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6 जून, 2020|8:52|IST

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पिता ने मुझे थप्पड़ मारा था, जब उन्हें पता चला कि मैं फिल्में बनाना चाहता हूं: विधु विनोद चोपड़ा

प्रोड्यूसर-डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा को बेहतरीन फिल्मों का निर्माण करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने बॉलीवुड को अभी तक कई शानदार फिल्में दी हैं। हाल ही में कश्मीरी पंडितों पर आधारित उनकी फिल्म 'शिकारा' रिलीज हुई थी, जिसे लोगों से जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला और विधु के काम को सराहा गया। इंटरव्यू के दौरान विधु विनोद ने अपने फिल्मी करियर, शिकारा और लॉकडाउन को लेकर खुलकर बात की। बातचीत के कुछ अंश...

सवाल: मुझे विशवास है कि आप भी इस लॉकडाउन का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध होंगे, आपके इस बारे में क्या विचार हैं?

जवाब: जी हां, मैं और मेरा परिवार इस लॉकडाउन का पूरी तरह पालन कर रहे हैं। शासन के निर्देशानुसार हम लोग घर पर ही हैं। पूरी दुनिया इस अभूतपूर्व परिस्थिति से गुजर रही है। मेरा दिल घर से बाहर काम कर रहे कामगारों की ओर चला जाता है। अचानक उनसे काम छिन गया है और बहुत कष्ट में रह रहे हैं। हमारे देश और पूरी दुनिया पर आया संकट बहुत चिंताजनक है। मुझे पूरी उम्मीद है कि शासन के निर्देशों का पालन कर हम इस संकट से उबर जाएंगे। मैंने अपने काम में खुद को डुबो लिया है क्योंकि मेरे नियंत्रण में अपने घर में रहकर काम करना ही रह गया है।

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सवाल: आपकी फिल्म 'शिकारा' को कई लोगों ने बहुत प्यार दिया है, पर कई लोगों कहानी की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए हैं और आप पर आरोप लगाया है कि आपने कहानी का व्यवसायीकरण किया है। आप इन प्रतिक्रियाओं कोई किस तरह से ले रहे हैं ?

जवाब: मैंने लोगों को यह कहते हुए भी सुना है कि मैंने व्यवसायिक लाभ के लिए कहानी को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है, लेकिन मैं इन दावों को सही नहीं मानता हूं क्योकि अधिकांश लोग जो डिजिटल मीडिया पर यह सब कह रहे हैं उन्होंने फिल्म अभी तक नहीं देखी है। उनके पास नकारात्मकता फैलाने के अपने उद्देश्य हैं और ये लोग व्यवसायीकरण का सही अर्थ भी नहीं जानते हैं। कुछ फिल्मों की ओपनिंग मैंने तीस चालीस करोड़ रुपये से की है।

मैंने अपने कई साल शिकारा को बनाने में लगाए हैं यह जानते हुए भी कि इस फिल्म को वैसी ओपनिंग नहीं मिलेगी, क्योकि मैं अपने लोगों के धीरज और साहस की कहानी लोगों को बताना चाहता था। 2007 में मेरी मां का निधन विस्थापन की स्थिति में हो गया। मैं उनसे किया अपना वादा पूरा करना चाहता था। अगर मैं केवल व्यवसायिक लाभ को ध्यान में रखकर फिल्म बनाना चाहता तो थ्री इडियट या मुन्ना भाई का सीक्वल बनाता। व्यवसायीकरण का यह आरोप बेबुनियाद है। मैं सभी से फिल्म देखने का आग्रह करुंगा, जिससे वह फिल्म के साथ न्याय कर सकें। 

सवाल: इस पूरे विवाद ने आपके अंदर के रचनात्मक कलाकार को कितना प्रभावित किया?
जवाब: इसने केवल अच्छे और सार्थक सिनेमा बनाने के मेरे संकल्प को मजबूत किया है।

सवाल: प्रसिद्ध और चर्चित अभिनेताओं के साथ काम करने के बाद आपने शिकारा के लिए दो एकदम नए चेहरों को क्यों लिया?

जवाब: मैं मासूमियत और सघनता की तलाश में था। अपनी जन्मभूमि विस्थापित समुदाय की भावनाओं को बाहर निकालने के लिए प्रमाणिकता जरूरी थी। मैंने जम्मू में ऑडिशन आयोजित किए। शार्टलिस्ट किए लोगों को मुंबई लाया और यहां उनका फिर से ऑडिशन लिया। एस तरह फिल्म की हीरोइन शादिया का चयन हुआ। वह भदरवाह की रहने वाली हैं और जम्मू में पढ़ाई कर रही थीं, पर इसमें भी समस्याएं थी। उसके पिता राजी नहीं थे। मैंने उन्हें कई बार वीडिओ कॉल किए। कश्मीरी में उनसे बात की तब जाकर वे माने। शादिया मुंबई पहुंची तो मुझे उसका ऑडिशन लेने की जरूरत ही नहीं पड़ी। मैंने केवल स्टिल फोटो लिए और मैं समझ गया कि यही मेरी फिल्म की मुख्य चरित्र है। वह एक असाधारण कलाकार है। 

कवि की भूमिका के लिए एक अच्छी आवाज चाहता था। जब मैंने आदिल की आवाज सुनी तो उसने मुझे अमिताभ बच्चन की आवाज की याद दिला दी। मेरे लिए यह बहुत अच्छी बात हुई कि आदिल के पूर्वज कश्मीरी थे इसलिए वह कश्मीरी कल्चर को लेकर जागरूक था। उसने भी शादिया की तरह कठोर परिश्रम किया और दो साल तक चली कई वर्कशॉप से उन दोनों में बहुत निखार आया। उन्होंने अपने अभिनय से हम सभी को चौंका दिया। 

सवाल: एक फिल्मकार के रूप में आप तथ्य और कल्पना का संतुलन कैसे करते हैं और इस दौरान आप रचनातमक स्वतंत्रता कैसे लेते हैं?
जवाब: शिकारा जैसी फिल्म में सब कुछ तथ्य आधारित है। यह विस्थापित कश्मीरी पंडितों की कहानी है। राहुल पंडिता मेरे और अभिजात जोशी के साथ फिल्म के सह लेखक थे। यह एक कठिन विषय था, जिसके लिए एक कहानी बुनने की जरूरत थी ताकि यह सिनेमा की तरह महसूस हो न कि वृत्त चित्र की तरह । अगर आप विश्व की कुछ क्लासिक रचना जैसे ‘गोन विथ द विंड’ और 'डॉ जीवागो' देखेंगे तो पाएगे कि इनमें एक प्रेम कहानी है परन्तु उसकी पृष्ठभूमि में एक त्रासद सिविल उपद्रव है। शिकारा ने इसी पैटर्न का अनुसरण करने का प्रयत्न किया है।

सवाल: एक इंटरव्यू में आपने कहा था कि आपके मन में विफलता का भय नहीं है। आप कैसे भय मुक्त रह पाते है ?
जवाब: फैज अहमद फैज की एक पंक्ति है,  'फैज की राह सर-बसर- मंजिल; हम जहां पहुंचे कामयाब आए''
मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं। मैं हमेशा श्रेष्ठता के लिए प्रयास करता हूं, भले ही मैं कोई बुरी फिल्म बनाऊं लेकिन मैं अपना सर्वश्रेष्ठ करने का प्रयास करता हूं।

सवाल: आपकी पहली फीचर फिल्म 1981 में रिलीज हुई थी। आपकी यह लगभग चार दशक लंबी यात्रा कैसी रही?
जवाब: यह एक सपने के सच होने जैसा है। मैं फिल्मकार बनने का सपने का लेकर कश्मीर के एक छोटे से मोहल्ले से आया था। मेरे पिता ने मुझे थप्पड़ मारा जब उन्हें बताया कि मैं फिल्में बनाना चाहता  हूं। उन्हें लगा कि मैं मुंबई में भूखा मर जाउंगा। एक छोटे शहर के मध्यम वर्ग के लड़के से जहां तक मैं पहुंचा हूं वहां तक कि मेरी यात्रा बहुत संतोषजनक रही है।

सवाल: क्या आप अपने व्यवसायिक शिखर पर पहुंच गए हैं? इस बारे में आप क्या कहेंगे?
जवाब: मैं कहूंगा कि शिकारा बनाना मेरी सबसे बड़ी प्रोफेशनल हाईट है। मैंने 2007 में अपनी मां के निधन के बाद इस पर काम शुरू किया। कश्मीरी पंडितों का विस्थापन एक ज्ञात मुद्दा है, लेकिन उन जटिलताओं और घटनाओं के बारे में लोगों को कम ही पता है, जिनके कारण यह विस्थापन हुआ। विस्थापन के दर्द के बारें में भी लोग अनभिग्य हैं। इस फिल्म के लिए शोध की आवश्यकता थी जिससे हम एक ऐसी कहानी बना सकें जो लोगों को सच्ची लगे। इस पर हमने बहुत काम किया, लेकिन यह मेरे लिए बड़ी चुनौती थी क्योंकि मुझे सच्चाई का चित्रण करने के लिए एक फिल्मकार के रूप में निष्पक्ष रहना था और यही एक बात कहनी थी कि नफरत का एक ही समाधान है और वह है प्रेम। यही प्रेम मेरी फिल्म के केंद्र में है।

शिवकुमार धर और शान्ति धर (वैसे मुख्य पात्र का नाम शान्ति मेरी मां का नाम भी है ) के बीच का प्रेम एक महत्वपूर्ण कारक है जो हमें नफरत से परे सोचने पर मजबूर करता है। फिल्म की शूटिंग कश्मीर में भारी सुरक्षा बलों के बीच हुई थी, इसलिए हमारे पास समय की कमी थी। प्रमाणिकता ही हमारी कुंजी थी। फिल्म का लेखन बहुत लंबे समय तक किया गया था। टनों डॉक्युमेंट और वीडियो फुटेज हमने कहानी में प्रमाणिकता लाने के लिए खंगाले थे। शिकारा मेरा अब तक का सबसे संतुष्टिदायक काम है।

सवाल: जब आपने फिल्में बनाना शुरू की तब क्या आपने मन में सिनेमा की कोई निश्चित धारा थी, जिससे आप जुड़ना चाहते थे?
जवाब: मैं इग्मार बर्गमैन के सिद्धांत से प्रभावित रहा हूं, वह कहा करते थे, ''तुम लोगों का मनोरंजन करोगे लेकिन अपनी आत्मा को बेचे बगैर।''  उनका यही वाक्य मेरा मंत्र है। इसी को मैंने अपने काम और जीवन में अनुसरण करने की कोशिश की है। यह सिद्धांत न बदला है न बदलेगा।

सवाल: आपके लिए जो मनोरंजन है आपकी फिल्में उसी का प्रतिबिम्ब है, क्या आप बताएंगे आपके लिए मनोरंजन क्या है?
जवाब: मनोरंजन मेरे लिए वह है जो आपको समृद्ध करे, आपको बेहतर इंसान बनाए, अगर आप दर्शक के जीवन को समृद्ध बनाने में कुछ भी सफल होते हैं तो मेरे विचार से वह एक महान फिल्म है।

सवाल: क्या आप आगे भी फिल्मों का निर्देशन करेंगे?
जवाब: मैं कुछ कहानियों पर काम कर रहा हूं। इस लॉकडाउन ने मुझे कई स्क्रिप्ट की समीक्षा का अवसर दिया है और मेरी रचनात्मक टीम से चर्चा का वक्त दिया है। लॉकडाउन खत्म होते ही मैं फिर से काम कर दूंगा।

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