क्या आपके घर में पहुंच रहा है सुरक्षित पानी? एक्सपर्ट ने बताई पूरी सच्चाई

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भारत में नल के पानी की पहुंच तेजी से बढ़ी है, लेकिन साफ दिखने वाला पानी हमेशा सुरक्षित नहीं होता। यूरेका फोर्ब्स के चीफ वॉटर साइंटिस्ट डॉ. अनिल कुमार ने TDS, पाइपलाइन, दूषित तत्वों और सही वाटर प्यूरिफिकेशन को लेकर जरूरी बातें बताई हैं।

It Tap Water Really Safe to Drink
साफ दिखने वाला पानी सुरक्षित हो, ऐसा जरूरी नहीं है।

भारत में हर घर तक नल के जरिए पानी पहुंचाने की दिशा में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी प्रगति हुई है। जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण भारत में नल के पानी के कनेक्शनों की पहुंच मार्च 2026 तक बढ़कर 81.71 प्रतिशत हो गई है, जबकि 2019-20 में यह आंकड़ा केवल 21.33 प्रतिशत था। लेकिन पानी की पहुंच बढ़ने के साथ अब अगली बड़ी चुनौती उसकी गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। ऐसे में हमने समझने की कोशिश की कि लोगों के घरों तक पहुंचने वाला पानी किसना सुरक्षित है।

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यूरेका फोर्ब्स के चीफ वॉटर साइंटिस्ट डॉ. अनिल कुमार के मुताबिक, पानी की सुरक्षा को केवल उसके साफ दिखने, स्वाद या गंध से नहीं परखा जा सकता। उनका कहना है कि आज पानी में मौजूद कई ऐसे दूषित तत्व चिंता का विषय हैं, जो आंखों से दिखाई नहीं देते और पानी के स्वाद या गंध में भी बदलाव नहीं करते।

बड़ी आबादी के घरों तक पहुंचा पानी

राष्ट्रीय अनुमानों के अनुसार 2024 में भारत की 76.44 प्रतिशत आबादी को सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल तक पहुंच थी। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में नल के पानी की पहुंच में तेजी से हुई वृद्धि जल आपूर्ति के बुनियादी ढांचे में बड़े बदलाव को दिखाती है।

हालांकि, डॉ. अनिल कुमार के अनुसार अब फोकस केवल पानी की उपलब्धता से आगे बढ़ाकर उसकी वास्तविक सुरक्षा पर होना चाहिए। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि घर में नल से पानी आ रहा है या नहीं, बल्कि यह भी होना चाहिए कि उस पानी में ऐसे कोई दूषित तत्व तो नहीं हैं जो लंबे समय में स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

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साफ पानी का मतलब हमेशा सुरक्षित पानी नहीं

पानी को सुरक्षित मान लेने की सबसे आम वजह उसका साफ दिखाई देना है। अगर पानी पारदर्शी है, उसमें कोई गंध नहीं है और स्वाद सामान्य है तो अक्सर लोग मान लेते हैं कि वह पीने योग्य है। डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि यह धारणा अब काफी नहीं है। भूजल और दूसरे जल स्रोतों में मौजूद कई रासायनिक और जैविक दूषित तत्व बिना किसी दृश्य संकेत के पानी में मौजूद रह सकते हैं। इनमें आर्सेनिक, यूरेनियम, नाइट्रेट, भारी धातुएं, कीटनाशक और अन्य औद्योगिक प्रदूषक शामिल हो सकते हैं।

यही वजह है कि पानी की गुणवत्ता को केवल देखकर या चखकर तय करने के बजाय जरूरत के अनुसार उसकी वैज्ञानिक जांच करना जरूरी है।

TDS को लेकर भी लोगों में भ्रम

पानी की गुणवत्ता की बात आते ही TDS यानी Total Dissolved Solids का जिक्र होने लगता है। TDS पानी में घुले खनिजों, लवणों और अन्य अकार्बनिक पदार्थों की मौजूदगी का संकेत देता है और पानी के स्वाद को भी प्रभावित कर सकता है, लेकिन डॉ. अनिल कुमार के मुताबिक पानी की सुरक्षा को सिर्फ TDS के आंकड़े से तय करना सही तरीका नहीं है। कम TDS का अर्थ यह नहीं है कि पानी बैक्टीरिया या वायरस से पूरी तरह फ्री है। इसी तरह ज्यादा TDS का मतलब भी हर स्थिति में पानी का असुरक्षित होना नहीं होता।

pH भी पानी की गुणवत्ता में अहम

पानी का pH भी उसकी गुणवत्ता का एक महत्वपूर्ण पैरामीटर है। बहुत ज्यादा अम्लीय या क्षारीय पानी स्वाद को प्रभावित कर सकता है और पाइपलाइन में जंग जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है। हालांकि, TDS की तरह pH भी पानी की सुरक्षा का अकेला पैमाना नहीं है। सुरक्षित पेयजल के लिए कई अलग-अलग गुणवत्ता मानकों पर ध्यान देना पड़ता है।

63.96 लाख नमूनों की जांच में 1.61 लाख दूषित

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में देशभर में 63.96 लाख पेयजल नमूनों की जांच की गई। इनमें 1.61 लाख नमूने दूषित पाए गए। ऐसे में डॉ. अनिल कुमार के मुताबिक ऐसे आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि जल आपूर्ति के विस्तार के साथ-साथ पानी की गुणवत्ता की निगरानी भी लगातार मजबूत करनी होगी।

Pranesh Tiwari

लेखक के बारे में

Pranesh Tiwari

प्राणेश वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां वे पिछले चार वर्षों से टेक्नोलॉजी सेक्शन का अहम हिस्सा हैं। खुद को दिल से लेखक और पेशे से पत्रकार मानने वाले प्राणेश के पास पत्रकारिता के क्षेत्र में आठ वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने अपने पूरे करियर में साइंस और टेक्नोलॉजी की जटिलताओं को आम पाठकों के लिए सरल, सहज और रोचक भाषा में प्रस्तुत करने पर विशेष ध्यान दिया है।

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