कैसे शूट होते थे VFX जैसे दिखने वाले ये सीन? रामायण-महाभारत के मेकर्स लगाते थे यह तरकीब
रामायण और महाभारत सीरियल में VFX या AI से बना दिए गए जैसे लगने वाले सीन आज देखकर लगता है कि उस दौर में मेकर्स ने उन्हें कैसे शूट किया होगा? चलिए आज जानते हैं इस सवाल का जवाब।

याद कीजिए वो दौर जब मनोरंजन के लिए टीवी पर दूरदर्शन हमारा एक मात्र सहारा हुआ करता था। पूरा परिवार साथ बैठकर रामायण और महाभारत जैसे टीवी शोज देखा करता था। टीवी पर युद्ध वाले सीन देखने में बहुत मजा आता था। एक तरफ से एक योद्धा अपना हथियार छोड़ता और दूसरी तरफ से दूसरा, फिर हवा में दोनों के बाण (या हथियार) टकराते और फिर कोई एक गायब हो जाता। जो हथियार गायब होता उसे हारा हुआ माना जाता और इसी तरह यह युद्ध काफी देर तक चलता, लेकिन क्या आपने कभी सोचा, कि उस दौर में जब VFX, CGI और AI जैसी तकनीकें नहीं थीं, तब ये सीन तैयार किस तरह किए जाते थे?
मेकर्स करते थे इस तकनीक का यूज
चलिए आज इसी सवाल का जवाब जानते हैं। दरअसल उस दौर में डायरेक्टर्स मल्टीपल एक्सपोजर टेक्नीक का इस्तेमाल करके इस तरह के सीन रिकॉर्ड किया करते थे। यानि इस तरकीब का इस्तेमाल करके एक सीन के ऊपर दूसरे सीन को लेयर कर दिया जाता था। ऐसा करने के लिए मेकर्स पहले एक सीन को रिकॉर्ड करते थे और फिर उसी निगेटिव (रील) के ऊपर दूसरे सीन को रिकॉर्ड किया करते थे। तो चलिए समझते हैं कि 90 के दशक में टीवी पर नजर आने वाला यह चमत्कार मेकर्स करते किस तरह थे।
कैसे शूट होती थी हथियारों की टक्कर?
इसके लिए सबसे पहले मेकर्स आसमान या फिर बादलों को रिकॉर्ड करते थे। यही उनके सीन का बैकग्राउंड हुआ करता था। इसके बाद अलग-अलग हथियारों को सफेद या काले बैकग्राउंड पर शूट करके उन्हें वापस उसी रील पर प्लेस किया जाता था। क्योंकि कलर टेक्निक इस तरह काम करती थी कि दोनों सीन एक दूसरे पर मर्ज हो जाते थे, तो देखने में ऐसा लगता था जैसे हथियार (जो कि एक ही जगह पर होता था) कैमरा के बादलों को चलते हुए रिकॉर्ड करने की वजह से हवा में ट्रेवल कर रहा है।
कैसे शूट होता था हथियारों का टकराना?
लेकिन फिर आसमान में दो हथियारों के आपस में टकराने वाले सीन का क्या? उन्हें किस तरह फिल्माया जाता था? इसके लिए थोड़ी मेहनत ज्यादा की जाती थी, लेकिन ये सीन देखने में बहुत इम्प्रेसिव लगते थे। आकाश में हथियारों के टकराने वाले सीक्वेंस के लिए एक के ऊपर एक कई सारी लेयर्स डाली जाती थीं और पहले एक वेपन, फिर दूसरा और फिर वो इफैक्ट लिया जाता था जिसे हम दोनों हथियारों के आकाश में टकराने पर देखा करते थे। यानि उस दौर के डायरेक्टर्स हमें एंटरटेन करने के लिए आज की तुलना में कहीं ज्यादा मेहनत कर रहे थे।
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