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एआर रहमान ने खुद बताई वजह, इसलिए सभी प्रोजेक्ट के लिए नहीं करते हां

संगीत की दुनिया का हर एक बड़ा पुरस्कार अपने नाम कर चुके एआर रहमान ने साल 1990 में आई तमिल फिल्म 'रोजा' से अपने करियर की शुरुआत की थी। भारत के अलावा अंतरराष्ट्रीय सिनेमा और थियेटर में भी उनका दखल बरकरार है। उन्होंने दो दशक के अपने करियर में भारतीय फिल्म संगीत को विश्व में एक अलग पहचान दी है। पेश हैं उनसे बातचीत के कुछ अंश-

संगीत की दुनिया में अपने संघर्ष के बारे में बताएं।

ऐसा नहीं है कि मैंने जीवन में सिर्फ संगीत के लिए ही संघर्ष किया। मैं काफी छोटा था, जब पिता गुजर गए। मैं 10 साल की उम्र में घर की जिम्मेदारी संभालने लगा था। हालात कुछ ऐसे थे कि मैं अपनी उम्र से पहले ही बड़ा हो गया और अपनी बहनों और मां की जिम्मेदारी उठा ली। मैंने बाकी बच्चों की तरह अपना बचपन नहीं जिया है। मैं दिन में दूसरों के लिए और रात में अपने लिए काम करता था। पूरी रात काम करने के बाद मैं सुबह की नमाज पढ़ता था और फिर कुछ देर आराम करने के बाद काम पर चला जाता था। वह आदत आज भी बनी हुई है और आज भी मैं रात भर काम करता हूं।

बॉलीवुड में अक्सर कई निर्माता-निर्देशक यह शिकायत करते हैं कि आप आसानी से किसी को संगीत देने के लिए हां नहीं करते। ऐसा क्यों है?

मैं अपने सभी प्रोजेक्ट को काफी समय देता हूं, इसलिए मेरे पास समय की कमी रहती है। दूसरा, मुझे यात्राएं भी बहुत करनी पड़ती हैं। ऐसे में कुछ लोग निराश होते हैं, जब मैं उनके साथ काम न कर पाने की असमर्थता जताता हूं। मेरा मानना है कि एक साथ बहुत सा काम हाथ में लेने से न तो आप अपने साथ न्याय कर पाते हैं, न दूसरे के साथ। मैं यह बिल्कुल पसंद नहीं करता कि मैं स्टूडियो में खड़ा होकर सोचूं कि पहले किसका काम करूं और किसको लटका कर रखूं।

किसी भी प्रोजेक्ट के लिए आपका हां कहने का क्या पैमाना है?

मेरा कोई खास पैमाना नहीं है। मेरे साथ काम करने की एक ही शर्त होती है और वह है मेरे दिल को राजी करना। मैं बड़ा नाम नहीं देखता, सिर्फ यह देखता हूं कि मैं जो काम कर रहा हूं, उसके लिए मेरा दिल हां कह रहा है या नहीं। मैं ऐसा कोई काम नहीं करता, जो किसी भी तरह दिलचस्प न लगे। 

गीत ‘जय हो' के लिए आपको ऑस्कर मिला। क्या आपका यह गीत अब तक का सर्वश्रेष्ठ कम्पोजीशन था?

मैं जब भी कोई संगीत रचता हूं तो जरूर ध्यान देता हूं कि वह कहां की संस्कृति के लिए है। गीत ‘जय हो' को मैंने जब संगीत दिया तो वह उस समय के हिसाब से ठीक था। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि वह सर्वश्रेष्ठ है। मैं गाने कंपोज करने के बाद कुछ दिन के लिए छोड़ देता हूं। फिर कई दिनों बाद उन्हें सुनता हूं। जब मैं किसी गाने को दोबारा सुनूं तो वह मुझे खराब नहीं लगना चाहिए। एक बार मैंने एक कम्पोजीशन पर पांच साल लगाए थे, लेकिन बाद मैं कंपनी ने उसे लेने से मना कर दिया और मेरी मेहनत बेकार हो गई। यहां कुछ भी सर्वश्रेष्ठ नहीं होता।

आप खुद किस तरह के गाने सुनते हैं? क्या आपको दूसरे संगीतकारों के गाने कभी पसंद आए हैं?

मेरा लगाव तो शास्त्रीय संगीत से है। मैं घंटों तक शास्त्रीय संगीत में डूबा रहता हूं। मैं अक्सर ऐसी जगहों पर जाता हूं, जहां पर ढेर सारे कलाकार एक जगह एक-साथ बैठकर अलग-अलग वाद्य यंत्र बजा रहे होते हैं। मैं चाहता हूं कि हमारे देश के युवा भी इस तरह का संगीत पसंद करें और इस पर काम करें। हमारे यहां पर गायक ज्यादा होते हैं, लेकिन अलग-अलग वाद्य यंत्र बजाने वाले बहुत ही कम हैं। मेरी कोशिश है कि मैं उनकी संख्या को बढ़ा सकूं।

आपकी आवाज को भी लोग पसंद करते हैं। आप कैसे तय करते हैं कि यह गाना आप खुद गाएंगे?

मेरी आवाज की कुछ सीमाएं हैं। मैं हर तरह के गाने नहीं गा सकता। मैं वह गाना चुनता हूं, जो मेरी आवाज को सूट करे। मुझे मस्ती भरे गाने पसंद हैं और मैं पूरे दिल के साथ उन्हें गाता हूं। 

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