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सिर्फ तेल का कुआं नहीं, ईरान एक 'किला' है: अमेरिका से टक्कर के बीच कैसे टिका है यह मुल्क?

सिर्फ तेल का कुआं नहीं, ईरान एक 'किला' है: अमेरिका से टक्कर के बीच कैसे टिका है यह मुल्क?

संक्षेप:

दुनिया अक्सर ईरान को सिर्फ एक तेल उत्पादक देश के तौर पर देखती है, जिसे अमेरिकी प्रतिबंधों ने जकड़ रखा है। लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा पेचीदा है। ईरान ने कई मौकों पर अपनी कमजोरियों को ही अपना हथियार बनाया है।

Jan 17, 2026 11:07 am ISTAmit Kumar लाइव हिन्दुस्तान, तेहरान
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मध्य पूर्व का नक्शा जब भी सुलगता है, तो धुएं के पीछे कहीं न कहीं तेहरान की परछाई जरूर नजर आती है। दशकों से अमेरिका के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों को झेल रहा ईरान आज भी वैश्विक राजनीति के केंद्र में बना हुआ है। सवाल यह है कि जिस देश की अर्थव्यवस्था का गला घोंटने की कोशिश दुनिया की सुपरपावर ने की हो, वह आज भी अपनी शर्तों पर कैसे खड़ा है?

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जवाब साफ है- ईरान की ताकत सिर्फ उसका 'तेल' नहीं है। उसने पिछले 40 सालों में एक ऐसा 'इकोसिस्टम' तैयार किया है, जो उसे बिना सीधे युद्ध लड़े अपने दुश्मनों को चोट पहुंचाने की ताकत देता है। आइए समझते हैं कि आखिर ईरान का वह कौन सा 'दम' है, जिसके बूते वह अमेरिका और इजरायल के सामने नहीं झुक रहा।

होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया की 'दुखती रग' पर अंगूठा

ईरान के पास सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र कोई परमाणु बम नहीं, बल्कि उसकी भौगोलिक स्थिति है। ईरान 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' यानी होर्मुज जलडमरूमध्य के उत्तर में बैठा है। यह समुद्र का वह संकरा रास्ता है, जहां से दुनिया का लगभग 20-30% तेल गुजरता है।

जब भी अमेरिका या इजरायल से तनाव बढ़ता है, ईरान बस इस रास्ते को बंद करने की धमकी देता है। अगर ईरान ने यहां कुछ माइन्स बिछा दीं या जहाज रोके, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। यह वह 'स्विच' है जिसे ईरान ने अपने कंट्रोल में रखा है।

प्रॉक्सी नेटवर्क: 'रिंग ऑफ फायर'

ईरान की सबसे बड़ी रणनीतिक जीत उसका 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' यानी प्रतिरोध की धुरी है। ईरान ने अपने देश के बाहर लड़ाकों का एक ऐसा नेटवर्क खड़ा किया है, जो उसके लिए लड़ते हैं।

  • लेबनान में हिजबुल्लाह: जो इजरायल की नाक में दम किए हुए है।
  • यमन में हूती विद्रोही: जिन्होंने हाल ही में लाल सागर में जहाजों पर हमले करके पूरी दुनिया के ट्रेड रूट को हिला दिया।
  • गाजा में हमास और इराक में शिया मिलिशिया।

यह नेटवर्क ईरान को यह सुविधा देता है कि वह सीधे युद्ध में उतरे बिना अपने दुश्मनों (अमेरिका और इजरायल) को उलझाए रखे। इसे 'असिमेट्रिक वारफेयर' कहते हैं, जिसमें कम खर्च में दुश्मन को बड़ा नुकसान पहुंचाया जाता है।

सस्ता लेकिन घातक: ड्रोन और मिसाइल प्रोग्राम

यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को ईरान की एक नई ताकत से रूबरू कराया- उसके 'शाहेद ड्रोन'। जब रूस जैसे महाशक्तिशाली देश को हथियारों की कमी पड़ी, तो उसने ईरान का दरवाजा खटखटाया।

प्रतिबंधों के कारण ईरान आधुनिक वायु सेना नहीं बना पाया, तो उसने उसका तोड़ 'मिसाइलों और ड्रोन' में ढूंढ लिया। आज ईरान के पास मध्य पूर्व का सबसे बड़ा मिसाइल जखीरा बताया जाता है। हाल ही में ईरान ने 'फतह' नामक हाइपरसोनिक मिसाइल बनाने का दावा किया, जो आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम को भी चकमा दे सकती है। यह तकनीक उसे क्षेत्र में एक बड़ी सैन्य शक्ति बनाती है। फतह मिसाइल को पहली बार 2023 में सार्वजनिक किया गया था और इसका नाम ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने रखा था।

नए दोस्तों की तलाश: चीन और रूस का साथ

ईरान ने समझ लिया है कि पश्चिम के साथ रिश्ते सुधरने वाले नहीं हैं, इसलिए उसने 'लुक ईस्ट' की नीति अपनाई।

चीन: ईरान ने चीन के साथ 25 साल का रणनीतिक समझौता किया है। चीन अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह किए बिना ईरान से तेल खरीदता है, जिससे ईरान की सांसें चलती रहती हैं।

रूस: यूक्रेन युद्ध के बाद मॉस्को और तेहरान एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए हैं। अब यह रिश्ता 'खरीदार और विक्रेता' से आगे बढ़कर रणनीतिक साझेदारी का हो गया है। हाल ही में ईरान का 'ब्रिक्स' में शामिल होना इसी कूटनीतिक जीत का हिस्सा है।

अमेरिका के आगे न झुकने की 'सजा'

इन तमाम ताकतों के बावजूद, यह सच है कि ईरान को अपनी जिद की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। यह वह पहलू है जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। अमेरिकी प्रतिबंधों ने ईरान की करेंसी (रियाल) की कमर तोड़ दी है। महंगाई चरम पर है। एक आम ईरानी नागरिक के लिए जीवन-यापन बेहद मुश्किल हो गया है।

महसा अमीनी की मौत के बाद हुए प्रदर्शनों ने दिखाया था कि जनता का एक बड़ा हिस्सा अपनी ही सरकार से नाराज है। लेकिन मौजूदा हालात उससे भी ज्यादा गंभीर हो गए। ईरान की खराब अर्थव्यवस्था के खिलाफ 28 दिसंबर 2025 को शुरू हुए प्रदर्शन धीरे-धीरे देश की धार्मिक सत्ता को चुनौती देने लगे। प्रदर्शनकारियों पर सख्त कार्रवाई में हजारों लोगों की मौत की खबरों के बीच फिलहाल तेहरान में प्रदर्शन थम गए हैं। हालांकि, इंटरनेट सेवा अब भी बंद है। अमेरिका स्थित ‘ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी’ के अनुसार, मृतकों की संख्या 3,090 तक पहुंच चुकी है, जबकि ईरान सरकार ने आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं किए हैं।

ईरान में व्यापक विरोध प्रदर्शनों और उनके खूनी दमन के बाद हालात भले ही असहज शांति की ओर लौटते दिखे हों, लेकिन इस्लामिक गणराज्य में सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर व्याप्त गुस्सा अब भी साफ नजर आ रहा है। इसी कड़ी में एक वरिष्ठ कट्टरपंथी मौलवी ने हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों के लिए शुक्रवार को मृत्युदंड की मांग की और सीधे तौर पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को धमकी दी।

बहरहाल, ट्रंप ने अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाते हुए ईरान के नेतृत्व को हिरासत में लिए गए सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को फांसी न देने के लिए धन्यवाद दिया। इसे इस बात के संकेत के रूप में देखा जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन संभावित सैन्य कार्रवाई से पीछे हट सकता है।

कट्टरपंथी मौलवी ने प्रदर्शनकारियों के लिए मृत्युदंड की मांग की

इस बीच, कट्टरपंथी मौलवी अयातुल्ला अहमद खातमी ने नमाज के लिए एकत्रित लोगों को दिए अपने उपदेश में नारे लगाने के लिए प्रेरित किया जिनमें से एक नारा था कि सशस्त्र पाखंडियों को मौत के घाट उतार दिया जाए। ईरान के सरकारी रेडियो ने इस उपदेश का प्रसारण किया। खातमी ने प्रदर्शनकारियों को इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के गुलाम और ट्रंप के सैनिक बताया। वहीं, ईरान के निर्वासित युवराज रेजा पहलवी ने अमेरिका से हस्तक्षेप का वादा निभाने की अपील की और ईरानियों से संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया। फिलहाल सरकार बाहरी दुश्मनों से तो लड़ रही है, लेकिन अंदरूनी मोर्चे पर उसे अपने ही लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है।

कुल मिलाकर ईरान एक ऐसा 'किला' है जिसकी दीवारें (अर्थव्यवस्था) भले ही कमजोर हो रही हों, लेकिन उसकी तोपें (प्रॉक्सी और मिसाइलें) अभी भी दुश्मन के खेमे में खलबली मचाने के लिए काफी हैं। वह तेल के कुएं से ज्यादा अब एक 'बारूद का ढेर' है, जिसके ऊपर बैठकर वह दुनिया की महाशक्तियों से सौदेबाजी कर रहा है। अमेरिका के लिए समस्या यह है कि वह ईरान को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता, क्योंकि इसका अंजाम पूरे मध्य पूर्व में ऐसी आग लगा सकता है जिसे बुझाना नामुमकिन होगा। यही ईरान की असली 'जीत' और 'सजा' दोनों है।

(इनपुट एजेंसी)

Amit Kumar

लेखक के बारे में

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अमित कुमार एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें मीडिया इंडस्ट्री में नौ वर्षों से अधिक का अनुभव है। वर्तमान में वह लाइव हिन्दुस्तान में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं। हिन्दुस्तान डिजिटल के साथ जुड़ने से पहले अमित ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया है। अमित ने अपने करियर की शुरुआत अमर उजाला (डिजिटल) से की। इसके अलावा उन्होंने वन इंडिया, इंडिया टीवी और जी न्यूज जैसे मीडिया हाउस में काम किया है, जहां उन्होंने न्यूज रिपोर्टिंग व कंटेंट क्रिएशन में अपनी स्किल्स को निखारा। अमित ने भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा और गुरु जंभेश्वर यूनिवर्सिटी, हिसार से मास कम्युनिकेशन में मास्टर (MA) किया है। अपने पूरे करियर के दौरान, अमित ने डिजिटल मीडिया में विभिन्न बीट्स पर काम किया है। अमित की एक्सपर्टीज पॉलिटिक्स, इंटरनेशनल, स्पोर्ट्स जर्नलिज्म, इंटरनेट रिपोर्टिंग और मल्टीमीडिया स्टोरीटेलिंग सहित विभिन्न क्षेत्रों में फैली हुई है। अमित नई मीडिया तकनीकों और पत्रकारिता पर उनके प्रभाव को लेकर काफी जुनूनी हैं। और पढ़ें

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