
ट्रेड डील को ट्रंप कैसे हुए राजी, भारत-EU में हुए समझौतों ने US को झुकाया? इनसाइड स्टोरी
वर्तमान में विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थिति काफी कमजोर बनी हुई है। बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में सुधार की कोई उम्मीद न देखते हुए, भारत ने अब द्विपक्षीय समझौतों को ही प्राथमिकता दी है।
भारत की विदेश व्यापार नीति में पिछले एक साल के भीतर एक क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिला है। लंबे समय से ठंडे बस्ते में पड़े मुक्त व्यापार समझौते (FTA) अब न केवल धरातल पर उतर रहे हैं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति के समीकरणों को भी बदल रहे हैं। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ (EU) के साथ वर्षों से जारी बातचीत को हाल ही में नई गति मिली। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों की नींव काफी मजबूत है। दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की पूरक हैं। हालांकि, हाल के समय में व्यापार से इतर कुछ मुद्दों जैसे रूस से कच्चे तेल की खरीद पर अमेरिकी दबाव और 'ऑपरेशन सिंदूर' से जुड़े दावों के कारण रिश्तों में कुछ तल्खी जरूर आई थी। रूस पर निर्भरता के कारण भारत को 25% सेकेंडरी टैरिफ का सामना करना पड़ा, जिससे एक समय ऐसा लगा कि व्यापारिक समझौता टल सकता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कूटनीतिक गलियारों में बातचीत कभी बंद नहीं हुई। जहां एक ओर पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप सीधे संपर्क में रहे, वहीं दूसरी ओर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वाशिंगटन के साथ निरंतर संवाद बनाए रखा। विशेषज्ञों का मानना है कि सर्जियो गोर की भूमिका ने दोनों देशों के बीच उपजे गतिरोध को दूर करने और व्यापारिक संबंधों को सामान्य करने में बड़ी मदद की।
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका के साथ भारत की नजदीकी ने यूरोपीय संघ (EU) को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया। ब्रुसेल्स के नौकरशाह जो अब तक व्यापारिक शर्तों पर काफी सख्त थे, अमेरिका की सक्रियता देख लचीले रुख पर आ गए। इसी का परिणाम रहा कि 27 जनवरी को भारत और यूरोपीय संघ के बीच उस समझौते की घोषणा हुई जो पिछले 18 वर्षों से लटका हुआ था। इससे पहले मई की शुरुआत में भारत और ब्रिटेन भी अपने व्यापारिक समझौते को अंतिम रूप दे चुके थे।
समझौतों की ओर बढ़ते कदम
वर्तमान में विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थिति काफी कमजोर बनी हुई है। बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में सुधार की कोई उम्मीद न देखते हुए, भारत ने अब द्विपक्षीय समझौतों को ही प्राथमिकता दी है। भारत के व्यापार वार्ताकार पिछले 12 महीनों से दुनिया के विभिन्न देशों के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं। इस रणनीति के तहत अब केवल बड़े देश ही नहीं, बल्कि न्यूजीलैंड, इजराइल और मर्कोसुर जैसे व्यापारिक ब्लॉक भी भारत की प्राथमिकता सूची में आ गए हैं।
क्या होगा इन समझौतों का असर?
इन समझौतों के केंद्र में केवल वस्तुएं ही नहीं, बल्कि सेवाओं, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), छोटे व्यवसाय, श्रम मानक और सस्टेनेबिलिटी जैसे आधुनिक विषय भी शामिल हैं। व्यापारिक समझौतों का दायरा बढ़ने से अब भारत का दो-तिहाई निर्यात प्रमुख मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के दायरे में आ गया है। देश के कुल आयात का लगभग आधा हिस्सा भी इन्हीं समझौतों के तहत कवर हो रहा है। कृषि उत्पाद, ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट जैसे क्षेत्रों में आयात-निर्यात के नए रास्ते खुले हैं।
भविष्य की राह
वाशिंगटन में भारतीय दूतावास और वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों ने उतार-चढ़ाव के बावजूद जिस तरह से बातचीत को जीवित रखा वह भारत की बढ़ती कूटनीतिक शक्ति का परिचायक है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों जैसे कि रूसी कच्चा तेल, पर समझौता किए बिना भी वैश्विक शक्तियों के साथ बराबरी के स्तर पर व्यापार कर सकता है। आने वाले समय में ये समझौते न केवल भारतीय विनिर्माण को वैश्विक पहचान दिलाएंगे, बल्कि 'मेक इन इंडिया' अभियान को भी नई उड़ान देंगे।

लेखक के बारे में
Himanshu Jhaलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




