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पिता के अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं थे पैसे, मुश्किल वक्त में फराह खान के बहुत काम आई डार्क कॉमेडी

Farah Khan Struggle: फराह खान ने बताया, "हमारे पास अपने घर के मुख्य दरवाजे का लॉक ठीक करवाने के भी पैसे नहीं होते थे। तो हमारी मां उस दरवाजे को बंद रखने के लिए वहां पत्थर रख दिया करती थीं।"

पिता के अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं थे पैसे, मुश्किल वक्त में फराह खान के बहुत काम आई डार्क कॉमेडी
Puneet Parashar लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्लीMon, 2 Oct 2023 05:51 AM
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फिल्ममेकर फराह खान ने इंडस्ट्री को ढेरों कमाल की फिल्में दी हैं, लेकिन बावजूद इसके कि वह फिल्म इंडस्ट्री बैकग्राउंड से थीं, उनका शुरुआती सफर बहुत आसान नहीं था। फराह खान के पिता कामरान खान एक एक्टर-प्रोड्यूसर और डायरेक्टर थे। एक इंटरव्यू में फराह खान ने बताया कि जब उनके पिता की मौत हुई तो उनकी जेब में महज 30 रुपये थे। फिल्ममेकर ने बताया कि उन्हें और उनके भाई को अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए पैसे जमा करने पड़े थे।

पिता के अंतिम संस्कार के लिए जमा करने पड़े पैसे
फराह खान ने मनीष पॉल के साथ बातचीत में कहा, "एक रात पहले उन्होंने ताश खेले थे और उनकी जेब में महज 30 रुपये थे जो उन्होंने यह गेम खेलकर जीते थे। साजिद खान ने भी बिग बॉस में यह कहानी सुनाई थी कि कैसे हमें अलग-अलग जगहों से पैसा इकट्ठा करना पड़ा था ताकि उनका अंतिम संस्कार कर सकें। विडंबना देखिए कि जो लोग उस रात ताश खेलने आए थे वो लिविंग रूप में नहीं खेल पाए, इसलिए वो टेरेस पर चले गए, ताकि अपना गेम चालू रख सकें।"

पत्थर रखकर बंद करना पड़ता था घर का दरवाजा
फराह खान ने बताया कि शुरू में वह बिगड़ गई थीं और हर रोज रिकॉर्ड्स खरीदा करती थीं ताकि ग्रामोफोन पर उन्हें बजाकर डांस कर सकें, हालांकि धीरे-धीरे उन्हें अपने परिवार की तेजी से बिगड़ रही आर्थिक स्थिति का अंदाजा हो गया। उन्होंने बताया, "एक वक्त पर हमारे घर की हालत इतनी बिगड़ गई थी कि हमारे पास अपने घर के मुख्य दरवाजे का लॉक ठीक करवाने के भी पैसे नहीं होते थे। तो हमारी मां उस दरवाजे को बंद रखने के लिए वहां पत्थर रख दिया करती थीं।"

डार्क ह्यूमर की मदद से बीत गया वो मुश्किल वक्त
फिल्म निर्देशक-कोरियोग्राफर फराह खान ने बताया कि हालांकि वो वक्त बहुत मुश्किलों भरा था लेकिन उनके सेंस ऑफ ह्यूमर ने उनकी बहुत मदद की। ताकि वह जिंदगी के इन उतार चढ़ावों से आगे निकल सकें। उन्होंने कहा, "हमारे पिता के गुजरने के एक या दो हफ्ते बाद हमें डार्क ह्यूमर से सुकून मिलने लगा। हम अंतिम संस्कार में आने वाले लोगों का मजाक बनाने लगे कि कैसे वो बहुत फेक हुआ करते थे और उनके दिमाग में असल में यही चल रहा होता था कि कैसे पत्ते खेलने के लिए कोई नई जगह मिले। इस तरह के ह्यूमर ने उस मुश्किल वक्त से निकलने में हमारी बड़ी मदद की। वरना बड़ा आसान होता कि हम डिप्रेशन में चले जाते।"

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