लोग वोट डालने लायक समझदार हैं, लेकिन फिल्म देखने लायक नहीं? RGV बोले- बैन हो सेंसर बोर्ड
राम गोपाल वर्मा ने कहा कि आए दिन फिल्मों में काट-छांट करना और उन्हें बैन किए जाने का सिलसिला बंद होना चाहिए। लीजेंडरी डायरेक्टर ने पूछा कि क्या जो लोग वोट डालकर सरकारें चुनने लायक समझदार हैं, वो फिल्म देखकर सही और गलत का फैसला करने लायक समझदार नहीं है?

आए दिन सेंसर बोर्ड के फिल्मों पर तरह-तरह की पाबंदियां लगाने और फिल्ममेकर्स को क्रिएटिव फ्रीडम नहीं दिए जाने पर लीजेंडरी डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा ने अपना गुस्सा जाहिर किया है। राम गोपाल वर्मा ने देश के सेंसर बोर्ड को ही बैन करने की बात कह डाली है। राम गोपाल वर्मा ने कहा कि आज स्मार्टफोन, लाइव स्ट्रीमिंग और ग्लोबल इनफॉर्मेशन एक्सेस के दौर में सरकार द्वारा चुने गए सेंसर बोर्ड के मेंबर्स जानकारियों को दबाकर देश की वयस्क ऑडियंस का अपमान कर रही है। राम गोपाल वर्मा ने कहा कि यह दोगलापन है कि देश की जनता को इस काबिल तो समझा जाता है कि वो वोट डाल सकते हैं, परिवार और बिजनेस की जिम्मेदारी उठा सकते हैं, लेकिन उन्हें इस लायक नहीं समझा जाता कि वो एक फिल्म में दिखाई गई हिंसा, भाषा और कामुकता पर विवेकपूर्ण ढंग से फैसला ले पाएं।
फिल्मों पर सेंसरशिप दर्शकों का अपमान है
राम गोपाल वर्मा ने कहा कि सेंसरशिव टोरेंट और सोशल मीडिया के जरिए ऐसी चीजों का डिस्ट्रिब्यूशन होना बढ़ा देती है। बता दें कि राम गोवाल वर्मा की यह X पोस्ट उस वक्त आई है, जब पिछले दिनों 'सतलुज' और ऐसी अन्य फिल्में सेंसर बोर्ड के निशाने पर रह चुकी हैं। राम गोपाल वर्मा ने अपनी पोस्ट में लिखा, “फिल्मों पर सेंसरशिप असल में दर्शकों का अपमान है। स्मार्टफोन, ग्लोबल स्ट्रीमिंग और असीमित जानकारी के दौर में, यह सोचना कि सरकार की बनाई कोई कमेटी किसी फिल्ममेकर के नजरिए से दिखाई गई सच्चाई से वयस्कों को बचा सकती है, न सिर्फ पुरानी सोच है बल्कि बेवकूफी भी है।”
युवाओं से दोगला बर्ताव कर रही हैं सरकारें
RGV ने लिखा- असली दोगलापन तो यह है... अगर कोई वयस्क देश का नेता चुनने, परिवार पालने और बिजनेस चलाने के लिए समझदार है, तो वह खुद यह तय क्यों नहीं कर सकता कि उसे क्या देखना है? उन्होंने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा- एक तरफ, सरकार वयस्कों पर वोट देने के लिए भरोसा करती है, जिससे एक अरब से ज्यादा लोगों का भविष्य तय होता है, और दूसरी तरफ उन्हें लगता है कि फिल्म का कोई सीन उन्हें बिगाड़ सकता है। यह समाज की सुरक्षा नहीं, बल्कि उसे बच्चों जैसा समझने जैसा है। राम गोपाल वर्मा ने पिछले दिनों ही रिलीज हुई फिल्म ऑब्सेशन के एक सीन को सेंसर बोर्ड की तरफ से हटाए जाने का उदाहरण देते हुए कहा कि इस सीन को थिएटर में हटा दिया गया, लेकिन उससे 10 गुना ज्यादा लोगों ने इसे सोशल मीडिया पर देखा।
सेंसर बोर्ड को कोर्ट में चुनौती देने का वक्त
डायरेक्टर ने तर्क दिया कि किसी भी चीज को बैन करना उसकी डिमांड बढ़ा देता है। राम गोपाल वर्मा ने कहा कि मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है जब इंडस्ट्री को एकजुट होकर सेंसर बोर्ड के मौजूदा स्वरूप को कोर्ट और पब्लिक डिसकशन्स में चुनौती देना चाहिए। लोकतंत्र अभिव्यक्ति की आजादी की मांग करता है और आज की जुड़ी हुई दुनिया में, सिनेमा को अलग-थलग करना और उसे बिगाड़ना न सिर्फ आंखें और कान बंद कर लेने जैसा है... बल्कि यह हमारी तरक्की के लिए आत्मघाती भी है। राम गोपाल वर्मा की पोस्ट पर लोगों का रिएक्शन देखने लायक है। ज्यादातर लोगों ने उनके सपोर्ट में लिखा है और इस मुद्दे पर चर्चा किए जाने की बात कही है।
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