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नमक से चलेंगी इलेक्ट्रिक कारें और मिलेगी बिजली, आ गई खास Saltwater battery टेक्नोलॉजी

नमक से चलेंगी इलेक्ट्रिक कारें और मिलेगी बिजली, आ गई खास Saltwater battery टेक्नोलॉजी

संक्षेप:

Saltwater बैटरियां लिथियम-आयन का सेफ, सस्ता और इनवायरमेंट-फ्रेंडली ऑप्शन बनकर तेजी से उभर रही हैं। हालांकि एनर्जी डेंसिटी अभी चुनौती है, लेकिन सोलर स्टोरेज और ऑफ-ग्रिड सिस्टम्स में इनका भविष्य मजबूत दिख रहा है।

Dec 09, 2025 09:08 pm ISTPranesh Tiwari लाइव हिन्दुस्तान
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दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती बनकर ईंधन की कमी सामने आ सकती है और इसके लिए लगातार समाधार खोजे जा रहे हैं। इन दिनों एक नया नाम चर्चा में है- Saltwater बैटरियां। ये बैटरियां ट्रेडिशनल लिथियम-आयन टेक्नोलॉजी से बिल्कुल अलग फिलॉसफी पर काम करती हैं और इसी वजह से इन्हें एनर्जी इंडस्ट्री का अगला बड़ा ब्रेकथ्रू माना जा रहा है।

ट्रेडिशनल बैटरीज में जहां लिथियम, कोबाल्ट और अन्य रेयर मेटल्स का इस्तेमाल होता है, वहीं Saltwater बैटरियां साधारण नमक, सोडियम या अन्य सस्ते कंपाउंड्स को आधार बनाती हैं। इसका मतलब है कि ना सिर्फ इन्हें बनाना आसान है बल्कि इनके प्रोडक्शन में पर्यावरण को भी कम नुकसान पहुंचता है। यही वजह है कि साइंटिस्ट और कंपनियां इसे भविष्य के लिए एक टिकाऊ ऑप्शन मान रहे हैं।

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ऐसे काम करेंगी नई बैटरीज

बैटरियों के काम करने का तरीका भी आसान है। चार्जिंग के दौरान इलेक्ट्रोड्स के बीच सोडियम आयनों का आनाजाना होता है और इसी मूवमेंट से एनर्जी स्टोर होती है। यह प्रोसेस लिथियम बैटरियों की तुलना में कहीं ज्यादा सेफ मानी जाती है क्योंकि Saltwater बैटरियों में कोई ज्वलनशील केमिकल्स मौजूद नहीं होते। यानी कि इनमें आग लगने या ओवरहीट होने का खतरा बेहद कम हो जाता है।

सुरक्षा के अलावा इन बैटरियों की एक बड़ी खूबी है- इनका तापमान सहने का दायरा। गर्मी, ठंड या नमी- यह तकनीक किसी भी मौसम में स्टेबल परफॉर्मेंस दे सकती है। इसी वजह से सोलर बैकअप, घरेलू एनर्जी स्टोरेज और माइक्रोग्रिड जैसी जगहों पर यह तेजी से लोकप्रिय हो रही है। खासकर उन इलाकों में जहां बिजली की सप्लाई अनियमित है, Saltwater बैटरियां एक भरोसेमंद सॉल्यूशन साबित हो सकती हैं।

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फिलहाल इस टेक की कुछ सीमाएं

हालांकि, हर उभरती तकनीक की तरह इसकी भी कुछ सीमाएं हैं। Saltwater बैटरियों की एनर्जी डेंसिटी अभी उतनी ज्यादा नहीं है कि इन्हें बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक कारों में लगाया जा सके। कम एनर्जी डेंसिटी का मतलब है कि या तो बैटरी का आकार बहुत बड़ा होगा या फिर वाहन की रेंज कम मिलेगी। यही प्रमुख वजह है कि EV मार्केट अभी भी लिथियम-आयन बैटरियों पर निर्भर है।

इसके अलावा, इसका कमर्शियल प्रोडक्शन अभी शुरुआती चरण में है। कुछ कंपनियां और रिसर्च लैब्स इस पर काम कर रही हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर निर्माण, सप्लाई चेन और स्टेबल परफॉर्मेंस को लेकर कई चुनौतियां अभी बाकी हैं।

Pranesh Tiwari

लेखक के बारे में

Pranesh Tiwari
खुद को दिल से लेखक और पेशे से पत्रकार बताने वाले प्राणेश 7 साल से ज्यादा वक्त से विज्ञान और तकनीक के बारे में लिख रहे हैं। IIMC, नई दिल्ली में PTI अवॉर्ड पाने वाले प्राणेश ने करियर की शुरुआत नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से की और न्यूजबाइट्स में सीनियर टेक जर्नलिस्ट के तौर पर भी काम किया। लाइव हिन्दुस्तान में वह चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के तौर पर लेटेस्ट टेक ट्रेंड्स और गैजेट्स की जानकारी देते हैं। उन्हें लिखना और सफर करना अच्छा लगता है। और पढ़ें

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