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MOVIE REVIEW: एहसासों का समंदर समेटे 'फोटोग्राफ'

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ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों के पास मंडराते ‘अर्जेंट फोटोग्राफर’ कभी न कभी आपसे भी टकराए होंगे। फिल्म ‘फोटोग्राफ’ का मुख्य किरदार ऐसा ही एक ‘अर्जेंट फोटोग्राफर’ रफी (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) है। परिवार का कर्ज चुकाने के लिए प्रतिबद्ध रफी मुंबई स्थित ‘गेटवे ऑफ इंडिया’ के पास फोटो खींचने के लिए हर दिन घूमता है। वह मुंबई के एक कमरे में चार साथियों के साथ रहता है, जिनमें से कोई ऑटो चलाता है तो कोई उसकी तरह फोटोग्राफी करता है।

मिलोनी (सान्या मल्होत्रा) एक संभ्रांत गुजराती परिवार की लड़की है जो सीए की तैयारी कर रही है। वह अपने बैच की टॉपर है। शहर में लगे उसके कोचिंग सेंटर के पोस्टर में उसकी तसवीर सबसे ऊपर लगी है। तसवीर में उसके सिर के ठीक ऊपर एक छोटा सा ताज बना है। मिलोनी स्वभाव से शर्मीली है और उसकी जिंदगी के सारे फैसले उसका परिवार करता है।

मुंबई के ये दो अनूठे, एकदम विपरीत किरदार जब मिलते हैं तो बनती है ‘फोटोग्राफ’। ‘लंचबॉक्स’ बनाने वाले रितेश बत्रा की इस ‘फोटोग्राफ’ में भी उनके वही पसंदीदा रंग भरे गए हैं जिन्हें हम पहले देख चुके हैं। रितेश के दोनों मुख्य किरदार मिलते हैं गेटवे ऑफ इंडिया पर, जहां रफी मिलोनी से फोटो खिंचवाने की गुजारिश करता है, अपनी मार्केटिंग करती यह लाइन चिपकाकर,‘जब भी आप इस तसवीर को देखेंगी, अपने चेहरे पर पड़ती धूप को और अपने बालों में महसूस होती हवा को याद कर सकेंगी।’ शर्मीली मिलोनी ठिठकती है और तसवीर खिंचवाने के लिए राजी हो जाती है। पर अचानक किसी रिश्तेदार के बुलाने पर वह बिना रफी को तसवीर का भुगतान किए ही चली जाती है। उधर गांव में रहने वाली रफी की दादी (फारुख जफ्फार) ने दवा खाना बंद कर दिया है, ताकि वह इसे एक धमकी समझकर शादी के लिए रजामंदी दे दे। रफी दादी को टालने के लिए एक खत लिखता है कि उसे मुंबई में एक लड़की पसंद आ गई है। खत पढ़कर दादी इतनी उत्साहित हो जाती हैं कि रफी की पसंद की लड़की से मिलने के लिए सीधे मुंबई चली आती हैं। अब रफी के सामने चुनौती है कि मिलोनी को तलाशे और दादी से मिलने के लिए राजामंद करे।

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‘फोटोग्राफ’ उन फिल्मों में से है जिसके किरदारों के मन की बात जानने, महसूस करने और जीने के लिए काफी सब्र चाहिए। भावनाओं के इजहार की खलबली दर्शक के मन में हो सकती है, फिल्म के किरदार अपने अंतर्मुखी स्वभाव और अपने बीच की सामाजिक खाई का ख्याल रखते हुए ही व्यवहार करते हैं। पुरानी हिंदी फिल्मों के गाने भी फिल्म में एक किरदार हैं। एक दृश्य पर गौर फरमाइये- तेज बारिश के बीच रफी मिलोनी को अपने घर लेकर आता है। बाहर उसके लिए पकौड़े लेने जाता है। रेडियो पर लताजी का गाना ‘नूरी’ तेज आवाज में बज रहा है। घर में मिलोनी देखती है कि रफी के बिस्तर के नीचे उसकी तसवीरें रखी हैं। रफी के पकौड़े लेकर लौटने से पहले वह तसवीरों को छुपा देती है। दोनों शांति से बैठकर माहौल में घुली रूमानियत को महसूस करते हैं। मुंबई की बारिश, लताजी का गाना और प्रेमियों को बामुश्किल मिलने वाला एकांत- यह कातिलाना कॉम्बिनेशन नसीब होने के बाद भी सिर्फ पकौड़े खाते हुए एक-दूसरे की खामोशी को सुनने का हुनर रितेश के किरदारों में ही हो सकता है।

रफी के किरदार में नवाज जंचते हैं। हालांकि उनके व्यक्तित्व और अब तक की फिल्मों में उनके चटख किरदारों को देखते हुए रफी का किरदार ‘अंडरप्ले’ करता हुआ ही लगता है, जो हर दर्शक को हो सकता है पसंद न आए। मिलोनी के किरदार में सान्या पर बड़ी जिम्मेदारी थी। उन्हें भावशून्य रहते हुए अपने भाव महसूस करवाने थे। इसमें वह काफी हद तक सफल भी रही हैं। न के बराबर बोलना, धीरे बोलना, अधिकतर मौकों पर सिर्फ हां-ना में जवाब देना, शर्माना और बिना सोचे-समझे एक आदर्श लड़की की तरह जो परिवार के लोग कहें, वो करना- यह सब देखकर दर्शक को महसूस होता है कि हो न हो, इस लड़की के अंदर ऐसा बहुत कुछ है जो यह कहना चाहती है। अंत तक आप इंतजार करते रहते हैं कि कभी तो मिलोनी के मन में चल रहा अंधड़ आप महसूस करेंगे, उसके मन में कैद किसी पुराने किस्से से आपका साबका पड़ेगा, पर ऐसा नहीं होता। इन किरदारों को कहीं पहुंचने, मन की भड़ास निकालने की कोई तलब, कोई जल्दी नहीं है। न ही ये अपने होने का मतलब तलाशने जैसा कुछ करना चाहते हैं। फिल्म में मिलोनी के घर की बाई के रूप में गीतांजलि कुलकर्णी भी हैं। मिलोनी से उनकी बातचीत वाले दृश्य फिल्म की जान हैं। जितनी सहजता से वह संवाद बोलती हैं, अपने किरदार में एकदम रचीबसी नजर आती हैं।

दादी बनी फारुख जफ्फार फिल्म की रोचकता बनाए रखती हैं। बाकी सह कलाकारों ने भी अपना काम ठीक किया है। हालांकि यह भी सच है कि इस फिल्म का पैनापन ‘लंचबॉक्स’ जैसा नहीं है। टॉम गिलिस और बेन कचिन्स की सिनेमैटोग्राफी मुंबई को बिना किसी मिलावट के दिखाती है। इसमें कोई गाना नहीं है, पर साउंड रिकॉर्डिंग जबर्दस्त है। फिल्म के किरदार अगर थोड़ा और सधे हुए होते, इसकी कहानी जरा सा, एकदम जरा सा और व्यवस्थित होती तो यह और बेहतर हो सकती थी। फिल्म की लंबाई कुछ ज्यादा है।

स्टार- 2.5

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