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महंगी होती शिक्षा

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, सीबीएसई ने 2020 की 10वीं और 12वीं की परीक्षा के लिए फीस में भारी वृद्धि की है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की श्रेणियों के विद्यार्थियों के लिए तो यह तीन गुना बढ़ोतरी बताई गई है। बोर्ड का कहना है कि फीस बढ़ाना जरूरी हो गया था, क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाएं संचालित करने से होने वाली उसकी ‘सरप्लस’ कमाई अब घट गई है। सामान्य वर्ग के छात्रों को जहां 750 की जगह अब 1,500 रुपये की फीस देनी होगी, वहीं एससी-एसटी छात्रों को 350 की जगह 1,200 रुपये देने होंगे। बोर्ड की फीस बढ़ोतरी के फैसले के पीछे कुछ आहटें अलग ढंग से भी सुनी जा सकती हैं, जिनका संबंध शिक्षा बजट में साल-दर-साल होती आ रही कटौतियों से जुड़ता है।

ये अंदेशे नए नहीं हैं कि केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, उनकी रुचि अब प्राइवेट सेक्टर की ओर है कि वह शिक्षा के क्षेत्र में निवेश करे। शिक्षा बजट में कटौतियां बताती हैं कि आगामी निवेश सरकारों या सरकारी संस्थाओं द्वारा नहीं होंगे। या तो वे विशुद्ध निजी स्वामित्व के होंगे या पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी, यानी पीपीपी की शक्ल में। एक बड़ी चिंता यह है कि शिक्षा का जिस तेजी से कॉरपोरेटीकरण हो रहा है, उसके चलते कहीं गरीब शिक्षा के भव्य, महंगे और आलीशान सिस्टम से बाहर न कर दिए जाएं।

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  • Web Title:hindustan cyber sansar column 16th August