जलालत से बचने के लिए मोहसिन नकवी बने ‘ट्रॉफी चोर 2.0’, मंच पर मुंह लटकाए खड़े रहे और फिर...
पाकिस्तान में मिल रही जलालत से बचने के लिए मोहसिन नकवी ‘ट्रॉफी चोर 2.0’ बन गए, जिससे भारतीय टीम को ट्रॉफी तो नहीं मिली, लेकिन उनकी आलोचना लाइव टेलीविजन पर जरूर हुई। वे मंच पर मुंह लटकाए खड़े रहे और फिर निकल लिए।

वुमेंस एशिया कप 2026 की चैंपियन भारतीय टीम बनी, लेकिन भारत को ट्रॉफी नहीं मिली। एशियन क्रिकेट काउंसिल यानी एसीसी के चेयरमैन मोहसिन नकवी भारतीय टीम को ट्रॉफी देने के लिए मंच पर काफी देर तक मुंह लटकाए और कभी कभार झूठी मुस्कान देते हुए खड़े रहे और जब भारत उनसे ट्रॉफी लेने के लिए तैयार नहीं हुआ तो वहां से तीन दो पांच हो गए। कप्तान हरमनप्रीत कौर और बाकी भारतीय खिलाड़ियों ने नकवी से ट्रॉफी इसलिए नहीं ली, क्योंकि मोहसिन नकवी, पाकिस्तान के गृह मंत्री और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के चीफ हैं, वह भारत के खिलाफ युद्ध की बात करते हैं और नफरत फैलाने का काम करते हैं। कोई और शख्स भारतीय टीम को ट्रॉफी देता तो भारत उसे कबूल करता, लेकिन नकवी को ट्रॉफी को लेकर फिर से ड्रामा कर दिया। इसके पीछे की वजह यह है कि उन्हें जलालत से बचना था, जिसमें वे कामयाब नहीं हो पाए।
दरअसल, बात पिछले साल सितंबर महीने से शुरू हुई थी, जब भारतीय पुरुष टीम ने एशिया कप के फाइनल में पाकिस्तान को हराया था। भारत ने लगातार तीन बार उस टूर्नामेंट में पाकिस्तान को मात दी थी। भारतीय खिलाड़ियों ने और कप्तान सूर्यकुमार यादव ने अपने प्रतिद्वंदियों से हाथ तक नहीं मिलाया था। वहीं, जब फाइनल भारत जीता तो एसीसी के चीफ के तौर पर ट्रॉफी देने के लिए मंच पर मोहसिन नकवी पहुंचे। भारतीय खिलाड़ी नकवी से ट्रॉफी लेने के लिए तैयार नहीं हुए और बिना ट्रॉफी के ही प्रेजेंटेशन सेरमनी खत्म हो गई। उधर, नकवी एशिया कप की ट्रॉफी लेकर स्टेडियम से चले गए। इस बीच भारतीय समर्थकों ने नकवी पर ट्रॉफी चोर का ठप्पा लगा दिया।
ऐसा ही इस बार भारत की महिला टीम ने किया और इस बार भी नकवी ट्रॉफी लेकर अपने साथ चल दिए, क्योंकि भारतीय टीम उनके हाथों ट्रॉफी लेने के लिए राजी नहीं थी। भारतीय समर्थक तो नकवी को पहले से ही ट्रॉफी चोर कह रहे थे और अब उनका नया नाम 'ट्रॉफी चोर 2.0' रख दिया गया। चाहते तो नकवी इस तरह की तुच्छ हरकत नहीं करते, लेकिन ऐसा लगता है कि उन्होंने जानबूझकर ऐसा किया। यहां तक कि बीसीसीआई के सचिव देवजीत सैकिया ने भी कहा था कि उन्होंने एसीसी से अपील की थी कि कोई अन्य अधिकारी, बीसीसीआई अधिकारी, मेजबान बोर्ड का अधिकारी या श्रीलंका बोर्ड का अधिकारी ट्रॉफी दे दे तो भारत उसे स्वीकार कर लेगा और इस तरह की फजीहत नकवी की नहीं होगी, लेकिन नकवी इसके लिए तैयार नहीं हुए।
अब सवाल उठता है कि मोहसिन नकवी को पता था कि मंच पर उनकी बेइज्जती होगी और भारतीय टीम उनसे ट्रॉफी नहीं लेगी तो उन्होंने जानबूझकर मंच पर जाना क्यों जरूरी समझा? इसका जवाब यह है कि उनको अपने यहां झेलनी पड़ रही जलालत से बचना था। एशिया कप की ट्रॉफी को मुद्दा शायद नकवी ने इसलिए बनाया, क्योंकि पाकिस्तान क्रिकेट टीम की जो हालत इस समय विश्व क्रिकेट में है और जो पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड अपने खिलाड़ियों और कोचों के साथ कर रही है, उसके लिए उनकी जमकर आलोचना पाकिस्तान की अवाम कर रही थी।
पाकिस्तान में हो रही उनकी आलोचना
अवाम की आलोचना से बचने और उनका ध्यान भटकाने के लिए मोहसिन नकवी फाइनल से ठीक पहले दुबई पहुंच गए और फाइनल में ट्रॉफी देने के लिए मंच पर भी चढ़ गए। एशियन क्रिकेट काउंसिल के चीफ के तौर पर उनकी ये हैसियत थी कि वे मंच पर होते, लेकिन जब जय शाह चेयरमैन थे तो यह एक अनरिटर्न नॉर्म था कि जीतने वाली टीम को उस बोर्ड का प्रेसिडेंट या सेक्रेटरी ट्रॉफी देगा। जय शाह के कार्यकाल में दो बार एशिया कप हुआ, लेकिन उन्होंने किसी टीम को ट्रॉफी नहीं दी थी। यहां तक कि यह भी नॉर्म नहीं है कि एसीसी चेयरमैन ही ट्रॉफी विजेता टीम को देगा।
पिछले साल भी अवाम को खुश करने के लिए मोहसिन नकवी ने ऐसा किया था, क्योंकि पाकिस्तान की टीम को जलालत झेलनी पड़ रही थी, क्योंकि कुछ ही दिनों के भीतर पाकिस्तान की टीम को तीन बार भारत ने हराया था। बोर्ड चेयरमैन की भी आलोचना हो रही थी। इस बार पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को फजीहत इसलिए हो रही थी, क्योंकि इंग्लैंड से बीच सीरीज से 7 खिलाड़ी और दो कोच वापस पाकिस्तान बुला लिए गए थे। आखिरी मैच में ऐसी टीम भेजी गई, जिस पर सवाल उठ रहे थे। ऐसा ओपनर था, जिसने एक साल से रेड बॉल मैच नहीं खेला था। उसका खाता भी आखिरी टेस्ट में नहीं खुल पाया था।



