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फिल्म बनाने के लिए मुंबई आना जरूरी नहीं समझते हैं इम्तियाज अली 

 Imtiaz Ali

इम्तियाज अली ने 2005 में फिल्म ‘सोचा न था’ से फिल्म निर्देशन में कदम रखा था। तब से इनकी फिल्मों को पसंद करने वालों का एक बड़ा वर्ग है। ‘जब वी मेट’ (2007), ‘लव आज कल’ (2009), ‘रॉकस्टार’ (2011) और ‘हाइवे’ (2014) उनके खाते की कुछ शानदार फिल्में रहीं। पेश हैं उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश :

फिल्मों की ओर आपका रुझान कैसे पैदा हुआ?

मेरा बचपन झारखंड के जमशेदपुर शहर में बीता है। जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ तो अपने एक अंकल के सिनेमा हॉल जाने लगा था। मैं वहां मुफ्त में, बिना किसी रोक-टोक के फिल्में देखा करता। यही वह जगह थी, जहां से मेरा फिल्मों की ओर लगाव गहराया। 

फिल्म-निर्देशन के अपने शुरुआती अनुभव के बारे में बताएं...

‘सोचा न था’ बतौर फिल्म-निर्देशक मेरी पहली फिल्म थी। फिल्म बनाने का मौका मिलना मेरे लिए एक बड़ी बात थी। आखिर मेरा एक सपना पूरा हुआ था। ऊपर से फिल्म को लेकर लोगों की तारीफ मिलना और भी बड़ी बात थी।

क्या फिल्म-निर्देशन में आने के लिए मुंबई आना जरूरी है?

अब मुम्बई आकर फिल्म बनाने के लिए संघर्ष करना जरूरी नहीं रह गया। आप जहां हैं, वहीं रह कर फिल्म बना सकते हैं। जब मैंने शुरुआत की थी, तब फिल्म बनाने के लिए मुंबई आना जरूरी था। लेकिन आज हम सभी के पास मोबाइल है, जिसकी मदद से आप फिल्म बना सकते हैं। एक अच्छा कन्टेंट बना कर इंटरनेट पर डाल सकते हैं, जो आज अभिव्यक्ति का खुला मंच है।

आपकी ज्यादातर फिल्में पसंद करने वाले युवा हैं। लेकिन आपके निर्देशन की पिछली फिल्म ‘जब हैरी मेट सेजल’ उनकी उम्मीदों पर उतनी खरी नहीं उतर सकी। इसे कैसे देखते हैं?

मेरी जिंदगी में न तो यह पहली असफलता है, न ही आखिरी है। मैं हमेशा अपने काम को लेकर खुद से सवाल करता हूं। ईमानदारी से कहूं तो मैंने अपनी सफलताओं की अपेक्षा अपनी असफलताओं से ज्यादा सीखा है। यहां तकलीफ सिर्फ इस एहसास से होती है कि मैंने उम्मीद से कुछ कम किया। इससे मैं बिखरता नहीं हूं। मेरे लिए दोनों ही स्थितियां बराबर हैं।

क्या आपने पिछली फिल्म के न चलने की वजह जानने की कोशिश की?

मेरी फिल्मों को लेकर मेरा विश्लेषण हमेशा पक्षपातपूर्ण होगा। मुझे पसंद करने वाले आसपास के लोग भी एक पक्ष की बात करेंगे। अगर अपने दिमाग से सोचूं तो वह सिर्फ मेरा अपना नजरिया होगा। दूसरी तरफ तटस्थ होकर देख पाना बहुत मुश्किल होता है। मैं इसकी कोशिश जरूर करता हूं। फिल्म के बनने के बाद कैसा हिसाब-किताब करना। आखिर रिलीज के बाद आप वैसे भी कुछ नहीं कर सकते।  हां, मैंने अपनी हरेक फिल्म को एक ही जज्बे के साथ बनाया है। फिर चाहे वह ‘जब हैरी मेट सेजल’ हो या ‘रॉकस्टार’। कुछ फिल्में अच्छा करेंगी। कई बार लगता है कि मुझे किसी चीज के लिए ज्यादा महत्व दिया जा रहा है और कई बार लगता है कि मुझे किसी चीज के लिए कम महत्व दिया गया। 

आपकी फिल्में खुद को जानने की यात्रा की तरह होती हैं। हरेक फिल्म में प्रेम की आभा नजर आती है। आपका इसे लेकर क्या अनुभव है?

मेरी हरेक फिल्म प्रेम के बारे में कहती नजर आती जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेरे पास इसका कोई स्पष्ट जवाब है। अगर मुझे कभी सच्चे प्रेम का एहसास हुआ भी है तो मुझे उसके बारे में याद नहीं। मैं निजी तौर पर आपसे ज्यादा खोया हुआ और अस्पष्ट हो सकता हूं। जब मैं नौजवान था और अब जब मैं इतना बड़ा हो गया हूं, मैं नहीं मानता कि मैंने इसके बारे आपसे कुछ अलग जाना है या बेहतर समझा है। मेरा मानना है कि प्रेम एक रहस्य है।     

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