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मुश्किलों ने दी आगे बढ़ने की हिम्मत

swapna burman

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी इलाके में पली-बढ़ीं स्वप्ना के दोनों पैरों में छह-छह उंगलियां थीं। इसको लेकर उन्हें हमेशा से दिक्कत रही। बचपन में साथी बच्चे उनकी उंगलियां देखकर तरह-तरह के सवाल करते। बच्चों के मन में अजूबा रहता कि आखिर इस लड़की के पांव में एक उंगली ज्यादा क्यों है? खुद स्वप्ना को भी यह सवाल परेशान करता था। 

परिवार के हालात कभी अच्छे नहीं रहे। पापा रिक्शा चलाकर घर का गुजारा चलाते थे। उनकी कमाई कम पड़ने लगी, तो मां चाय के बागान में मजदूरी करने लगीं। स्वप्ना सरकारी स्कूल में पढ़ने लगीं। स्कूल जाने के लिए यूनीफॉर्म के साथ जूते पहनना जरूरी था। छह उंगलियां होने की वजह से उन्हें बड़ी परेशानी होती थी। हमेशा लगता था कि उनका पांव बाकी बच्चों के पांव से ज्यादा चौड़ा है। जूता पांव में फिट ही नहीं होता था। इसलिए दर्द के साथ स्कूल जाना पड़ता था। स्वप्ना सात साल की थीं, जब पापा को लकवा मार गया। सरकारी अस्पताल में लंबा इलाज चला, पर कोई फायदा नहीं हुआ। उनका चलना-फिरना बंद हो गया। अब वह रिक्शा चलाने में असमर्थ थे। मां की मुश्किलें बढ़ गईं। बाहर जाकर पैसे कमाने पड़ते थे, साथ में घर में बीमार पति की देखभाल भी करनी होती थी। उन्होंने डटकर हालात का सामना किया। 

नन्ही स्वप्ना मां की परेशानी समझ रही थीं। बाकी बच्चों की तरह उन्होंने कभी नए बस्ते या नई किताबों की मांग नहीं की। बिना कुछ कहे पूरा ध्यान पढ़ाई में लगा दिया। दस साल की उम्र से वह स्कूल की खेल-कूद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगीं। इसी दौरान खेल टीचर ने देखा कि यह लड़की तो बहुत तेज दौड़ती है। दौड़ के साथ लंबी कूद में भी वह अव्वल थीं। उनके खेल टीचर अभिजीत मजूमदार कहते हैं- मैं उसे बचपन से जानता हूं। वह बहुत मेहनती और शांत लड़की है। उसके अंदर हमेशा से कुछ कर गुजरने का जज्बा था। तमाम मुश्किलें सहकर उसने यह मुकाम हासिल किया है। मुझे नाज है उस पर। इसलिए वह चाहते थे कि यह लड़की हर प्रतियोगिता में हिस्सा ले। पर घर के हालात ऐसे नहीं थे कि वह स्पोर्ट्स के लिए जूते और किट खरीद पातीं। पढ़ाई के बाद रोजाना अभ्यास करना पड़ता था। ट्रेनर ने उन्हें दूध पीने और अंडे खाने की सलाह दी। स्वप्ना जानती थीं कि मां उन्हें यह सब नहीं खिला पाएंगी। इसलिए उन्होंने घर पर कभी बताया कि उन्हें पोषक तत्व वाले खाने की जरूरत है। बड़ी मुश्किल से स्कूल की फीस और किताबों का इंतजाम हो पाता था। दौड़ने के लिए अच्छे जूते चाहिए थे। मां ने किसी तरह इंतजाम किया। जूते तो आ गए, पर पांव की छह उंगलियां बहुत दिक्कत कर रही थीं। जूते पांव में नहीं आते थे। दौड़ते या कूदते समय उंगलियों में काफी दर्द होता था। कई बार गुस्सा आता था। भगवान ने मुझे ही ऐसे पांव क्यों दिए? पर उन्होंने इस कमी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वह कहती हैं- पांव चौड़ा होने की वजह से मेरे जूते बहुत जल्दी फट जाते थे। बार-बार जूते खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। पूरी ताकत के साथ दौड़ने में दिक्कत होती। मैं परेशान हो जाती थी। पर मैंने दौड़ना नहीं छोड़ा। 

तमाम बाधाओं को पीछे छोड़ते हुए वह आगे बढ़ती रहीं। स्कूल की सिफारिश पर उन्हें खेल ट्रेनिंग के लिए एकेडमी भेजा गया। गो स्पोर्ट्स फाउंडेशन नाम की संस्था ने ट्रेनिंग का खर्च उठाया। भले ही स्वप्ना के परिवार में कोई पढ़ा-लिखा नहीं था। किसी को खेल के बारे में जानकारी नहीं थी, पर मां को यकीन था कि बेटी जरूर कमाल करेगी। इसलिए उन्होंने कभी उसे खेलने से नहीं रोका। स्वप्ना पहले जिला, फिर राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगीं। बाधा दौड, ऊंची कूद और गोला फेंक क्षमता में उनका जवाब नहीं था। ऐसी ही सात स्पाद्र्धाओं वाले खेल हेप्टाथलन में वह पारंगत हो चुकी थीं। प्रतियोगिता जीतने पर जो ईनाम राशि मिलती, वह मां को लाकर दे देतीं और कहतीं, इन पैसों से पापा की दवा ले आना। 

स्वप्ना ने वर्ष 2017 में पटियाला फेडरेशन कप जीता। इसके अलावा, इसी साल भुवनेश्वर में एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल अपने नाम किया। इस साल वह एशियाड में हिस्सा लेने जकार्ता पहंुचीं। खेल से पहले उनके दांतों में तेज दर्द होने लगा। दर्द इतना तेज था कि खेल पर ध्यान एकाग्र करना मुश्किल हो रहा था। नियमों के मुताबिक, प्रतियोगिता के पहले वह कोई दर्द निवारक दवा नहीं ले सकती थीं। स्वप्ना कहती हैं- दांतों का दर्द असहनीय था। मैंने अपने मुंह पर कसकर कपड़े की पट्टी बांधी और उतर गई मैदान में। सच कहूं, तो खेल के दौरान मैं दर्द बिल्कुल भूल गई।  
पूरे देश की निगाहें स्वप्ना पर थीं। उन्होंने सात स्पद्र्धाओं में 6,026 अंक हासिल करके गोल्ड मेडल अपने नाम किया। वह हेप्टाथलन में स्वर्ण जीतने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी हैं। मां बाशोना कहती हैं- मैं अपनी बेटी को कभी पौष्टिक भोजन नहीं खिला पाई। मेरी बेटी ने यह सब अपनी मेहनत से हासिल किया है। अब मेरी एक ही ख्वाहिश है कि मेरी बच्ची ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीते।

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  • Web Title:swapna burman article in Hindustan on 2nd september