'सोने' जैसा कीमती हो सकता है बेकार फोन, टीवी; जानें क्यों ई-वेस्ट इकट्ठा करने में जुटी दिल्ली सरकार
जैसे-जैसे इंसान तेजी से विकसित हो रही टेक्नोलॉजी को अपना रहे हैं ई-वेस्ट की समस्या भी गंभीर होती जा रही है। हालांकि, दिल्ली सरकार ने अपनी नई EV पॉलिसी 2026 में बैटरी रीसाइक्लिंग के लिए एक खास सिस्टम बनाया है।

खराब हो चुके स्मार्टफोन की चर्चा शायद ही कभी होती है। पुराने लैपटॉप, टूटे हुए टेलीविजन या बेकार हो चुके चार्जर का भी यही हाल है। फिर भी, ये सभी बेकार गैजेट मिलकर दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाले कचरे का एक बड़ा हिस्सा बन गए हैं। आपकी नजर में भले ही कबाड़ हो चुका फोन, टीवी या अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम बेकार हो, लेकिन इनमें मौजूद जरूरी चीजों को निकालकर फिर से उपयोग में लाया जा सकता है। जैसे-जैसे इंसान तेजी से विकसित हो रही टेक्नोलॉजी को अपना रहे हैं, इलेक्ट्रॉनिक कचरे (यानी ई-वेस्ट) की समस्या दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही है। इतना ही नहीं, जब देश भविष्य की ओर कदम बढ़ाते हैं, तब भी ई-वेस्ट की समस्या बनी रहती है।
उदाहरण के लिए, जब भारत इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो ई-वेस्ट (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) का मुद्दा भी सामने आता है; क्योंकि अगर वाहनों में इस्तेमाल होने वाली बैटरियों का सही तरीके से मैनेज न किया जाए, तो वे इलेक्ट्रॉनिक कचरे के ढेर में बदल सकती हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि दिल्ली ने इस समस्या को समय रहते ही पहचान लिया है, इससे पहले कि यह बेकाबू हो जाए।
दिल्ली सरकार ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और उनके प्रशासन द्वारा पेश की गई अपनी नई EV पॉलिसी 2026 में बैटरी रीसाइक्लिंग के लिए एक खास सिस्टम बनाया है।
हालांकि इस पॉलिसी का मुख्य मकसद इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को तेजी से बढ़ाना और सर्दियों में होने वाले प्रदूषण से निपटना है, लेकिन बैटरी वेस्ट (कचरे) से जुड़े इसके प्रावधान यह दिखाते हैं कि सरकारें इलेक्ट्रॉनिक कचरे को देखने के नजरिए में एक अहम बदलाव ला रही हैं; वे इसे सिर्फ फेंकने लायक कचरा नहीं, बल्कि एक कीमती संसाधन मान रही हैं जिसे सुरक्षित रूप से इकट्ठा करके रीसायकल और दोबारा इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
दिल्ली सरकार की नई ई-वेस्ट पॉलिसी क्या है?
इंडिया टूडे ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इस पॉलिसी के तहत, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) को इस्तेमाल के बाद बेकार हो चुकी बैटरी (end-of-life batteries) को इकट्ठा करने, स्टोर करने, ट्रांसपोर्ट करने और रीसायकल करने के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOPs) बनाने वाली मुख्य संस्था बनाया गया है। यह फ्रेमवर्क 'बैटरी वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2022' के भी अनुरूप है, जिसके तहत बनाने वाली कंपनियों (प्रोड्यूसर्स) के लिए इस्तेमाल हो चुकी बैटरी को इकट्ठा करना और रीसायकल करना जरूरी है। हालांकि यह पहल EV बैटरी पर केंद्रित है, लेकिन यह भारत के सामने मौजूद एक बहुत बड़ी समस्या की ओर भी ध्यान दिलाती है। यह समस्या है भारत में तेजी से बढ़ रहा ई-वेस्ट संकट।
ई-वेस्ट क्या है और भारत में यह इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहा है?
ई-वेस्ट का मतलब है बेकार हो चुके इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, जैसे मोबाइल फोन, कंप्यूटर, टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, बैटरी, चार्जर और ऐसे ही कई अन्य डिवाइस जिनका इस्तेमाल अब नहीं किया जा सकता। आम घरेलू कचरे के उलट, इलेक्ट्रॉनिक कचरे में अक्सर लेड, कैडमियम, क्रोमियम और ब्रोमिनेटेड फ्लेम रिटार्डेंट्स जैसे खतरनाक पदार्थ होते हैं। जब इन्हें लैंडफिल में फेंका जाता है, खुले में जलाया जाता है या असुरक्षित तरीकों से तोड़ा जाता है, तो ये पदार्थ मिट्टी, पानी और हवा को प्रदूषित कर सकते हैं, जिससे पर्यावरण और लोगों की सेहत, दोनों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
लेकिन, ई-वेस्ट बिल्कुल भी बेकार नहीं है। इसमें सोना, चांदी, तांबा, एल्युमीनियम, लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसी कीमती धातुएं होती हैं। इन सभी को दोबारा हासिल करके इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण और नए कच्चे माल के खनन की जरूरत, दोनों ही कम हो जाते हैं।
पर्यावरणविद् और इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के पैनल में शामिल लेखकों में से एक, अंजल प्रकाश ने कहा, "ई-वेस्ट सिर्फ निपटान की समस्या नहीं है, बल्कि यह गवर्नेंस और जन-स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या है और साथ ही संसाधनों की रिकवरी का एक मौका भी है।"
लेकिन ई-वेस्ट का मैनेज करना बिल्कुल भी आसान नहीं है
प्रकाश ने कहा कि ई-वेस्ट के असरदार मैनेजमेंट के लिए ट्रेस करने लायक कलेक्शन सिस्टम, सुरक्षित स्टोरेज, ऑथराइज्ड रीसाइक्लिंग और पूरी वैल्यू चेन में जवाबदेही की जरूरत है - जिसमें प्रोड्यूसर और बड़े कंज्यूमर से लेकर रीसाइक्लर और लोकल बॉडीज तक शामिल हैं। भारत के संशोधित ई-वेस्ट नियमों में पहले से ही यह ढांचा मौजूद है, जिसके तहत सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना और वेस्ट को ऑथराइज्ड रीसाइक्लर तक पहुंचाना जरूरी है। फिर भी एक सवाल बाकी है। क्या इतना काफी है?
हर साल बढ़ता कचरा
2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में दुनिया भर में रिकॉर्ड 62 मिलियन टन ई-वेस्ट (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) पैदा हुआ, लेकिन इसमें से सिर्फ 22.3% को ही सही तरीके से इकट्ठा और रीसायकल किया गया। रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि अगर यही ट्रेंड जारी रहा, तो 2030 तक यह आंकड़ा बढ़कर 82 मिलियन टन हो जाएगा। भारत भी इस ट्रेंड का हिस्सा है। देश में तेजी से हो रहे डिजिटलाइजेशन ने रोजमर्रा की जिंदगी को तो बदल दिया है, लेकिन साथ ही बेकार हो चुके इलेक्ट्रॉनिक्स की मात्रा में भी भारी बढ़ोतरी की है। वित्त वर्ष 2024 में भारत में लगभग 3.8 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) ई-वेस्ट पैदा हुआ, जिससे यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ई-वेस्ट पैदा करने वाला देश बन गया।
सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के डेटा के अनुसार, भारत में सालाना ई-वेस्ट (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) का उत्पादन 2019-20 में 1.01 मिलियन मीट्रिक टन से बढ़कर 2023-24 में 1.751 मिलियन मीट्रिक टन हो गया है, जो भारत के लिए तेजी से बढ़ती ई-वेस्ट की चुनौती को दिखाता है। हालांकि पिछले कुछ सालों में ऑथराइज्ड रीसायकलर्स तक पहुंचने वाले कचरे की मात्रा बढ़ी है, फिर भी एक बड़ी मात्रा अभी भी औपचारिक रीसाइक्लिंग चेन से बाहर है। सरकारी डेटा यह भी दिखाता है कि दिल्ली ने 2021-22 में 2,130.79 टन ई-वेस्ट को प्रोसेस किया, जिससे पता चलता है कि राजधानी में पहले से ही एक चालू रीसाइक्लिंग सिस्टम मौजूद है, भले ही इस चुनौती का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
क्या यह सही दिशा में उठाया गया कदम है?
जानकारों का कहना है कि दिल्ली का नया बैटरी रीसाइक्लिंग फ्रेमवर्क अहम है, क्योंकि यह भविष्य में पैदा होने वाले कचरे की समस्या से अभी ही निपट रहा है, ताकि यह आज के ई-कचरे की समस्या जितना बड़ा न हो जाए।
ई-वेस्ट और लिथियम-आयन बैटरी रीसाइक्लिंग में माहिर टेक कंपनी 'एटेरो' (Attero) के को-फाउंडर और CEO नितिन गुप्ता ने कहा, "दिल्ली की अपडेटेड EV पॉलिसी सिर्फ मोबिलिटी में बदलाव का प्लान नहीं है; यह भविष्य में बैटरी और ई-वेस्ट मैनेजमेंट से जुड़ी उस चुनौती की शुरुआत भी है, जिसका समाधान पहले दिन से ही किया जाना चाहिए।"
जैसे-जैसे ईवी अपनाने में तेजी आएगी, शहरों में अनिवार्य रूप से जीवन-पर्यंत लिथियम-आयन बैटरी, चार्जर और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स की मात्रा में वृद्धि देखी जाएगी। यदि ये सामग्रियां अनौपचारिक रीसाइक्लिंग चैनलों में प्रवेश करती हैं, तो वे लिथियम, कोबाल्ट, निकल और ग्रेफाइट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों को बर्बाद करते हुए मिट्टी और पानी को दूषित कर सकती हैं, ये सभी संसाधन हैं जिन्हें भारत वर्तमान में बड़ी मात्रा में आयात करता है।
नितिन गुप्ता ने कहा कि दिल्ली के वेस्ट मैनेजमेंट को औपचारिक बनाने और जवाबदेही बेहतर करने पर जोर देने से यह सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है कि ज़्यादा से ज़्यादा बेकार बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक सामान अनौपचारिक प्रोसेसिंग नेटवर्क के बजाय ऑथराइज्ड रीसाइक्लिंग प्लांट्स तक पहुंचें।
लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सिर्फ कलेक्शन के लक्ष्य ही काफी नहीं होंगे। इसके लिए ग्राहकों में जागरूकता, कलेक्शन का बेहतर सिस्टम, ट्रेसबिलिटी, प्रोड्यूसर की जिम्मेदारी और रीसाइक्लिंग का आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर भी जरूरी होगा।
चीजों को दोबारा यूज में लाया जा सकेगा
दिल्ली का बैटरी रीसाइक्लिंग फ्रेमवर्क भारत की ई-वेस्ट (इलेक्ट्रॉनिक कचरे) की समस्या को रातों-रात हल नहीं करेगा। लेकिन यह सोच में आए एक बड़े बदलाव को दिखाता है। जैसे-जैसे भारत डिजिटल हो रहा है और लाखों नए इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और EV बैटरी बाजार में आ रहे हैं, इन चीजों को इकट्ठा करने, रीसायकल करने और उनसे दोबारा सामग्री हासिल करने की देश की क्षमता और भी जरूरी हो जाएगी। मौजूदा नियमों को सख्ती से लागू करना, लोगों में जागरूकता बढ़ाना और ऑथराइज्ड रीसाइक्लिंग नेटवर्क का विस्तार करना बहुत जरूरी होगा। इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि कीमती संसाधन लैंडफिल या अनौपचारिक कबाड़ बाजारों में खत्म होने के बजाय दोबारा इस्तेमाल में आते रहें।
इसलिए, दिल्ली की यह नई पहल सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहनों या प्रदूषण से लड़ने से कहीं ज्यादा है। यह एक 'सर्कुलर इकॉनमी' (चक्रीय अर्थव्यवस्था) बनाने की दिशा में एक शुरुआती कदम है, जिसमें पुराने इलेक्ट्रॉनिक्स भविष्य में प्रदूषण बनने के बजाय भविष्य के लिए कच्चा माल बन जाते हैं।
लेखक के बारे में
Arpit Soniअर्पित सोनी को शुरुआत से ही नए-नए गैजेट्स को एक्सप्लोर करने और उन्हें आजमाने का शौक रहा है। अब अर्पित ने अपनी इस हॉबी को ही अपना पेशा बना लिया है। भोपाल के रहने वाले अर्पित को नए-नए गैजेट्स का रिव्यू करना और उनके बारे में लिखना काफी पसंद है। टेक्नोलॉजी, रोबोट्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इनसे जुड़ी खबरें लिखना भी इन्हें काफी भाता है। लाइव हिन्दुस्तान में अर्पित पिछले चार साल से बतौर सीनियर कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रहे हैं। मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें करीब 9 साल का अनुभव है। अर्पित ने मीडिया जगत में शुरुआत एक रीजनल चैनल से की थी। इससे बाद उन्होंने नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर की गैजेट्स बीट में काम किया। अर्पित की स्कूलिंग भोपाल से हुई है। उन्होंने कंप्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग की है। मीडिया में झुकाव के चलते उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU) से पोस्ट ग्रेजुएशन करके मीडिया जगत में एंट्री की। मीडिया में इन्हें आठ साल से ज्यादा समय हो चुके हैं और सफर अभी जारी है। गैजेट्स के अलावा, इन्हें नई-नई जगहों पर घूमना और उनके बारे में जानने का भी बहुत शौक है।
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