल उठाया कि विधानसभा में विधेयक पेश किए जाने से पहले विधायकों को जस्टिस रंजना देसाई पैनल की रिपोर्ट पढ़ने के लिए क्यों नहीं दी गई।

बिल को समिति के पास भेजा जाए

उन्होंने मांग की कि इस बिल को विधायकों की एक समिति के पास भेजा जाए। इसे अगले विधानसभा सत्र में पेश किया जाए, ताकि सभी विधायक इसका अध्ययन कर सकें। कांग्रेस विधायक शैलेश परमार ने कहा कि इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं है कि प्रस्तावित कानून में उन अन्य राज्यों के लोगों को शामिल किया जाएगा या नहीं, जो गुजरात में रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप के मुद्दे पर स्पष्टता की कमी है। यूसीसी बिल नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के साथ टकराव में नहीं आना चाहिए।

‘लव जिहाद’ की घटनाएं बढ़ रही

चर्चा के दौरान राज्य विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा विधायक रमनलाल वोरा ने कहा कि कुछ राजनीतिक दल अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीति अपनाते हैं, लेकिन इन समुदायों की महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी करते हैं। समान नागरिक संहिता के अभाव के कारण ‘लव जिहाद’ की घटनाएं बढ़ रही हैं।

कांग्रेस विधायक इमरान खेड़ावाला ने कहा कि उन्होंने बिल के उन प्रावधानों का स्वागत किया है, जिनमें 'हलाला' की प्रथा पर रोक लगाई गई है। उन्होंने कहा कि पूरी तरह से संवैधानिक आधार पर मैं इस बिल का समर्थन करता हूं, क्योंकि इसका उद्देश्य महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित करना है।

Subodh Kumar Mishra

लेखक के बारे में

Subodh Kumar Mishra

सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

ज्यादातर नेशनल और स्टेट डेस्क पर काम करने का अवसर मिलने के कारण राजनीतिक और सामाजिक विषयों से जुड़ी खबरों में दिलचस्पी बढ़ती गई। कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों की खबरों की पैकेजिंग टीम का हिस्सा रहने के कारण भारतीय राजनीति के गुणा-भाग को समझने का मौका मिला।

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