जीना यहां मरना यहां…इस गाने को लिखने वाले बिहारी गीतकार ने सदमे में छोड़ दी दुनिया, भोजपुरी में भी लिखे गीत
राज कपूर ने अपनी फिल्मों से ‘मेरा जूता है जापानी’, ‘आवारा हूं’, ‘जीना यहां मरना यहां’ जैसे गाने दिए। लेकिन इन गानों को लिखने वाला तो 43 साल की उम्र में ही चल बसा। वो बिहारी गीतकार जिसने भोजपुरी में भी लिखे थे गाने। आज भी इनके गाने रुला देते हैं, राज कपूर को दी पहचान।

1970 में राज कपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर रिलीज हुई थी। इस फिल्म को बनाने में राज कपूर ने अपनी जमापूंजी लगा दी थी। लेकिन समय के साथ ये फिल्म कल्ट बन गई। इसकी बड़ी वजह फिल्म के किरदार राजू की इमोशनल कहानी और उनपर फिल्माए हुए गाने थे। फिल्म में कई खूबसूरत गाने थे। उनमें से एक गाना था ‘जीना यहां मरना यहां’। ये गीत आज खास है। इस गाने को लिखने वाले गीतकार की अलग कहानी है। एक ऐसा गीतकार जिसने राज कपूर का फिल्मी करियर सफल बनाने में मदद की।
राज कपूर की वो फ्लॉप फिल्म जो बन गई कल्ट
राज कपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर RK प्रोडक्शन तले बनने वाली ये उस दौर की सबसे बड़ी और महंगी फिल्म मानी जाती है। रिपोर्ट की मानें तो इस फिल्म को बनाने के लिए एक्टर-डायरेक्टर ने अपनी जमापूंजी लगा दी थी। लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हुई। उस समय राजू और उसके बचपन की कहानी, उसकी मरी हुई मां और द शो मस्ट गो ऑन जैसे डायलॉग नहीं चले। लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे सिनेमा आगे बढ़ा ये फिल्म अमर हो गई। आज ये RK फिल्म्स की सबसे कल्ट फिल्म मानी जाती है। इसके पीछे की बड़ी वजह फिल्म के इमोशनल कर देने वाले गाने थे। वैसे तो फिल्म में कई यादगार गाने थे लेकिन एक बहुत खास था। वो गीत था ‘जीना यहां मरना यहां इसके सिवा जाना कहां’। इस गाने को मुकेश ने अपनी आवाज दी थी और म्यूजिक कंपोज़ किया था शंकर-जयकिशन ने। गाने को शब्द दिए थे शैलेंद्र ने।
बिहार के शैलेंद्र
गीतकार शैलेंद्र पाकिस्तान के रावलपिंडी से भारत आए थे। लेकिन उनके पूर्वज बिहार के आरा के रहने वाले थे। छोटी उम्र में मां और बहन चल बसी। सिंगर काम की तलाश में मथुरा आए, पढ़ाई की और फिर जीवन, समाज पर कविताएं लिखने लगे। एक समारोह में राज कपूर ने शैलेंद्र को सुना और उनसे उनकी लिखी हुई कविता खरीदने की बात कह दी। शैलेंद्र ने पहले तो मना किया लेकिन जब प्रेग्नेंट बीवी के लिए पैसों की जरूरत हुई तो कविता बेच दी और फिर राज कपूर के साथ काम भी करने लगे। शैलेंद्र ने राज कपूर को 'मेरा जूता है जापानी', 'प्यार हुआ इकरार हुआ', 'रमैया वस्तावैया', 'दिल का हाल सुने दिलवाला', 'आवारा हूं', 'घर आया मेरा परदेसी' जैसे यादगार गाने दिए। ये वो गाने हैं जिन्होंने राज कपूर के करियर को नई पहचान दी। उन्हें इन गानों की वजह से नाम मिला। इसके अलावा शैलेंद्र ने अपनी भाषा भोजपुरी में भी कई गाने लिखे। ये वो दौर था जब भोजपुरी सिनेमा आगे बढ़ रहा था।
गीतकार से बने प्रोड्यूसर
शैलेंद्र ने इंडस्ट्री में अपनी पहचान बना ली थी। साल बीतने एक बाद इनका कद भी बड़ा हो गया था। 60 के दशक आते-आते उन्होंने फिल्मों में पैसा लगाने के बारे में सोचा। एक फिल्म बनाई तीसरी कसम जिसमें राज कपूर को लीड हीरो लिया। एक्टर ने अपने गीतकार के लिए ये फिल्म सिर्फ 1 रुपए की एडवांस फीस ली थी। वहीदा रहमान उनकी हीरोइन बनी और ये फिल्म थी तीसरी कमस जो 1966 में रिलीज हुई। फिल्म फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी 'मारे गए गुल्फाम पर बेस्ड थी। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हुई और इसी गम में शैलेंद्र शराब के नशे में डूब गए।
सदमा और फिर मौत
1966 खत्म होते-होते गीतकार से प्रोड्यूसर बने शैलेंद्र सदमे में चले गए। इसी साल के अंत में उनका निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 43 साल थी। हैरानी वाली बात ये है कि जिस फिल्म के लिए फ्लॉप होने पर शैलेंद्र ने खुद को बर्बाद कर लिया अगले साल उस फिल्म ने नेशनल अवॉर्ड जीता था। तब तक शैलेंद्र दुनिया को यादगार गीत देकर जा चुके थे।
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