'कचौड़ी गली' में छिपा है बनारस की तवायफों का दर्द, क्या है इस 200 साल पुराने भोजपुरी गाने की कहानी?
'सेजिया पे लोटे काला नाग हो, कचौड़ी गली सून कैले बलमु...', इंस्टाग्राम पर आपने अपनी फीड पर अबतक ये गाना तो सुन ही लिया होगा। ये एक 200 साल पुराना भोजपुरी गीत है जिसे कोक स्टूडियो इंडिया ने आज की पीढ़ी तक पहुंचा दिया है। आइए जानते हैं क्या है इस भोजपुरी गीत की कहानी।

भोजपुरी गानों को अक्सर अश्लील और डबल मीनिंग गानों से जोड़कर देखा जाता है। इसकी वजह है, आज के वक्त में बन रहे कुछ गाने। पर कोक स्टूडियो इंडिया ने आप तक एक ऐसा भोजपुरी गाना पहुंचा दिया है, जिसके बोल आपके मन में बस जाएंगे। गाने की धुन आपके जहन में बस जाएगी। हम बात कर रहे हैं इंस्टा पर वायरल हो रहे गाने 'सेजिया पे लोटे काला नाग हो, कचौड़ी गली सून कैले बलमु' की। ये गाना सिर्फ एक गाना नहीं है, इस गाने में छिपा है बनारस की तवायफों का दर्द। भोजपुरी भाषा में गाए इस गीत की कहानी करीब 200 साल पुरानी है। आइए जानतें हैं इस गाने में छिपा है कैसा दर्द?
गाने में छिपी है पत्नियों की विरह
'कचौड़ी गली' पूर्वांचल और बनारस क्षेत्र की लोकदादरा शैली की रचना मानी जाती है।यह एक कजरी गीत है। इस गीत पर बनारस घराने की गायकी का प्रभाव माना जाता है। इस गीत की एक कड़ी जुड़ती है पहली एंग्लो-बर्मी वॉर से। ये युद्ध 1824-1826 के दौरान लड़ा गया था। इस जंग में अंग्रेजों ने भारत के कई इलाकों से मजदूरों, सैनिकों और आम पुरुषों को जबरदस्ती अपनी सेना में लड़ाई के लिए भरना शुरू किया था। पूर्वांचल के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में पुरुषों को रंगून भेजा जा रहा था। इस युद्ध पर भेजे गए बहुत से लोग कभी वापस नहीं आए और पीछे रह गईं उनकी पत्नियां। उन पत्नियों के दर्द से निकला कचौड़ी गली गीत।
तवायफ संस्कृति का हिस्सा बना 'कचौड़ी गली'
जैसे-जैसे समय बीता, ये भोजपुरी लोकगीत बनारस की तवायफ संस्कृति का हिस्सा बन गया। इस गाने की एक कड़ी इन तवायफों के दर्द से भी जुड़ती है। 1920 में जब भारत में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की, उसमें तवायफों ने भी अपना योगदान दिया। दावा किया जाता है कि तवायफें आंदोलन में समर्थन के लिए अपनी महफिलों की कमाई को आंदोलन के लिए दान कर देती थीं, उन लोगों ने महंगे गहने छोड़ लोहे की बेड़ियां पहनना शुरू कर दिया था। इतना ही नहीं, उस वक्त के क्रांतिकारियों को तवायफ छिपने के लिए पनाह भी देती थीं। अंग्रेज सरकार को जब क्रांतिकारियों के छिपे होने की खबर मिलती थी, तो वो उन्हें वहां से पकड़ कर ले जाती थीं। उन क्रांतिकारियों के वहां से ले जाने के दर्द को तवायफें इस गीत के जरिए बयां करती थीं।
तवायफ शब्द का मतलब आज के वक्त में काफी बदल गया है। लेकिन इतिहास में तवायफ को कला प्रेमी से जोड़कर देखा जाता था। तवायफों का भारत की संस्कृति और कला का संरक्षण करने में काफी योगदान रहा है। सदियों तक इन तवायफों ने शास्त्रीय संगीत, कथक, ठुमरी, गजल और शायरी जैसी कलाओं को जिंदा रखा।
200 साल पुराने इस गाने को ऐसे रखा गया जिंदा
कचौड़ी गली किसने लिखा, इसका जिक्र तो आपको शायद ही कहीं मिले, लेकिन 200 साल पुराने इस गाने को रसूला बाई, बड़ी मोतीबाई और सिद्धेश्वरी देवी जैसी प्रसिद्ध गायिकों ने ग्रामोफोन और आकाशवाणी के जरिए हर घर तक पहुंचाया। इसके बाद, मालिनी अवस्थी और मैथली ठाकुर ने इस गाने की परंपरा को जिंदा रखा। इतनी कोशिशों के बाद भी, ये गीत कहीं न कहीं गुम हो गया था। लेकिन अब कोक स्टूडियों ने इस गाने को एक बार फिर जीवित कर दिया है। ये गाना आज के वक्त में तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और देश के हर घर तक फिर से पहुंच रहा है।
कोक स्टूडियो भारत ने किसकी आवाज में रिलीज किया ये गाना?
कोक स्टूडियो ने रेखा भारद्वाज और लोकगीत गायक उत्पल उदित की आवाज में ये गाना हर घर तक पहुंचाया है। कोक स्टूडियो द्वारा रिलीज किए गए इस गीत में बनारस और पूर्वांचल से जुड़ी पारंपरिक लोक धुनों का इस्तेमाल किया गया है। वहीं, इस गाने को आधुनिक टच देने के लिए कहीं-कहीं पर इलेक्ट्रॉनिक पैड्स का भी इस्तेमाल किया गया है।
लेखक के बारे में
Harshita Pandeyहर्षिता पांडे पिछले सात साल से अधिक से डिजिटल मीडिया में काम कर रही हैं और वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान में एंटरटेनमेंट सेक्शन में काम कर रही हैं।
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मनोरंजन जगत की खबरों में दिलचस्पी रखने वाली हर्षिता पांडे को डिजिटल मीडिया में 7 साल से अधिक का अनुभव है। वर्तमान में, वह भारत के अग्रणी समाचार संस्थान 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में एंटरटेनमेंट सेक्शन में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर के पद पर काम कर रही हैं। अप्रैल 2024 से हर्षिता पांडे लाइव हिंदुस्तान के साथ जुड़ी हैं। यहां वह सेलेब्स इंटरव्यू लेती हैं, फिल्मों, टीवी शोज और ओटीटी सीरीज पर खबरें बनाने के साथ साथ उनकी समीक्षा और बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट्स पर काम करती हैं।
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