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22 फरवरी, 2020|2:03|IST

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कैफी आजमी को बचपन से था शेरो-शायरी कौ शौक, पढ़ें उनकी 5 मशहूर रचनाएं

कैफी आजमी को बचपन से था शेरो-शायरी कौ शौक, पढ़ें उनकी 5 मशहूर रचनाएं

उर्दू के एक अज़ीम शायर कैफी आज़मी का जन्म आजमगढ़ जिले के मिजवां गांव में 14 जनवरी 1919 को हुआ था। कैफी का असली नाम अख्तर हुसैन रिजवी था। कैफी की शेरो-शायरी की प्रतिभा बचपन से ही दिखाई देने लगी थी। कैफी आजमी एक ऐसे शायर थे जिन्होंने अपनी शायरी में सामाजिक न्याय और समानता को अहमियत दी।  कैफी सैयद अतहर हुसैन रिजवी उर्फ कै फी आजमी के पिता जमींदार थे। कैफी आजमी ने महज 11 साल की उम्र से ही मुशायरों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। जहां उन्हें काफी तारीफें भी मिलती थी। 1944 में सिर्फ 26 साल की उम्र में पहला संग्रह 'झनकार' छपी थी। पढ़ें उनकी ऐसी ही 5 रचनाएं, जो आज भी लोगों की जुबान पर रहती है।

राह में टूट गये पांव तो मालूम हुआ
जुज मेरे और मेरा राहनुमा कोई नहीं
एक के बाद खुदा एक चला आता था
कह दिया अक्ल ने तंग आके खुदा कोई नहीं 
(आवारा सज्दे)

जब पिता ने ली थी कैफी आजमी की रचनाओं की परीक्षा, पढ़ें 5 रोचक बातें

आज की रात न फुटपाथ पे नींद आयेगी
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
या बाबरी मस्जिद के गिरने के बाद उनकी यह नज्म सोचने वाले हर शख्स की जुबान पर गूंजने लगी. 
राम बनबास से जब लौट के घर में आये
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये
राजधानी कि फिजा आई नहीं रास मुझे
छे दिसम्बर को मिला दूसरा बनबास मुझे
(दूसरा बनबास)

ख़ारो-ख़स तो उठें, रास्ता तो चले
मैं अगर थक गया, काफ़िला तो चले
चाँद-सूरज बुजुर्गों के नक़्शे-क़दम
ख़ैर बुझने दो इनको, हवा तो चले
हाकिमे-शहर, ये भी कोई शहर है
मस्जिदें बन्द हैं, मयकदा तो चले
(काफिला तो चले)

ये जीत-हार तो इस दौर का मुक्द्दर है
ये दौर जो के पुराना नही नया भी नहीं
ये दौर जो सज़ा भी नही जज़ा भी नहीं
ये दौर जिसका बा-जहिर कोइ खुदा भी नहीं
(दो-पहर)

उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
तू कि बेजान खिलौनों से बहल जाती है
तपती सांसों की हरारत से पिघल जाती है
पांव जिस राह में रखती है फिसल जाती है
बनके सीमाब हर इक ज़र्फ में ढल जाती है
जीस्त के आहनी सांचे में भी ढलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे

(औरत)

 

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