छोटे शहरों का बड़ा खेल: UBON कैसे बना ऑफलाइन मार्केट का किंग? को-फाउंडर से खास बातचीत
एक्सेसरीज ब्रैंड UBON ने टियर-2 और टियर-3 मार्केट को समझकर अपनी पूरी बिजनेस स्ट्रेटजी तैयार की और यही वजह है कि यह ब्रैंड आज ऑफलाइन मार्केट में मजबूत पकड़ बना चुका है। हमने इस बारे में और जानने के लिए को-फाउंडर ललित अरोड़ा से बात की।

भारत की असली तस्वीर मेट्रो शहरों की चमक के बजाय छोटे शहरों और कस्बों की रोजमर्रा की जिंदगी में बसती है। यही वह मार्केट है, जिसे अक्सर कई अनदेखा कर देते हैं लेकिन भारतीय कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रैंड UBON ने इसी बाजार को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है। कंपनी की स्ट्रेटजी और भारतीय मार्केट में सफलता के फॉर्मूला को समझने के लिए लाइव हिन्दुस्तान ने UBON के को-फाउंडर ललित अरोड़ा से बात की। उन्होंने बताया कि कैसे कंपनी की आज की सफलता कई साल की रिसर्च और मेहनत की नींव पर खड़ी है।
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ललित कहते हैं कि अगर आपको भारत को समझना है तो टियर-2 और टियर-3 शहरों को समझना होगा। यही वजह मार्केट है, जहां सबसे ज्यादा डिमांड है लेकिन सप्लाई और ब्रैंड-ट्रस्ट बनना बाकी है। उन्होंने बताया कि UBON ने इस गैप को पहचान और इसे भरते हुए ही अपनी पहचान बनाई है। कंपनी की सफलता का बड़ा श्रेय वह मजबूत ऑफलाइन डिस्ट्रिब्यूशन नेटवर्क को देते हैं। ऐसे दौर में जब ऑनलाइन शॉपिंग घर-घर की कहानी बन चुकी है, उनका ऑफलाइन मार्केट पर भरोसा करना सकारात्मक फैसला रहा।
डिस्ट्रिब्यूशन नेटवर्क सबसे बड़ी ताकत
छोटे शहरों में ग्राहक अक्सर ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स के बजाय उस दुकानदार पर भरोसा करना बेहतर समझते हैं, जिसे वे जानते हैं। ऐसे में अगर ब्रैंड की मौजूदगी हर लोकल दुकान तक हो तो उसकी असली ताकत बन जाती है। ललित कहते हैं, यही वजह है कि हम सिर्फ प्रोडक्ट बेचने पर नहीं ब्लिक रिटेलर और डिस्ट्रिब्यूटर के साथ मजबूत रिश्ते बनाने पर फोकस करते हैं। उन्होंने बताया कि कंपनी की सेल का करीब 98 प्रतिशत हिस्सा ऑफलाइन मार्केट से आता है।
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स्पीड और भरोसे का बैलेंस भी जरूरी
एक और महत्वपूर्ण बिन्दु पर फोकस करते हुए ललित ने कहा कि सिर्फ टियर-2 और टियर-3 मार्केट में मौजूद रहना काफी नहीं है बल्कि वहां समय पर प्रोडक्ट उपलब्ध रहना भी जरूरी है। उन्होंने बताया कि ब्रैंड की 'स्टॉक इज किंग' स्ट्रेटजी यहीं काम आती है। कंपनी हमेशा इन्वेंटरी तैयार रखती है, जिससे डीलर और कस्टमर्स को इंतजार ना करना पड़े। जब किसी ग्राहक को तुरंत जरूरत का प्रोडक्ट मिल जाता है, तो ब्रैंड पर उसका भरोसा बनता है। इसके अलावा आसान वारंटी क्लेम और आफ्टर-सेल सर्विसेज भी ग्राहकों से रिलेशन मजबूत बनाती हैं।
अफॉर्डेबल प्राइस पर मिलती है वैराइटी
UBON की प्रोडक्ट रेंज कंपनी की सबसे बड़ी स्ट्रेंथ में से एक है। कंपनी सैकड़ों से हजारों रुपये तक कीमत वाले चार्जर, डेटा केबल, इयरफोन, हेडफोन, नेकबैंड, पावरबैंक, ट्राइपॉड और कॉलर माइक्स सबकुछ ऑफर कर रही है। अफॉर्डेबल प्राइस पर कंपनी ने इनके लिए बड़ा मार्केट तैयार किया है और हर प्राइस पॉइंट को कवर करने के लिए इन डिवाइसेज की वैराइटी भी इसके पोर्टफोलियो का हिस्सा है। उन्होंने बताया कि कंपनी 70 प्रतिशत मोबाइल एक्सेसरीज भारत में मैन्युफैक्चर करती है। साथ ही ब्रैंड का फोकस इस लोकल प्रोडक्शन को और भी बढ़ाने पर है।
नई कैटेगरी में कदम रख चुकी है कंपनी
खास बात यह है कि UBON मौजूदा ग्राहकों की जरूरतें पूरी करने के अलावा नए एक्सपेरिमेंट करने और रिस्क लेने से नहीं चूकती। हाल ही में ब्रैंड ने किचन अप्लायंसेज कैटेगरी में कदम रखा है, जिसमें एग बॉयलर, कॉफी मेकर, जूसर, मिक्सर और 3-इन-1 ब्रेकफास्ट मेकर जैसे प्रोडक्ट्स शामिल हैं। साथ ही क्रिएटर्स के लिए माइक्रोफोन और गिंबल ट्राइपॉड भी हाल ही में लॉन्च किए गए हैं। ललित ने कहा कि कंपनी लगातार इनोवेट कर रही है और 'कंफर्ट जोन' में सिमटकर नहीं रहना चाहती।
बदलते मार्केट डायनमिक्स के सवाल पर ललित ने कोविड-19 लॉकडाउन का उदाहरण देते हुए बताया कि जहां कई बिजनेस प्रभावित हुए, UBON ने बदलती डिमांड को जल्दी से समझा। लॉकडाउन में स्पीकर, चार्जर और इयरफोन्स की डिमांड बढ़ी और वहीं पावरबैंक जैसे एक्सेसरीज की सेल तेजी से घट गई। यह कंपनी की फ्लेक्सिबिलिटी और मार्केट अंडरस्ट्रैंडिंग दिखाता है। उन्होंने बताया कि लगातार सीखते रहना और ऑब्जर्वेशन तय करता है कि उन्हें मार्केट में अगला प्रोडक्ट क्या लॉन्च करना है।
आसान भाषा में समझें तो भारत में सफलता के लिए UBON का भरोसेमंद डिस्ट्रिब्यूशन चैनल, तुरंत उपलब्ध स्टॉक और मास मार्केट के लिए सही प्राइसिंग जिम्मेदार हैं। इस कॉम्बिनेशन ने UBON को उस ऑफलाइन मार्केट का बड़ा नाम बना दिया, जहां ढेरों बड़े ब्रैंड्स की पकड़ अब भी सीमित है।
लेखक के बारे में
Pranesh Tiwariप्राणेश वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां वे पिछले चार वर्षों से
टेक्नोलॉजी सेक्शन का अहम हिस्सा हैं। खुद को दिल से लेखक और पेशे से पत्रकार मानने वाले प्राणेश के पास पत्रकारिता के
क्षेत्र में आठ वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने अपने पूरे करियर में साइंस और टेक्नोलॉजी की जटिलताओं को आम पाठकों के
लिए सरल, सहज और रोचक भाषा में प्रस्तुत करने पर विशेष ध्यान दिया है।
विशेषज्ञता और कार्यशैली
प्राणेश की विशेषज्ञता गैजेट्स, टेक इनसाइट्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे विषयों में है। वे तकनीकी बारीकियों और
कठिन शब्दावली को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि एक सामान्य पाठक भी तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया को आसानी से समझ सके। लेटेस्ट
गैजेट्स का रिव्यू करना और नए मोबाइल ऐप्स के फीचर्स को आजमाना उनके काम का पसंदीदा हिस्सा है। उनकी लेखन शैली में स्पष्टता,
रिसर्च और कहानी कहने का संतुलन देखने को मिलता है।
अब तक का सफर और उपलब्धियां
प्राणेश ने अपने प्रोफेशनल करियर की शुरुआत नवभारत टाइम्स ऑनलाइन से की। इसके बाद उन्होंने न्यूजबाइट्स (NewsBytes) में
सीनियर टेक जर्नलिस्ट के रूप में काम किया, जहां उन्होंने तकनीकी रिपोर्टिंग में अपनी अलग पहचान बनाई। वे भारतीय जनसंचार
संस्थान (IIMC), नई दिल्ली के पूर्व छात्र हैं और अपनी प्रतिभा के लिए प्रतिष्ठित PTI अवॉर्ड से सम्मानित हो चुके हैं।
लेखन और व्यक्तिगत रुचियां
पत्रकारिता के साथ-साथ प्राणेश एक संवेदनशील और रचनात्मक लेखक भी हैं। लॉकडाउन के दौरान उन्होंने ‘सिर्फ दोस्त: नए जमाने की
प्रेम कहानियां’ नामक लघुकथा संग्रह लिखा, जिसमें रिश्तों की बारीकियों को भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है।
उन्हें स्मार्टफोन, कंज्यूमर टेक और डिजिटल इनोवेशन से जुड़े विषयों पर गहराई से रिसर्च करना और पढ़ना पसंद है। काम के
अलावा, उन्हें यात्रा करना भी बेहद पसंद है। उनके लिए यात्राएं केवल सुकून का जरिया नहीं, बल्कि नए अनुभवों और कहानियों को
खोजने का तरीका हैं।
चाहे वह किसी नए AI टूल की पड़ताल हो या किसी अनदेखी जगह की यात्रा.. प्राणेश का लक्ष्य हमेशा एक बेहतरीन कहानी बुनना ही
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