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REVIEW: रजनी का राजनैतिक रूप तो नहीं है 'काला'

rajinikanth kaala review
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एक छाता... जो कर दे आपके सारे दुश्मनों का सफाया...

आप कहेंगे, जरूर वो फिल्म ‘राजी’ में दिखाया गया जहर लगा छाता होगा। पर नहीं, हम सामान्य छाते की बात कर हैं। सामान्य छाते से भी ऐसा संभव है। बशर्ते, वह रजनीकांत के हाथ में हो!

और फिर सिर्फ छाते से कत्ल करना ही नहीं, और भी बहुत कुछ संभव हो जाएगा। पेट में घूंसा मारने पर मुंह से आधा लीटर पानी पिचकारी के रूप में बाहर आएगा। सिलेंडर के धमाके और सिर में लोहे की भारी रॉड से वार के बावजूद बाल बांका तक नहीं होगा। और आपकी आंखों के सामने सरे-आम हर दस मिनट पर तर्क को बेइज्जत किया जाएगा। लेकिन एक मिनट, स्वैग और बैकग्राउंड म्यूजिक तो दमदार है न... बस...  हम बात कर रहे हैं रजनीकांत की नई फिल्म  काला की। आप कहेंगे,‘कैसा नाम है ये?’

तो फिल्म के विलेन ने भी ठीक यही सवाल पूछा। पर ऐसे नहीं, किरदार के मिजाज में बात करते हैं,‘कइसा नाम है रे तेरा? काला... लेते ही मुंह खट्टा हो जाता है!’ क्या हुआ, मन में कोई सवाल उठा? खबरदार। इसकी इजाजत नहीं है। तो महरबान, कद्रदान, दिल थाम कर बैठिये। थलाइवा की नई फिल्म का शो शुरू होने वाला है। यह कहानी है मुंबई के धारावी की बस्ती में रहने वाले करिकालन यानी काला की, जो वैसे तो एक डॉन है, पर वहां के लोगों का मसीहा है। लोग उसे बहुत मानते हैं। काला का परिवार बहुत साल पहले तमिलनाडु से मुंबई शिफ्ट हो गया था। काला के परिवार में उसकी पत्नी सेल्वी (ईश्वरी राव), तीन बेटे, बहुएं और पोते-पोतियां हैं। काला की उम्र जरूर ढल रही है, पर इरादे अब भी बुलंदी पर हैं। वह बस्ती के बच्चों के साथ क्रिकेट भी खेलता है और पत्नी सेल्वी के साथ रोमांस भी करता है। यहां तक कि अफ्रीका में रह कर आईं जरीना (हुमा कुरैशी) जो उसकी पूर्व मंगेतर रह चुकी हैं, को देखकर भी उनके दिल में पुराने जज्बात जिंदा हो जाते हैं। फिल्म का विलेन यानी हरि अभ्यंकर (नाना पाटेकर) धारावी की जमीन पर कब्जा करना चाहता है। उसके रास्ते का सबसे बड़ा कांटा है काला। पूरी फिल्म में इन्हीं दोनों के बीच रस्साकशी चलती रहती है और आखिर में क्या होता है, उसका अंदाजा आप खुद ही लगा लेंगे, इसका हमें पूरा भरोसा है।

फिल्म में कुछ चीजें काबिल-ए-तारीफ भी हैं, जैसे अलग-अलग प्रतीकों के जरिये हीरो-विलेन के बीच का विरोधाभास दिखाना। फिल्म में एक जगह रजनी का पोता उससे पूछता है,‘दादाजी, क्या आपका नाम काला इसलिए रखा गया है क्योंकि आपका रंग काला है?’ इस पर रजनी की पत्नी यानी ईश्वरी उसे बताती हैं कि काला दरअसल एक देवता का नाम है। काला को फिल्म में कई जगह रावण का प्रतीक भी बताया गया है। यानी काला, गरीबी, बदहाली, गंदगी में पनप रही जिंदगी का प्रतीक है। यह किरदार कहीं न कहीं अल्पसंख्यकों का प्रतीक है। दूसरी तरफ फिल्म का विलेन हरि है, जो बहुसंख्यकों का प्रतीक है। जो धारावी की मलिन बस्तियों को ही साफ कर देना चाहता है। धार्मिक प्रवृत्ति का यह विलेन काले रंग से नफरत करता है। हमेशा सफेद कुर्ता-पायजामा पहनता है। इन दोनों के पालतू कुत्ते भी एकदम अलग हैं। काला के पास एक सड़क का मामूली कुत्ता है तो हरि के पास  विदेशी नस्ल वाला कुत्ता।
 

फिल्म में काला ‘जमीन हमारा अधिकार है’, ‘हम माचिस जैसे घरों और गोल्फ कोर्स जैसी गैर-जरूरी चीजों के बदले आपको अपनी जमीन नहीं दे सकते’ और ‘मैं आखिरी सांस तक गरीबों के लिए लडूंगा’, ‘अमीर कबसे गरीबों के फायदे की बात सोचने लगे?’ जैसे अपने कहे-अनकहे संवादों के जरिये कहीं न कहीं दर्शक को यह सोचने पर भी मजबूर करते हैं कि कहीं ये सब उनके आगामी राजनैतिक पदार्पण को लेकर उनकी सोच की तरफ इशारा तो नहीं है!

अब बात रजनी के लुक की। लुंगी, कुर्ते और एविटर चश्मे के साथ वह अपने पूरे स्वैग में नजर आए हैं। इन चीजों के बाद भी उनके पूरे व्यक्तित्व में एक सादगी है और शायद इसी सादगी का आकर्षण है जो लोगों को खींचता है। फिल्म के कुछ हिस्सों में रजनी, हुमा आदि कलाकारों का अतीत दिखाने के लिए एनिमेशन का सहारा लिया गया है, जो फिल्म की गंभीरता को कम करता है। ठीक यही काम इसके कई गाने भी करते हैं। एक किरदार की मौत पर बस्ती के कुछ युवाओं का गमगीन रैप गीत गाना कुछ अखरता है। हुमा की उम्र उनके किरदार के लिहाज से कम लगी है। बेहतर होता कि या तो मेकअप के जरिये उनकी उम्र को ज्यादा दिखाया जाता या उनकी जगह किसी अन्य अदाकारा को लिया जाता । रजनी की केमिस्ट्री हुमा के बजाए ईश्वरी के साथ ज्यादा बेहतर नजर आई है। फिल्म में हुमा कुरैशी के अलावा अंजलि पाटिल, पंकज त्रिपाठी जैसे उत्तर भारतीय फिल्मों के कलाकार भी हैं जिन्होंने छोटी पर प्रभावी भूमिकाएं निभाई हैं। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी अच्छी है। अंत में रंगों का अच्छा इस्तेमाल किया गया है। बैकग्राउंड स्कोर भी फिल्म की गति के अनुरूप है।

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