इस बल्लेबाज ने दलीप ट्रॉफी के फाइनल में जड़ा था तिहरा शतक, ईशान किशन से भी अद्भुत थी उनकी पारी

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1987 दलीप ट्रॉफी फाइनल में नॉर्थ जोन के शानदार प्रदर्शन ने मुकाबले का रुख ही बदल दिया। उनके सलामी बल्लेबाज ने 720 मिनट तक बल्लेबाजी की, 471 गेंदों का सामना किया और 30 चौके व छह छक्के लगाए। जब ​​वह 320 रन बनाकर आउट हुए, तब तक नॉर्थ जोन 868 रन बना चुकी थी। यह बल्लेबाज कोई और नहीं बल्कि रमन लांबा थे।

raman lamba and ishan kishan
रमन लांबा और ईशान किशन (फाइल फोटो)

चेन्नई में खेला जा रहा दलीप ट्रॉफी का फाइनल मुकाबला एक के बाद एक धमाके के कारण ऐतिहासिक होता जा रहा है। एक तरफ टूर्नामेंट में वैभव सूर्यवंशी का क्रेज रहा, वहीं फाइनल मुकाबले में 15 वर्षीय वंडर बॉय के इतर कई खिलाड़ी उभर कर सामने आए। कुमार कुशाग्र ने शतक जड़ा, शिखर मोहन ने कमाल का प्रदर्शन किया और 85 रन बनाए। लेकिन जो काम कप्तान ईशान किशन ने किया वह ऐतिहासिक रहा। ईस्ट जोन के कप्तान ने सुपरस्टार्स से भड़ी साउथ जोन की टीम के बड़े तेज गेंदबाजों और स्पिनरों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने पूरे मैच में इस तरह से बल्लेबाजी की कि फील्डिंग टीम खुद- बखुद कह सकती थी कि क्या खिलाड़ी है यार। जब तक शरीर ने ईशान को रुकने के लिए मजबूर नहीं किया, तब तक वे खेलते रहे। आलम ये रहा कि थके, रिटायर हर्ट हुए और फिर दोबारा भी बल्लेबाजी करने आए। सोमवार को चेपॉक में 111 रन से आगे खेलते हुए, पूर्वी जोन के कप्तान ने प्रतियोगिता में अपना पहला दोहरा शतक बनाया और आखिरकार 270 रन पर आउट हुए। यह एक ऐसी पारी थी जो फाइनल में लगभग हर दूसरे बल्लेबाज को धराशायी कर सकती है। लेकिन इतनी बड़ी भी नहीं कि उस स्कोर तक पहुंच सके जो लगभग चार दशकों से शीर्ष पर कायम है।

रमन लांबा ने खेली थी 320 रनों की ऐतिहासिक पारी

ईशान किशन ने यशस्वी जायसवाल के 266 रनों को पीछे छोड़ते हुए दुलीप ट्रॉफी फाइनल में दूसरा सबसे बड़ा स्कोर बनाया, लेकिन रिकॉर्ड से 50 रन पीछे रह गए। फाइनल तो दूर दलीप ट्रॉफी के किसी भी मैच में किसी भी बल्लेबाज ने इससे अधिक रन नहीं बनाए हैं। यह रिकॉर्ड 1987 में तब बना था जब वेस्ट जोन ने अंशुमन गायकवाड़ के 216 रनों की बदौलत 444 रन बनाए थे। नॉर्थ जोन के शानदार प्रदर्शन ने मुकाबले का रुख ही बदल दिया। उनके सलामी बल्लेबाज ने 720 मिनट तक बल्लेबाजी की, 471 गेंदों का सामना किया और 30 चौके व छह छक्के लगाए। जब ​​वह 320 रन बनाकर आउट हुए, तब तक नॉर्थ जोन 868 रन बना चुकी थी। यह दलीप ट्रॉफी के इतिहास में एकमात्र 800 से अधिक का स्कोर है। मैच ड्रॉ रहा, लेकिन पहली पारी में मिली बढ़त ने नॉर्थ जोन को खिताब दिला दिया। 320 रनों की ऐतिहासिक पारी 1987 के दलीप ट्रॉफी फाइनल में खेलने वाला यह खिलाड़ी कोई और नहीं बल्कि रमन लांबा थे। उन्होंने दलीप ट्रॉफी के उस संस्करण में रिकॉर्ड 659 रन बनाए। ईशान किशन की 270 रनों की पारी ने उन्हें एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। आकाश चोपड़ा ने क्रिकइन्फो के अपने कॉलम में रमन लांबा के बारे में एक बात कही। उन्होंने बताया "एक बार की बात है, जब उन्होंने दिलीप ट्रॉफी के एक मैच में तिहरा शतक बनाया और आउट होने के बाद इतने निराश हुए कि उन्होंने ड्रेसिंग रूम का शीशा तोड़ दिया। सालों बाद, हालांकि मैं उस घटना के बारे में उनसे पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, लेकिन मैंने उनसे तिहरा शतक बनाने पर उनकी प्रतिक्रिया के बारे में जरूर पूछा। यकीन करना मुश्किल है, लेकिन वे चौहरा शतक बनाने का मौका चूकने से बेहद दुखी थे। उनका मानना ​​था कि इससे उनके करियर में बहुत बड़ा बदलाव आ सकता था। मैं बचपन से ही रनों के प्रति उनकी अटूट भूख और खेल के विश्लेषण के उनके निर्मम तरीके के बारे में सुनता आया हूं, जिसमें वे अक्सर अपनी उपलब्धियों को कमतर आंकते थे।"

घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन, इंटरनेशनल में नहीं दिखा दम

रमन लांबा के ने 1986 में इंग्लैंड दौरे से बिना कोई अंतरराष्ट्रीय मैच खेले लौटने के बाद जयपुर में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अपने पहले वनडे मैच में 53 गेंदों पर 64 रन बनाए । उसी छह मैचों की सीरीज में उन्होंने दिल्ली में 74 और राजकोट में 102 रन बनाए। लांबा ने 55.60 की औसत से 278 रन बनाए और भारत की 3-2 से जीत में उन्हें प्लेयर ऑफ द सीरीज चुना गया। उस शुरुआत से एक लंबे अंतरराष्ट्रीय करियर की उम्मीद जगी थी। लेकिन लांबा ने सिर्फ चार टेस्ट मैच खेले, जिनमें उन्होंने 102 रन बनाए और 32 वनडे मैच खेले, जिनमें उन्होंने 783 रन बनाए। भारत के लिए उनका आखिरी मैच 1989 में था, जब उन्हें अपने करियर के चरम पर होना चाहिए था। घरेलू क्रिकेट ने यह दिखाना जारी रखा कि भारत किस दौर से आगे निकल चुका है। लांबा ने अपने प्रथम श्रेणी करियर में 53.84 की औसत से 8,776 रन बनाए, जिनमें 31 शतक शामिल थे।

किशन की 250 रनों की पारी आधुनिक दलीप ट्रॉफी फाइनल की महान पारियों में से एक मानी जाएगी। लेकिन इसने एक ऐसे रिकॉर्ड को फिर से ताजा कर दिया है जो 1987 से अब तक कायम था।

Vimlesh Kumar Bhurtiya

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विमलेश कुमार भुर्तिया (Vimlesh Kumar Bhurtiya): खेल पत्रकार

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विमलेश कुमार भुर्तिया पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान में स्पोर्ट्स टीम में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई की है।

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