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KBC: सिर्फ नूपुर ही नहीं, इन दिव्यांगों ने भी अपने हुनर का मनवाया लोहा

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कौन बनेगा करोड़पति में हॉट सीट पर बैठकर उन्नाव की नूपुर ने अपनी प्रतिभा से सबका मन मोह लिया है। नुपुर केबीसी से12 लाख 50 हजार रुपए जीतकर गईं। नुपुर ने काफी अच्छा गेम खेला। नुपुर की कहानी सुनकर दर्शक से लेकर बिग बी भी चौंक गए थे। नूपुर ने बताया था कि पैदा होने के बाद नर्स ने उसे डस्टबिन में फेंक दिया था। बाद में एक नर्स ने उसे डस्टबिन से निकालकर साफ किया। उसके बाद 12 घंटे लगातार रोती ही रही थी। डॉक्टरों से सही इलाज न मिलने की वजह से उसका आज यह हाल है। 

नुपुर ने बता दिया कि अगर आपके अंदर टैलेंट है तो कोई आपको नहीं रोक सकता। बता दें कि नुपुर जैसे और भी ऐसे दिव्यांग हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ शख्सियत के बारे में-

विराली मोदी : मिस व्हीलचेयर प्रतियोगिता में रनर-अप रहीं
विराली मोदी आज सामाजिक कार्यकर्ता, लेखिका और अभिनेत्री होने के साथ 2014 की मिस व्हीलचेयर इंडिया प्रतियोगिता में रनरअप भी रह चुकी हैं। 2006 में 14 साल की उम्र में किस्मत ने अचानक विराली को व्हील चेयर पर ला पटका। बुखार और लकवे के बाद डॉक्टरों ने तीन बार मृत तक घोषित कर दिया। कई बात आत्महत्या की भी कोशिश की। विराली बताती हैं, ‘ट्रेन यात्रा में खासतौर पर उन्हें दिक्कतें आती थीं। जब मुझे पुरुषों द्वारा एक सामान की तरह उठाया जाता तो बहुत ही बुरा लगता। बस यहीं से मैंने दिव्यांगों के अधिकारों के लिए काम करना शुरू कर दिया।’ इस साल मार्च में प्रधानमंत्री और रेल मंत्री तक आवाज पहुंचाने के लिए ‘चेंज.ओआरजी’ के जरिए याचिका अभियान शुरू किया। देशभर से 2.10 लाख से ज्यादा लोग साथ आए। इसी प्रयास का नतीजा है कि केरल में चार रेलवे स्टेशनों पर दिव्यांगों के लिए विशेष सुविधाओं का इंतजाम किया गया है। 

सफल स्टार्टअप के मालिक सुशांत झा 

दक्षिणी दिल्ली में रहने वाले सुशांत झा कभी 40 कंपनियों से नकारे गए और आज एक सफल स्टार्टअप ‘पढ़ेगा इंडिया इनिशिएटिव’ के मालिक हैं। जरूरतमंद छात्रों को पुरानी किताबें मुहैया कराने वाला यह स्टार्टअप पूरे दिल्ली-एनसीआर में फैल गया है। उनका ऊपरी होंठ हल्का से कटा हुआ है, जिसकी वजह से उन्हें साफ बोलने में दिक्कत होती है। सुशांत बताते हैं, ‘बेंगलुरु से मैकेनिक इंजीनियरिंग और दिल्ली से एमबीए करने के बावजूद निराशा हाथ लगी। 200 कंपनियों में बायोडाटा भेजा, 40 में इंटरव्यू दिया, लेकिन नौकरी नहीं मिली।’ बस इसके बाद सुशांत ने कुछ ऐसा करने का मन बनाया जिसका मकसद सिर्फ पैसा कमाना ही न हो। भाई प्रशांत ने सलाह दी कि जो भी करो, उसमें किताबों को जरूर शामिल करो। आज वह छात्रों को कोर्स व प्रतियोगिताओं से संबंधित किताबें सस्ते दामों पर उपलब्ध कराते हैं। 

शालिनी ने पैरों को ‘खूबसूरती’ से विदा किया

कुशल भरतनाट्यम नृत्यांगना रह चुकीं शालिनी सरस्वती को पांच साल पहले एक बीमारी के चलते अपने दोनों हाथ-पांव गंवाने पड़े, लेकिन इच्छाशक्ति पहले से भी ज्यादा दृढ़ हो गई। जिस दिन उनके दोनों पैर काटे जाने थे, उस दिन वह पैरों में चमकती लाल नैल-पोलिश लगा कर अस्प्ताल गईं। अपने ब्लॉग पर वह लिखती हैं, ‘अगर मेरे कदम जा रहे हैं तो क्यों न उन्हें खूबसूरती से विदा करूं।’ जज्बे की जीती-जागती मिसाल शालिनी ने 10 लाख रुपये के रनिंग ब्लेड्स कर्ज पर खरीदे। बेंगलुरु की शालिनी ने पिछले साल 10 किलोमीटर की मैराथन भी पूरी की। उनका लक्ष्य 2020 पैरालंपिक में भाग लेना है।

अरूणिमा सिन्हा

आंबेडकर नगर में शाहजाद-पुर इलाके में एक मुहल्ला है पंडाटोला। वहीं एक छोटे-से मकान में रहने वाली अरुणिमा सिन्हा के जीवन का बस एक ही लक्ष्य था और वो ये कि भारत को वॉलीबॉल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना। इसी बीच 11 अप्रैल, 2011 की एक घटना ने उनकी जिंदगी ही बदल कर रख दी। हॉस्पिटल से छुट्टी मिली तो वे अपने साथ हुए हादसे को भूलकर एक बेहद कठिन और असंभव-से प्रतीत होने वाले लक्ष्य को साथ लेकर अस्पताल से बाहर निकलीं और ये लक्ष्य था विश्व की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट को फतह करने का।  उत्तराखंड में नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग और टाटा स्टील ऑफ एडवेंचर फाउंडेशन से प्रशिक्षण लेने के बाद 1 अप्रैल, 2013 को उन्होंने एवरेस्ट की चढ़ाई शुरू की। 53 दिनों की बेहद दुश्वार पहाड़ी चढ़ाई के बाद आखिरकार 21 मई को वे एवरेस्ट की चोटी फतह करने वाली विश्व की पहली महिला विकलांग पर्वतारोही बन गईं।

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