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MOVIE REVIEW: फिल्म देखने से पहले पढ़ें कैसी है 'मानसून शूटआउट'

मानसून शूटआउट

फिल्म: मानसून शूटआउट

कलाकार: नवाजुद्दीन सिद्दीकी, विजय वर्मा, नीरज कबि, गीतांजलि थापा, तनिष्ठा चटर्जी, श्रीजिता डे

निर्देशक: अमित कुमार

'मानसून शूटआउट', जैसाकि नाम से जाहिर है, एक पुलिस-गैंगस्टर एनकाउंटर पृष्ठभूमि की फिल्म है। लेकिन जो इस फिल्म को इस पृष्ठभूमि वाली ढेरों फिल्मों से अलग करती है, वह है इसका ट्रीटमेंट। दरअसल यह फिल्म पुलिस-अपराधी के बीच मुठभेड़ की कहानी भर नहीं है, बल्कि उसके बहाने कई पहलुओं की पड़ताल भी करती है। यह क्राइम ब्रांच के एक कांस्टेबल के जरिये अच्छे, बुरे और मध्य मार्ग के संभावित परिणामों का चित्र पेश करती है।

आदि (विजय वर्मा) मुंबई के क्राइम ब्रांच में कांस्टेबल है। वह अपने सीनियर खान (नीरज कबि) के साथ अपने पहले असाइनमेंट पर जाता है। खान कानूनी प्रक्रिया में विश्वास नहीं करता, क्योंकि उसे लगता है कि कानून की कमजोरी की वजह से गैंगस्टर बच जाते हैं। इसलिए वह एनकाउंटर में भरोसा रखने वाला पुलिस अधिकारी है। इस मुठभेड़ में आदि का पाला शातिर गैंगस्टर शिवा (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) से पड़ता है। आदि, शिवा को पकड़ लेता है। इसके बाद उस घटनाक्रम की तीन व्याख्याएं हैं। पहला- शिवा उसके सामने निहत्था है, लेकिन आदि तय नहीं कर पाता कि शिवा वास्तव में गैंगस्टर है या नहीं, क्योंकि उसके पास इसका कोई स्पष्ट सबूत नहीं है। वह शिवा को छोड़ देता है, जिसकी उसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।

दूसरी स्थिति है- आदि, शिवा को मार देता है। हालांकि इस बार भी वह यह तय नहीं कर पाता कि शिवा वास्तव में गैंगस्टर है या नहीं। वह अपराधबोध में शिवा के घर जाता है और उसके बेटे छोटू (फरहान मोहम्मद हनीफ शेख) के साथ उसकी अर्थी को कंधा देने की कोशिश करता है। लेकिन छोटू और उसकी मां रानी (तनिष्ठा चटर्जी) उसे बहुत बुरा-भला कहते हैं। छोटू, आदि को अपना दुश्मन समझने लगता है।

तीसरी स्थिति में आदि बीच का रास्ता अपनाता है। वह शिवा को न छोड़ता है और न मारता है, बल्कि उसे कोर्ट में पेश करने के लिए ले जाता है। रास्ते में खान और क्राइम ब्रांच का एक कांस्टेबल पाटील (जयंत गडेकर) शिवा का एनकाउंटर करने का प्लान बनाते हैं, लेकिन आदि उनकी इस योजना को समझ जाता है और शिवा को बचा कर कोर्ट ले जाता है। वहां शिवा चालाकी कर बेल पाने में कामयाब हो जाता है। और फिर जब खान, आदि और शिवा की एक बार फिर मुठभेड़ होती है तो हालात कुछ और ही करवट लेते हैं। ... इन तीन स्थितियों के बीच आदि एक निष्कर्ष पर पहुंचता है कि कई बार आपके पास अच्छे, बुरे और बीच के रास्ते के बारे में फैसला करने का समय नहीं होता।

करीब डेढ़ घंटे की इस फिल्म में कहानी के नाम पर बहुत कुछ नहीं है, लेकिन निर्देशक अमित कुमार ने अपने आइडिया को अच्छे से पेश किया है। उनका निर्देशन प्रभावित करता है। हालांकि फिल्म बहुत धीमी है और कई बार थोड़ा भ्रम भी पैदा होता है। विषय के अनुरूप इस फिल्म में भी नेता-अपराधी गठजोड़, बिल्डरों से वसूली जैसी बातें भी हैं, लेकिन सिर्फ संदर्भ के लिए। हालांकि उसमें कई चीजें गैर-जरूरी भी लगती हैं।

सिनमेटोग्राफर ने मुम्बई की बरसात के बीच वहां की सड़कों और गलियों के स्याह दृश्यों को बढ़िया ढंग से पेश किया है। वह मुम्बई के इस धूसर रंग को अपने कैमरे में कैद करने में कामयाब रहे हैं। कलाकारों का अभिनय इस फिल्म का सशक्त पक्ष है। आदर्श और परिस्थितियों के बीच फंसे एक पुलिसकर्मी के द्वंद्व को विजय वर्मा ने बहुत अच्छे-से जिया है। उनका अभिनय बहुत सधा और संतुलित है। नवाज तो खैर नवाज हैं ही। नीरज कबि एक लाजवाब अभिनेता हैं। वह किसी भी किरदार को बिल्कुल साकार कर देते हैं। शिवा की पत्नी रानी के रूप में तनिष्ठा का अभिनय भी सधा हुआ है। आदि की प्रेमिका अनु के रूप में गीतांजलि अच्छी लगती हैं। ओमकार माणिकपुरी भी एक गैंगस्टर की छोटी-सी भूमिका में ठीक लगे हैं। बाकी कलाकारों का काम भी ठीक है।

मनोरंजन की चाह रखने वाले दर्शकों के लिए यह फिल्म नहीं है। इस फिल्म को समझने के लिए काफी एकाग्र और सचेत रहना पड़ता है। कई बार यह थोड़ी जटिल भी हो जाती है। यह इस फिल्म की सबसे बड़ी कमी है। फिर भी, करीब चार साल पहले कान फिल्मोत्सव में प्रदर्शित हुई यह फिल्म प्रभावित करती है।

रेटिंग: 2.5 स्टार

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