दर्जी कहकर माता-पिता ने मुगल-ए-आजम के संगीतकार को लड़की वालों से मिलवाया था, फिर क्या हुआ?

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मुगल-ए-आजम के संगीतकार के माता-पिता ने समाज के डर से लड़की वालों से झूठ बोला था। उन्होंने लड़की वालों को नहीं बताया था कि उनका बेटा संगीतकार है।

दर्जी कहकर माता-पिता ने मुगल-ए-आजम के संगीतकार को लड़की वालों से मिलवाया था, फिर क्या हुआ?

ये बात 1940 के दशक की है। उन दिनों भारत में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को आज की तरह इज्जत की नजरों से नहीं देखा जाता था। लोग सिनेमा की दुनिया में काम करने वालों को और इस पेशे को बहुत छोटा समझते थे। इसी दौर के एक मशहूर संगीतकार थे नौशाद साहब। जब उनके निकाह की बात चली, तो उनके माता-पिता के सामने एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई। क्या? आइए बताते हैं।

क्या हुआ?

दरअसल, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वो लड़की वालों को कैसे बताएं कि लड़का हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा है। ऐसे में उन्होंने झूठ कहने का फैसला लिया। उन्होंने समाज के डर से लड़की वालों से कहा कि उनका बेटा एक दर्जी है।

फिर सच सामने आया या नहीं?

लेकिन किस्मत का खेल तो देखिए। जब शादी का दिन आया और बारात लड़की वालों के घर पहुंची, तो वहां जो शहनाई और गाने बज रहे थे, वे 1944 की सुपरहिट फिल्म 'रतन' के थे। मजे की बात ये थी कि उस फिल्म का संगीत किसी और ने नहीं, बल्कि खुद दूल्हे राजा यानी संगीतकार नौशाद ने ही तैयार किया था। बता दें, ये दिलचस्प किस्सा स्वयं गांगुली ने अपनी नई किताब 'चेम्बर्स बुक ऑफ सिनेमा फैक्ट्स' में बताया था।

नौशाद

नौशाद साहब के बारे में

नौशाद साहब की इस जादुई दुनिया में सिर्फ यही एक किस्सा नहीं था, बल्कि उनका पूरा करियर ही चमत्कारों और रिकॉर्ड्स से भरा हुआ था। अगर उनकी कामयाबियों पर नजर डालें, तो वे हिंदी सिनेमा के असली 'शहंशाह-ए-म्यूजिक' थे। अपने पूरे करियर में उन्होंने एक के बाद एक कई ब्लॉकबस्टर गाने दिए। उनकी फिल्में थिएटर्स में महीनों और सालों तक टिकी रहती थीं। उन्होंने सिनेमा को अनगिनत सिल्वर, गोल्डन और डायमंड जुबली हिट फिल्में दीं। इनमें 'रतन' (1944), 'मदर इंडिया' (1957) और 'मुगल-ए-आजम' (1960) जैसी फिल्में शामिल हैं, जिनके गाने आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं।

ऑस्कर तक का सफर

नौशाद साहब का संगीत सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में गूंजा। उनके शानदार बैकग्राउंड स्कोर और संगीत से सजी फिल्म 'मदर इंडिया' (1957) ऑस्कर में 'बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म' की कैटेगरी में नॉमिनेट होने वाली भारत की पहली फिल्म बनी थी।

उम्र को मात देने वाला जज्बा

संगीत के प्रति उनका जुनून आखिरी सांस तक कम नहीं हुआ। साल 2005 में आई फिल्म 'ताजमहल: एन इटरनल लव स्टोरी' के लिए जब उन्होंने संगीत तैयार किया, तब उनकी उम्र 86 साल थी। इतनी उम्र में एक पूरी फिल्म का संगीत देकर उन्होंने दुनिया के सबसे बुजुर्ग संगीतकारों में अपना नाम दर्ज करा कर एक अनोखा रिकॉर्ड बना दिया था।

अवॉर्ड्स

भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान दादासाहब फाल्के पुरस्कार (1981) और देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म भूषण (1992) से सम्मानित किया गया था।

Vartika Tolani

लेखक के बारे में

Vartika Tolani

वर्तिका तोलानी डिजिटल मीडिया की एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें एंटरटेनमेंट और न्यूज रिपोर्टिंग में 6 साल से ज्यादा समय का अनुभव है। वर्तमान में वह ‘लाइव हिन्दुस्तान’ (HT Media Group) में चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर (Digital) के तौर पर अपनी सेवाएं दे रही हैं। वर्तिका न केवल बॉलीवुड और ओटीटी की दुनिया पर पैनी नजर रखती हैं, बल्कि डेटा और रिसर्च के साथ अपनी बात कहती हैं।



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वर्तिका के प्रोफेशनल सफर की शुरुआत दैनिक भास्कर (इंदौर) से हुई, जहां उन्होंने सिटी रिपोर्टर के रूप में शहर की हलचलों और सेलिब्रिटी इंटरव्यूज से अपनी पहचान बनाई । इसके बाद उन्होंने दैनिक भास्कर (भोपाल) में सब-एडिटर रहते हुए CBSE और UGC जैसी बड़ी संस्थाओं के प्रमुखों का इंटरव्यू किया ।
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वर्तिका ने मीडिया की बारीकियों को किताबी और प्रैक्टिकल, दोनों स्तरों पर समझा है:
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