AK-47 से ली गई थी 29 साल के पंजाबी सिंगर की जान, पुलिस अधिकारी ने ही मारी थी गोली
पंजाबी लोक गायक की 1996 में मंच पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस वारदात को किसी और ने नहीं, बल्कि पुलिस अधिकारी ने अंजाम दिया था।्

1980 और 90 के दशक में पंजाब की मिट्टी से एक ऐसा ही फनकार उभरा था, जिसकी बुलंद, ऊंची और दर्द में डूबी आवाज ने लोक संगीत को एक अलग पहचान दिलाई थी। मंच पर जब वह गाता था, तो सामने बैठा हर शख्स उनके सुरों में खो जाता था। उनका संगीत महज मनोरंजन नहीं था, उसमें पंजाब का सांस्कृतिक गौरव, भावनाओं की गहराई और मिट्टी की खुशबू महसूस होती थी।
क्या है इस गायक का नाम?
हम बात कर रहे हैं पंजाबी गायक दिलशाद अख्तर की। वह सिर्फ गाते नहीं थे, बल्कि अपनी आवाज और अंदाज से श्रोताओं को बांध लेते थे। उनकी गायकी में एक ऐसी ऊर्जा थी, जो खुले मैदानों में होने वाले अखाड़ों से लेकर बड़े मंचों तक लोगों को झूमने पर मजबूर कर देती थी। लेकिन जब उनका करियर सफलता की ऊंचाइयों को छू रहा था, तभी जिंदगी ने उनके सामने एक ऐसा दर्दनाक मोड़ ला दिया, जिसकी टीस आज भी पंजाबी संगीत प्रेमियों के दिलों में कायम है।
कहां के थे दिलशाद?
दिलशाद अख्तर का जन्म 1966 में पंजाब के फरीदकोट जिले में कोटकपूरा के पास स्थित गिल्जेवाला गांव में एक संगीत-समृद्ध परिवार में हुआ था। संगीत उनके लिए महज पेशा नहीं, बल्कि विरासत था। वह मशहूर पंजाबी गायक सरदूल सिकंदर के भांजे थे, जबकि उनकी बहन मनप्रीत अख्तर ने भी पंजाबी गायकी में अपनी अलग पहचान बनाई। बचपन से ही दिलशाद ने शास्त्रीय और लोक संगीत की बारीकियां सीखनी शुरू कर दी थीं।
दिलशाद ने गाए हैं ये प्रसिद्ध गाने
1980 के दशक के आखिर में जब उन्होंने पेशेवर संगीत की दुनिया में कदम रखा, तो उनकी तेज, बुलंद और ऊंचे सुरों वाली गायकी ने जल्द ही लोगों का ध्यान खींच लिया। ‘मन विच वसना’, ‘कोठे ते खलो माहिया’, ‘नाची जो साडे नाल’ और ‘साडा दिल मोड़ दे’ जैसे गानों ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। देखते ही देखते वह पंजाब के अखाड़ों के लोकप्रिय और चहेते गायकों में शामिल हो गए।
फिल्मी गाने भी गाए
दिलशाद अख्तर ने सिर्फ एल्बमों में ही अपनी आवाज का जादू नहीं बिखेरा, बल्कि ‘उडीकां’ और ‘जट्ट पंजाब दा’ जैसी पंजाबी फिल्मों के लिए भी गाया। उनकी आवाज में लोक संगीत की मिठास के साथ-साथ एक खास तरह की खनक थी, जो उन्हें अपने दौर के दूसरे गायकों से अलग बनाती थी।
29 साल की उम्र में हुआ निधन
यह वह दौर था जब 1984 के बाद पंजाब सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल, उग्रवाद और हिंसा के लंबे दौर से गुजर रहा था। ऐसे माहौल में कलाकारों के लिए सार्वजनिक मंचों पर जाकर कार्यक्रम करना आसान नहीं था। इसके बावजूद दिलशाद अख्तर ने अपनी गायकी और पंजाबी संस्कृति के जश्न को थमने नहीं दिया। वह लगातार मंचों पर गाते रहे और लोगों के बीच अपनी आवाज पहुंचाते रहे। लेकिन 28 जनवरी 1996 की रात उनकी जिंदगी और पंजाबी संगीत की दुनिया हमेशा के लिए बदल गई।
28 जनवरी के दिन क्या हुआ था?
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, गुरदासपुर जिले के सिंहपुरा गांव में एक शादी समारोह के दौरान दिलशाद अख्तर मंच पर प्रस्तुति दे रहे थे। कार्यक्रम के बीच स्वर्ण सिंह हुंदल नाम का एक पुलिस अधिकारी, जो उस वक्त डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस यानी डीएसपी था, मंच पर पहुंचा। उसने दिलशाद से अपनी पसंद का एक गाना गाने की मांग की। बताया जाता है कि यह गाना किसी दूसरे कलाकार का था। दिलशाद ने वह गाना गाने से इनकार कर दिया। वह गाना उनके गायन संग्रह का हिस्सा नहीं था और उन्होंने अधिकारी को यह बात समझाने की कोशिश की। लेकिन एक कलाकार का यह जवाब स्वर्ण सिंह हुंदल को नागवार गुजरा।
एके 47 से मारी गोली
आरोप है कि इसके बाद हुंदल ने अपनी AK-47 निकाली और मंच पर ही दिलशाद अख्तर को गोली मार दी। कुछ ही पलों में जिस मंच पर दिलशाद की बुलंद आवाज गूंज रही थी, वहीं उनकी जिंदगी खामोश हो गई। इस मामले में स्वर्ण सिंह हुंदल को पुलिस सेवा से बर्खास्त किया गया और उसे जेल भी जाना पड़ा। हालांकि, बाद में पुलिस अधिकारियों ने उसे दोबारा सेवा में बहाल कर दिया। वह 2002 में डीएसपी के पद से रिटायर हुआ। बाद में उसकी मौत आत्महत्या से हुई। उसकी आत्महत्या का साल अलग-अलग रिपोर्टों में 2008 और 2012 बताया गया है।
अमर सिंह चमकीला की हत्या के कुछ ही समय बाद हुई थी ये घटना
जिस मंच पर कुछ पल पहले उनकी आवाज गूंज रही थी, वहीं देखते ही देखते मातम पसर गया। सिर्फ 29 साल की उम्र में दिलशाद अख्तर की हत्या ने पूरे पंजाब और संगीत जगत को हिला दिया। अमर सिंह चमकीला की हत्या के कुछ ही वर्षों बाद हुई इस घटना ने एक बार फिर पंजाब के उस दौर की भयावह तस्वीर सामने रख दी, जब बंदूक, हिंसा और सत्ता का डर आम जिंदगी के साथ-साथ कलाकारों की दुनिया पर भी भारी पड़ रहा था।


