ट्विशा शर्मा केस ने ताजा किए सेलिना जेटली के जख्म, लोगों से की अपील- अगर आपकी बेटी…
सेलिना जेटली ने ट्विशा शर्मा केस पर पोस्ट लिखा है। बताया कि बंद दरवाजों के पीछे हिंसा ऐसी होती है कि कई बार लोगों को बाहर से सब खूबसूरत दिखता है पर इंसान अंदर खोखला हो रहा होता है।

सेलिना जेटली ने ट्विशा शर्मा केस के बहाने घरेलू हिंसा और महिलाओं के शोषण पर पोस्ट लिखा है। उन्होंने अपनी स्थिति को उससे जोड़ा और बताया कि कैसे वह अंदर ही अंदर घुटती रही हैं। सेलिना ने मां-बाप से रिक्वेस्ट की कि अगर उनकी बेटी मदद का हाथ बढ़ाए तो उसे वापस ले आएं। बता दें कि सेलिना जेटली अपने पति पीटर हॉग पर शोषण के कई गंभीर आरोप लगा चुकी हैं। उनके तलाक का केस कोर्ट में है।
हर जख्म शरीर पर नहीं होता
सेलिना लिखती हैं, शादी जरूरी ही नहीं हमेशा खुशहाल ही हो। कभी-कभी सबसे बुरी हिंसा वो होती है जिसे कोई देख नहीं पाता। ट्विशा शर्मा के दिल तोड़ने वाले मामले ने सबको झकझोर दिया है। एक पढ़ी-लिखी, खूबसूरत और काबिल लड़की, जिसकी जिंदगी धीरे-धीरे मानसिक प्रताड़ना, अकेलेपन, दर्द और बंद दरवाजों के पीछे होने वाली हिंसा में समा गई। सबसे दुखद बात ये रही कि जब उसका परिवार अपनी बेटी के लिए जवाब, पोस्टमार्टम और इंसाफ मांग रहा था, तब कुछ लोगों को पौधों में पानी न डाले जाने जैसी बातें ज्यादा परेशान कर रही थीं। यही तो डरावनी सच्चाई है। कई बार औरतों का दर्द इतना सामान्य मान लिया जाता है कि धीरे-धीरे उनकी तकलीफ लोगों को दिखनी ही बंद हो जाती है। शादी हमेशा हैपिली एवर आफ्टर नहीं होती। कभी-कभी सबसे खराब वॉइलेंस वो होती है जो किसी को दिखती नहीं। हर जख्म शरीर पर नहीं होता।
लोग सोचते हैं जिंदगी खूबसूरत है लेकिन...
कई बार यह अलग कर देना होता है। कभी-कभी यह आपकी दुनिया से आपको अलग करना होता है। कई बार आप परदेश में होते हैं जहां परिवार साथ नहीं होता, कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं होता, कहीं जाने का रास्ता नहीं बचता। कभी आपको ही ये महसूस कराया जाता है कि गलती आपकी है, आपका दर्द सिर्फ एक परेशानी है। कभी बंद दरवाजों के पीछे आपको बेइज्जत किया जाता है जबकि दुनिया सोचती है कि आपकी जिंदगी कितनी खूबसूरत है।
नहीं चाहती थी कि बच्चों को तकलीफ हो
मेरे केस में मेरे माता-पिता पहले ही चल बसे थे, मैं फाइनैंशियली इंडिपेंडेंट नहीं थी और सबसे बड़ी बात मेरे तीन छोटे बच्चे थे। बहुत-सी महिलाओं की तरह मैं भी जरूरत से ज्यादा समय तक उस रिश्ते में बनी रही क्योंकि मुझे लगता था कि परिवार को बचाकर रखना ही सही है। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे बच्चों को तकलीफ हो। मेरे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी और सच कहूं तो मुझे यह मानने में शर्म थी कि मैं कितनी अकेली हो गई हूं।
खुद पर ही शक होने लगता है
अकेलापन समय के साथ मुझमें गहराई तक उतरता चला गया। घर की दीवारें भारी और खामोश लगने लगीं। पता नहीं चलता कि दिन कब गुजर जाते और फिर आपको अपने ही वजूद पर शक होने लगता। घर की दीवारें और ज्यादा खामोश और भारी लगने लगती हैं। आप खुद को समझाने लगते हैं कि बस किसी तरह जीते रहना ही जिंदगी है। जैसे मैं इस तस्वीर में हूं।
मां-बाप, परिवारवालों से अपील
मेरा दिल ट्विशा शर्मा के परिवार के साथ है… और उन हर महिलाओं के साथ भी, जो बंद दरवाजों के पीछे चुपचाप सब सह रही हैं। मां-बाप, दोस्त और परिवारवालों से बस इतनी गुजारिश है, अगर आपकी बेटी मदद के लिए हाथ बढ़ाए तो उसे वापस अपने पास ले आइए। शोषण को उसे निगलने मत दीजिए


