
युवराज सिंह को कैंसर होने पर जब डॉक्टर ने कहा था- आपके पास बस 3-6 महीने की जिंदगी, क्या था रिएक्शन
अगर दृढ़ इच्छा शक्ति हो, जूझने का माद्दा हो और चुनौती स्वीकार करने के लिए हद से ज्यादा जुनून तो नामुमकिन कुछ भी नहीं। मौत तक को मात दी जा सकती है। सब कुछ छूटने का भय सामने खड़ा हो लेकिन उम्मीद का अटूट दामन हो तो जिंदगी मुस्कुरा सकती है। युवराज सिंह पर ये सभी लाइनें सटीक बैठती हैं।
अगर दृढ़ इच्छा शक्ति हो, जूझने का माद्दा हो और चुनौती स्वीकार करने के लिए हद से ज्यादा जुनून तो नामुमकिन कुछ भी नहीं। मौत तक को मात दी जा सकती है। निराशा के अंधेरे में भी रोशनी जगमगा सकती है। सब कुछ छूटने का भय सामने खड़ा हो लेकिन उम्मीद का अटूट दामन हो तो जिंदगी मुस्कुरा सकती है। युवराज सिंह पर ये सभी लाइनें सटीक बैठती हैं। उनकी जिंदगी अपने आप में फिल्मी है। उनका जज्बा खुद को ढांढस या हौसला देना नहीं है, बल्कि काल के कपाल पर लिखने का असल माद्दा है।
असल जीवन में खींच दी ऋषिकेश मुखर्जी के ‘आनंद’ से बड़ी लकीर
कल्पना कीजिए कि किसी को अचानक पता चलता है कि उसे कैंसर है। डॉक्टर उसे कह दे कि आपके पास जीने के लिए सिर्फ 3 से 6 महीने है। तब किसी की प्रतिक्रिया क्या होगी? सबसे आदर्श रूप तो महान फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी की कालजयी फिल्म 'आनंद' के मुख्य किरदार की वो जिंदादिली की घोषणा हो सकती है- जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए बाबू मोशाय। लेकिन युवराज सिंह ने तो काल्पनिक आनंद से भी कहीं बड़ी रेखा खींच दी। अब उन्होंने उन रोंगटे खड़े कर देने वाले पलों का किस्सा साझा किया है।
केविन पीटरसन से बातचीत में युवराज सिंह का खुलासा
इंग्लैंड के पूर्व कप्तान केविन पीटरसन के साथ बातचीत में युवराज सिंह ने कैंसर के खिलाफ अपनी जंग पर खुलकर बात की। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें डर लग रहा था कि वह शायद नहीं बच पाएंगे। डॉक्टरों ने उनसे कह दिया कि उनके पास जीने के लिए सिर्फ 3 से 6 महीने हैं। अब आपको फैसला करना है कि इस समय में आप क्रिकेट खेलना चाहेंगे या इलाज कराना।
'जीने के लिए सिर्फ 3 से 6 महीने, अब फैसला करो क्या करोगे?'
युवराज ने बताया, 'मैं ऑस्ट्रेलिया टूर पर जाना चाहता था क्योंकि मैंने टेस्ट क्रिकेट में जगह पाना अभी शुरू ही किया था। मैं रिटायर होना नहीं चाहता था और मैं इसका (टेस्ट में शुरुआत) 7 साल से इंतजार कर रहा था। आपको पता है कि मैं 40 टेस्ट मैचों में 12वां खिलाड़ी रहा हूं। मैं ऑस्ट्रेलिया टूर पर जा रहा था और फीजियो मेरे पास आए और कहा कि आप नहीं जा रहे हो। तब सीधी सी बात है कि मैंने डॉक्टर से बात की। उन्होंने कहा कि आपके पास जीने के लिए सिर्फ 3 से 6 महीने हैं। अब आप फैसला करो कि आप क्रिकेट खेलना चाहते हो या इलाज कराना।'
दिल-फेफड़े की बीच बढ़ रहा ट्यूमर हार्ट अटैक को दे रहा था न्योता
युवराज सिंह ने आगे बताया, ‘ट्यूमर मेरे फेफड़े और दिल के बीच में था और वह दिल की नसों को दबा रहा था। इसलिए डॉक्टरों ने कहा कि अगर आप कीमोथेरेपी नहीं कराते हैं तब आपको हार्ट अटैक आ सकता है। और उसके बाद उन्होंने मुझे इलाज के लिए भेज दिया।’
डॉक्टर के एक शब्द ने किया संजीवनी का काम
युवराज सिंह ने बताया कि जब वह कैंसर का इलाज कराने गए तब एक डॉक्टर की कही एक बात ने उनमें एक नई ही हिम्मत, भरोसा और उम्मीद का संचार किया। उन्होंने कहा, ‘जब मैं अस्पताल में घुसा तब डॉक्टर के शब्द मुझे आज भी याद हैं। मेरे सारे टेस्ट हो गए। उन्होंने कहा- आप एक ऐसे शख्स के तौर पर बाहर निकलेंगे जैसे उसे कभी कैंसर हुआ ही न हो। डॉक्टर की तरफ से हौसला देने वाले वो पहले शब्द थे।’

युवराज ने दिखाया, चैंपियन तो चैंपियन ही होता है
उसके बाद तो जो हुआ वो इतिहास है। युवराज सिंह ने अपने जज्बे और डॉक्टरों के इलाज की बदौलत कैंसर को आखिरकार मात दे ही दी। बीमारी से जूझते हुए भी 2011 में भारत को विश्व चैंपियन बनाने वाला जांबाज खिलाड़ी मौत से लड़कर भी चैंपियन बना।






