अमिताभ के किरदार की मौत पर बजे इस गाने ने ऑडियंस को रुला दिया, सिर्फ 4 लाइन गाने के लिए बुलाए रफी साहब
अमिताभ बच्चन की एक फिल्म के एक गाने की सिर्फ चार लाइन गाने के लिए मोहम्मद रफी को बुलाया गया था। सिंगर की आवाज के उस दर्द को जब ऑडियंस ने सुना तो अपने आंसू नहीं रोक पाई। इस गाने ने वो कमाल कर दिया था जो किशोर कुमार भी नहीं कर पाए।

सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन ने अपने करियर के शुरुआती सालों में शानदार और सफल फिल्में की। 70 का दशक तो अमिताभ के नाम रहा। इस दशक में आई उनकी फिल्में शोले, डॉन, अमर अकबर एंथनी, दीवार, काला पत्थर, परवरिश, सुहाग, कभी कभी, अभिमान, त्रिशूल जबरदस्त हिट रही। इसी लिस्ट में उनकी फिल्म मुकद्दर का सिकंदर भी शामिल थीं। 1978 में आई इस फिल्म में अमिताभ के साथ रेखा, राखी और विनोद खन्ना जैसे एक्टर नजर आए थे। इस फिल्म से जुड़ा एक खास किस्सा है। दरअसल, फिल्म के एक गाने की सिर्फ चार लाइन गवाने के लिए खासतौर पर रफी साहब को बुलाया गया था। और इन चार लाइन ने जो कमाल किया वो आज तक ऑडियंस नहीं भूल पाई है।
अमिताभ पर फिल्माया गाना
मुकद्दर का सिकंदर अमिताभ बच्चन के करियर की खास फिल्म मानी जाती है। इस फिल्म की कहानी और जबरदस्त परफॉरमेंस के साथ म्यूजिक ने अपनी लगा जगह बनाई थी। फिल्म का म्यूजिक कल्याणजी-आनंदजी ने तैयार किया था। अनजान ने गीत लिखे। अमिताभ पर फिल्माए फिल्म के सभी गाने किशोर कुमार से गवाए गए जिसमें टाइटल ट्रैक 'वो मुकद्दर का सिकंदर', 'ओ साथी रे' शामिल है। लेकिन म्यूजिक कंपोजर कल्याणजी-आनंदजी को एक सीन के लिए सिर्फ चार लाइन का गीत चाहिए था। इन चार लाइन में इतना दर्द दिखाना चाहते थे कि सीन ऑडियंस की आत्मा में उतर जाए। ऐसे में म्यूजिक डायरेक्टर्स को मोहम्मद रफी की याद आई।
ऐसे मनाया गया मोहम्मद रफी को
कल्याणजी को बहुत संकोच हो रहा था कि वो सिर्फ फिल्म के गाने की इन चार लाइन के लिए रफी के पास कैसे जाए। फिर भी बहुत सोच विचारने के बाद दोनों भाइयों ने रफी को अपने दिल की इच्छा बताने के बारे में सोचा। क्योंकि जो दर्द वो गाने में चाहते थे वो दर्द रफी की आवाज से ही निकल सकता था। ऐसे में जब दोनों भाइयों ने अपनी इच्छा सिंगर को बताई तो उन्हें हैरानी हुई। रफी साहब ने बोला कि जब सभी गाने किशोर कुमार से गवाए जा रहे हैं तो ये क्यों नहीं। कल्याणजी-आनंदजी ने रिक्वेस्ट की और रफी साहब ने अपने बिजी शेड्यूल में से कुछ समय उस गाने को दिया। रफी साहब रिकॉर्डिंग स्टूडियो आए और उन चार लाइन को गा कर चले गए। उन्होंने इसके लिए कोई फीस भी नहीं ली।
फिल्म का सबसे इमोशनल सीन
अंत में रफी साहब की आवाज में जब ये चार लाइन वाला गाना थिएटर में बजा तो ऑडियंस तक वो दर्द पहुंच गया। ऑडियंस रो रही थी। रफी की दर्दभरी आवाज और अमिताभ की एक्टिंग ने कमाल कर दिया था। फिल्म का ये सीन सबसे खास था।
इस गाने ने ऑडियंस को रुला दिया
अब चलिए उन चार लाइन और सीन के बारे में भी बता देते हैं। फिल्म मुकद्दर का सिकंदर के अंत में एक सीन है जब राखी को शादी के मंडप के नीचे पता चलता है कि वही सिकंदर की वो मेम साब है जिसे वो बच्चन से प्यार करता है। इसके बाद अमिताभ बच्चन के डेथ के सीन को दिखाया जाता है। इस मौत के सीन के बाद एक गाना बजता है ‘जिंदगी तो बेवफा है, एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी, मरके जीने की अदा जो दुनिया को सिखलाएगा वो मुकद्दर का सिकंदर कहलाएगा’। इस सीन और गाने पर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रफी की आवाज में इन चार लाइन ने कमाल कर दिया था।
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