VFX नहीं मेकर्स ने लगाया गजब का दिमाग, 1957 में मेकर्स ने यूं शूट किए ये मैजिकल सीन
Mayabazar Movie Kissa: आज असंभव लगने जैसे सीन्स को फिल्मों में दिखाना जितना आसान है, उतना पहले नहीं था। तब मेकर्स को दिमाग लगाकर किसी तरह वो सीन शूट करने पड़ते थे। इसका सटीक उदाहरण हमें साल 1957 में आई फिल्म मायाबाजार में देखने मिलता है।

साल 1957 में आई फिल्म 'मायाबाजार' कई मायनों में उस दौर की बहुत क्रिएटिव फिल्म मानी जाती है। इसमें कई सीन ऐसे थे, जिन्हें आज भी कोई देखकर यह कह सकता है कि यहां VFX का इस्तेमाल किया गया होगा, लेकिन जरा सोचिए, उन दिनों न तो कंप्यूटर इतने एडवांस थे, और ना ही तकनीक इतने एडवांस। तो फिर इन सीन्स को किस तरह तैयार किया गया? चलिए समझते हैं एक उदाहरण की मदद से। इस फिल्म का जो सीन आज भी चर्चा में रहता है, वो है 'घटोत्कच' को खाना खाने से पहले साइज में बड़ा होते और फिर ढेर सारा खाना एक साथ खाते दिखाया गया है, वो आज भी बहुत लोगों को AI का कमाल लग सकता है।
कैसे शूट किए गए थे ये मैजिकल सीन?
अब सवाल यह उठता है कि आखिर इस सीन को शूट कैसे किया गया? तो जवाब बहुत आसान है। उस दौर में मेकर्स इतने क्रिएटिव थे कि महज 2 लाख रुपये में बनी इस फिल्म के घटोत्कच के साइज बढ़ने वाले सीन को शूट करने के लिए कैमरा को लो एंगल पर रखकर घटोत्कच एक ट्रॉली पर बिठाकर आगे मूव किया गया था। जहां तक घटोत्कच के मुंह में अपने आप उड़कर लड्डू आने वाले सीन की बात है तो इस सीन को नॉर्मली शूट किया गया और फिर रिवर्स करके स्पीड बढ़ा दी गई। इसी तरह फिल्म के उस सीन को फिल्माया गया था, जिसमें तश्तरियां अपने आप आगे बढ़ती हैं।
मेकर्स ने लगाया था गजब का दिमाग
इस सीन के लिए मेकर्स ने VFX नहीं होने पर एक बड़ी चालाक ट्रिक सोची। उन्होंने खाने के बर्तनों की अलग-अलग पोजिशन्स में कई तस्वीरें खींचीं। जिस तरह पुराने जमाने में एनिमेशन्स काम करते थे, बिलकुल वैसे ही उन्होंने इन तस्वीरों को एक खास सीक्वेंस में चलाया। जब इन सारी तस्वीरों को एक के बाद एक आप सीक्वेंस में देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि खाने के बर्तन अपने आप ही धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। जब ये शॉट लोगों ने पर्दे पर देखे थे तो वो हैरान रह गए थे। क्योंकि साल 1957 के हिसाब से इस तरह के सीक्वेंस पर्दे पर दिखाना बहुत मुश्किल था। हालांकि आज तो यह बहुत आसानी से किया जा सकता है।
VFX की वजह से घटती जा रही क्रिएटिविटी?
माना जाता है कि एक तरफ जहां VFX ने फिल्ममेकर्स के हाथ में एक बहुत बड़ी ताकत दे दी है, वहीं दूसरी तरफ इसकी वजह से फिल्मों में क्रिएटिव चीजों की कमी आने लगी है। क्योंकि कोई भी सीन फिल्माने से पहले मेकर्स उसे कई बार सीधे VFX टीम के हवाले कर देते हैं। बजाए यह सोचे कि किसी और तरकीब का इस्तेमाल करके शायद उसे कम बजट में और कहीं ज्यादा इम्पैक्टफुल तरीके से दिखाया जा सकता है।
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