भूकंप का झटका खुद सोख लेगी ये मशीन! बिना बिजली करेगी काम; नई खोज ने चौंकाया
वैज्ञानिकों ने स्टील के गोलों से भरा एक खास टूल डिवेलप किया है, जो भूकंप के झटकों को कम करने में मदद कर सकता है। यह टेक्नोलॉजी बिना बिजली काम करती है और इमारतों व पुलों में कंपन को कम करने के लिए शॉक अब्जॉर्वर की तरह काम करती है।

दुनियाभर में भूकंप से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए लगातार नई टेक्नोलॉजी पर काम हो रहा है। इसी बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की शारजाह यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा भूकंप रोधी टूल तैयार किया है, जो बिना बिजली के इमारतों और पुलों पर पड़ने वाले झटकों को कम करने में मदद कर सकता है। यह ‘भूकंप रोकने वाली मशीन’ एक Passive Seismic Damper (PSD) है, जिसका मकसद भूकंप के दौरान होने वाले कंपन की ऊर्जा को कम करना है जिससे इमारतों को कम से कम नुकसान पहुंचे।
कैसी दिखती है यह मशीन?
डिवाइस एक बड़े स्टील सिलेंडर की तरह होती है, जिसके अंदर छोटे-छोटे मजबूत स्टील के गोले (Steel Spheres) भरे रहते हैं। साथ ही बीच में एक मूविंग रॉड या शाफ्ट लगाया जाता है, जिस पर छोटे डंडे जैसे हिस्से लगे रहते हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक इसका काम करने का तरीका काफी हद तक गाड़ी के शॉक अब्जॉर्वर जैसा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां सड़क के झटकों की जगह भूकंप या भारी कंपन से पैदा हुई ऊर्जा को कंट्रोल किया जाता है।
तीन स्टेज में समझें काम का तरीका
स्टेज 1: सामान्य स्थिति
जब कोई भूकंप, तेज हवा या भारी कंपन नहीं होता, तब यह मशीन पूरी तरह शांत रहती है। सिलेंडर के अंदर मौजूद शाफ्ट और स्टील के गोले अपनी जगह स्थिर रहते हैं। इस दौरान ना तो कोई फ्रिक्शन पैदा होता है और ना ही कोई ऊर्जा सोखी जाती है। यानी सिस्टम स्टैंड-बाय मोड में रहता है।
स्टेज 2: कंपन की शुरुआत
जैसे ही भूकंप का झटका आता है या पुल/इमारत हिलने लगती है, तो यह सिस्टम एक्टिव हो जाता है। कंपन की वजह से बीच की शाफ्ट तेजी से आगे-पीछे या ऊपर-नीचे मूव करती है। शाफ्ट पर लगे छोटे रॉड्स सिलेंडर के अंदर मौजूद स्टील के गोलों को धकेलते हैं, जिससे उनके बीच मूवमेंट और दबाव पैदा होता है।
स्टेज 3: झटके को सोख लेना
यही सबसे महत्वपूर्ण स्टेप होता है। जब रॉड्स उन स्टील के गोलों के बीच से गुजरते हैं, तब उनके बीच बहुत ज्यादा फ्रिक्शन या घर्षण पैदा होता है। यही भूकंप की काइनैटिक एनर्जी (गतिज ऊर्जा) को हीट में बदल देता है। आसान भाषा में कहें तो जो ताकत इमारत की दीवारों और पिलर्स को नुकसान पहुंचा सकती थी, उसका बड़ा हिस्सा यह उपकरण अपने अंदर ही ‘सोख’ लेता है। शुरुआती टेस्टिंग में इस सिस्टम ने लगभग 14 प्रतिशत तक स्वे या वाइब्रेशन कम करने की क्षमता दिखाई है।
बिजली की जरूरत ही नहीं
नई टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसे काम करने के लिए बिजली, सेंसर या कंप्यूटर सिस्टम की जरूरत नहीं पड़ती। बड़े भूकंपों के दौरान अक्सर बिजली चली जाती है और कई इलेक्ट्रॉनिक सेफ्टी सिस्टम फेल हो जाते हैं। लेकिन यह सिस्टम पूरी तरह मैकेनिकल फिजिक्स पर बेस्ड है, इसलिए ब्लैकआउट की स्थिति में भी काम करता रह सकता है।
पुरानी इमारतों में आएगा काम
एक और बड़ा दावा यह है कि इसे पुरानी इमारतों और पुलों में भी लगाया जा सकता है। यानी किसी मौजूदा स्ट्रक्चर को पूरी तरह तोड़े बिना भी इसमें यह सिस्टम जोड़ा जा सकता है। यही वजह है कि इसे विकासशील देशों के लिए संभावित लो-कॉस्ट सॉल्यूशन माना जा रहा है। यही नहीं, इसकी मेंटिनेंस भी तुलनात्मक रूप से आसान बताई जा रही है। अगर कोई हिस्सा खराब हो जाए, तो पूरी मशीन बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी और केवल खराब हिस्सों को बदला जा सकेगा।
लेखक के बारे में
Pranesh Tiwariप्राणेश वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां वे पिछले चार वर्षों से
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चाहे वह किसी नए AI टूल की पड़ताल हो या किसी अनदेखी जगह की यात्रा.. प्राणेश का लक्ष्य हमेशा एक बेहतरीन कहानी बुनना ही
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