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25 मार्च, 2020|5:42|IST

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Shubh Mangal Zyada Saavdhan Review: फिर चल गया आयुष्मान का मैजिक, पढ़ें फिल्म का रिव्यू

shubh mangal zyada saavdhan review

स्टार- 3

पिछले कुछ सालों से अभिनेता आयुष्मान खुराना ‘#आयुष्मानमैजिक’ के जो चौके-छक्के जड़े चले जा रहे थे, उनका सिलसिला फिल्म ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ में भी जारी है। आयुष्मान की फिल्मों में उनके किरदारों का अपना एक अलग व्यक्तित्व होता है, लहजा और अंदाज भी मजेदार होता है। ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ के कार्तिक में भी यह बात देखी जा सकती है। ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ में आपको ‘बाला’ का थोड़ा बालमुकुंद शुक्ला, ‘ड्रीम गर्ल’ का थोड़ा करम सिंह है और ‘बधाई हो’ का थोड़ा नकुल कौशिक देखने को मिल जाएगा। इसके बावजूद ‘कार्तिक’ अपनी तरह का एक अलग किरदार नजर आता है। उसमें वही ‘स्पार्क’ है, जो आयुष्मान की पिछली सफल फिल्मों के किरदारों में नजर आया था। और आयुष्मान में ही नहीं, उनकी इस फिल्म ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ में भी इस ‘स्पार्क’ को देखा जा सकता है। ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ के बाद एक बार फिर मुख्यधारा की किसी फिल्म में ऐसे विषय को उठाने के लिए इसे बनाने वालों की तारीफ जरूर की जानी चाहिए।

‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ कहानी है कार्तिक (आयुष्मान खुराना) व अमन (जितेंद्र कुमार) की। दोनों प्यार में हैं और दिल्ली में साथ रहते हैं। मुश्किलें तब शुरू होती हैं, जब कार्तिक के चाचा (मनु ऋषि चड्ढा) की बेटी गॉगल (मानवी गागरू) की शादी में शिरकत करने ये दोनों इलाहाबाद जाते हैं और वहां इनके समलैंगिक संबंध का राज सबके सामने आ जाता है। अमन के पिता शंकर त्रिपाठी (गजराज राव) और मां सुनयना त्रिपाठी (नीना गुप्ता) सहित पूरे परिवार को यह बात जानकर झटका लगता है। अब अमन और कार्तिक के सामने चुनौती है कि वे सबको अपने रिश्ते को स्वीकारने के लिए मनाएं...

हितेश केवल्य ने इस फिल्म की कहानी लिखी है व निर्देशन भी किया है और निर्देशन व लेखन, दोनों में वह ठीक रहे हैं। फिल्म सधे हुए तरीके से शुरू होती है। बीच में थोड़े हिचकोले भी खाती है, लेकिन फिर सही ट्रैक पकड़ लेती है। हालांकि इसमें बेहतरी की और संभावनाए थीं, फिर भी फिल्म पर्याप्त मनोरंजन करती है और अपने संदेश को दर्शकों तक पहुंचाने में कामयाब रहती है।

आयुष्मान ने हमेशा की तरह अपने किरदार को जीवंत बना दिया है। उनका अभिनय असरदार है। वैसे अभिनय के लिहाज से सबसे उल्लेखनीय काम किया है अमन के चाचा बने मनु ऋषि चड्ढा और चाची बनी सुनीता राजवर ने। ये दोनों अपने-अपने किरदारों में सबसे सहज लगे हैं। कई दृश्यों में तो ये नीना-गजराज की जोड़ी पर भी भारी पड़ते नजर आते हैं। नीना-गजराज ने वैसे तो अच्छा काम किया है, हालांकि कई जगहों पर वे अपने ‘बधाई हो’ वाले तेवर को भी दोहराते नजर आए। जितेंद्र कुमार अपनी सादगी व मासूमियत के चलते अमन के किरदार में एकदम सटीक हैं। उनका अभिनय प्रभावित करता है। 

फिल्म के ज्यादातर हिस्से में संवाद कमाल के हैं। ‘रोज हमें लड़ाई लड़नी पड़ती है जिंदगी में, पर जो लड़ाई अपने परिवार के साथ लड़नी पड़ती है, वह सबसे ज्यादा खतरनाक होती है...’ आयुष्मान का यह संवाद इसकी एक बानगी है। इस सीरीज की पिछली फिल्म ‘शुभ मंगल सावधान’ में ‘इरेक्टाइल डिस्फंक्शन’ जैसी समस्या से जुड़ी भ्रांतियों की परतों को बेहद प्रभावशाली अंदाज में दिखाया गया था। इसमें कॉमेडी और असल मुद्दे के बीच एक अच्छा संतुलन था। वहीं ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’ में समलैंगिक संबंधों के संवेदनशील मसले को पूरी संजीदगी से उठाया गया है। इसमें भी मनोरंजन और मुद्दे का अच्छा संतुलन है। छोटे शहरों के समलैंगिकों को किस तरह की समस्याएं झेलनी पड़ती हैं, यह समझाने में, उनका दर्द दर्शकों को महसूस करवाने में यह फिल्म कामयाब रही है। 

यह मुद्दे को ढेर सारी कॉमेडी के आवरण में पेश करती है। आयुष्मान व जितेंद्र की जोड़ी अच्छी जमी है।

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