Explainer: महिला आरक्षण पर राजी, फिर किस बात की परेशानी; सोनिया गांधी समेत विपक्ष क्या बोला
राज्यों की विधानसभाओं में भी यह आरक्षण लागू होगा और उसके लिए भी विधानसभा की सीटें नए सिरे से तय होंगी। प्रस्तावित विधेयक में कहा गया है कि लोकसभा एवं विधानसभा की सीटों में 50 फीसदी का इजाफा किया जाएगा। विपक्ष की ओर से महिला आरक्षण को लेकर सैद्धांतिक समर्थन दिखता है। फिर भी विरोध के सुर हैं।

महिला आरक्षण अधिनियम में संशोधन के लिए 16 अप्रैल से तीन दिन का विशेष सत्र आयोजित होना है। इस दौरान संशोधन विधेयकों को मंजूरी दिलाने की सरकार कोशिश करेगी। इसके तहत महिला आरक्षण को 2029 के आम चुनाव से ही लागू किया जाएगा और उसके लिए लोकसभा सीटों का परिसीमन होगा। यही नहीं राज्यों की विधानसभाओं में भी यह आरक्षण लागू होगा और उसके लिए भी विधानसभा की सीटें नए सिरे से तय होंगी। प्रस्तावित विधेयक में कहा गया है कि लोकसभा एवं विधानसभा की सीटों में 50 फीसदी का इजाफा किया जाएगा। विपक्ष की ओर से महिला आरक्षण को लेकर सैद्धांतिक समर्थन दिखता है। फिर भी विरोध के सुर हैं।
ये विरोध के स्वर महिला आरक्षण के खिलाफ तो नहीं दिखते, लेकिन परिसीमन को लेकर कई दलों को आपत्ति है। कांग्रेस की सीनियर नेता सोनिया गांधी का कहना है कि नई जनगणना जो जारी है, उसके समापन होने के बाद ही इसे लागू किया जाए। उनका कहना है कि यदि तब तक के लिए महिला आरक्षण को रोक ही लिया जाए तो कौन सा आसमान फट पड़ेगा? परिसीमन को लेकर उनका कहना है कि इससे कई राज्यों पर असर पड़ेगा। सरकार को यह गारंटी देनी चाहिए कि किसी भी राज्य के सीटों के अनुपात में अंतर नहीं आएगा।
हालांकि यहां बता दें कि सरकार कह चुकी है कि 2011 की जनगणना के अनुपात में ही सीटें बढ़ेंगी। इसका अर्थ है कि यदि यूपी में 80 सीटें हैं तो 120 हो जाएंगी और महाराष्ट्र में 48 से 72 और बिहार में 40 से 60 का आंकड़ा हो जाएगा। फिर भी सीपीएम की नेता बृंदा करात समेत कई विपक्षी नेताओं का कहना है कि परिसीमन वाली बात ही गलत है। उनकी मांग है कि राज्यसभा में 2010 में जो महिला आरक्षण विधेयक आया था, उसे लागू किया जाए। उसमें परिसीमन का कोई प्रस्ताव नहीं था। उससे सभी राज्यों के हितों को बचाया जा सकेगा।
क्या है सोनिया गांधी की 29 अप्रैल वाली दलील
वहीं सोनिया गांधी की एक और दलील है कि यदि विधानसभा चुनाव संपन्न हो जाए और उसके बाद यह विधेयक आएं तो क्या आपत्ति है। उनका कहना है कि 29 अप्रैल को बंगाल में वोटिंग के बाद सरकार को सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए। उसमें प्रस्ताव रखा जाए और विपक्ष की भी राय लेकर सदन बुलाया जाए। उन्होंने कहा कि मुख्य मुद्दा तो अब महिला आरक्षण नहीं है। इसकी बजाय चिंता यह है कि कैसे संविधान को बचाया जाए, जिसे मोदी सरकार पीछे के रास्ते से नुकसान पहुंचाना चाहती है। एक अन्य लेफ्ट लीडर ने कहा कि परिसीमन पर सरकार को राय स्पष्ट करनी चाहिए। इसके अलावा खुलकर दक्षिण भारत के राज्यों के बारे में भी बात करनी चाहिए।
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