यह पाखंड इतना बेशर्म है..., ऑस्ट्रेलिया के दोहरे रवैये पर जमकर बरसे गावस्कर, मैके की पिच पर फूटा गुस्सा

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बांग्लादेश बनाम ऑस्ट्रेलिया दो मैचों की टेस्ट सीरीज का दूसरा मैच दो दिनों के भीतर समाप्त हो गया। इस पर सुनील गावस्कर ने प्रतिक्रिया दी है और पिच को दोषी ठहराया है। साथ ही कंगारुओं के दोहरेपन को भी हाइलाइट किया है।

Sunil Gavaskar
सुनील गावस्कर (फाइल फोटो)

हाल ही में बांग्लादेश और ऑस्ट्रेलिया के बीच दो मैचों की टेस्ट सीरीज खेली गई। ऑस्ट्रेलियाई सरजमीं पर खेली गई इस सीरीज के पहले मुकाबले में बांग्लादेश ने बड़ा उलटफेर करते हुए ऑस्ट्रेलिया को ऐतिहासिक हार थमाई। हालांकि, दूसरे मैच में ऑस्ट्रेलिया ने ऐसी वापसी की कि मुकाबला दो दिनमें खत्म हो गया। यह टेस्ट क्रिकेट के इतिहास के सबसे छोटे टेस्ट मैचों में से एक रहा। मैके में खेले गए इस टेस्ट मैच के बाद, दी गई पिच पर सवाल उठे। ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड सवालों के घेरे में है। इस बीच पूर्व भारतीय कप्तान और दुनिया के महान क्रिकेटरों में से एक सुनील गावस्कर ने भी इस मैच में इस्तेमाल की गई पिच पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने एक बड़ा सा कॉलम लिखा है, जिसमें मौजूदा समय में इस तरह की बन रही पिचों और बल्लेबाजों की तकनीक पर लंबी चर्चा की गई है। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के दोहरे चरित्र पर सवाल खड़े किए हैं।

सुनील गावस्कर ने टेस्ट पिचों के आकलन में दिखाई देने वाले दोहरे मापदंड पर सवाल उठाया है। पैट कमिंस की अगुवाई वाली टीम ने एक पारी और 51 रनों से जीत हासिल करके दो टेस्ट मैचों की शृंखला में शानदार वापसी की। मेजबान टीम ने पूरे मैच में मेहमान टीम को एक बार भी 100 रन का आंकड़ा पार नहीं करने दिया। स्पोर्टस्टार कॉलम में लिखते हुए गावस्कर ने बताया कि हाल के वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में खेले गए चार टेस्ट मैच दो दिनों के भीतर समाप्त हो गए हैं। फिर भी इन मैचों में पिचों की वैसी आलोचना नहीं हुई है जैसी भारतीय पिचों की होती है, जब मैच समय से पहले समाप्त हो जाते हैं। पिछले साल एशेज सीरीज के दो टेस्ट मैच भी दो दिनों में समाप्त हो गए थे। ये मैच पर्थ और मेलबर्न में खेले गए थे।

गावस्कर ने इस प्रचलित तर्क पर सवाल उठाया कि बल्लेबाजों में अत्यधिक गति और उछाल का सामना करने की तकनीक की कमी होती है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि दोनों टीमें पार्टनरशिप करने में संघर्ष करती हैं, तो पिच को पूरी तरह से दोषमुक्त नहीं किया जा सकता।

गावस्कर ने अपने कॉलम में लिखा "तो, ऑस्ट्रेलिया में एक और टेस्ट मैच दो दिनों में समाप्त हो गया। पिछले कुछ वर्षों में ऐसा चार बार हो चुका है। और अभी तक हमें उन उछाल भरी पिचों की कोई आलोचना सुनने को नहीं मिली है जो ऐसे परिणाम देती हैं। बहाने तो ताबड़तोड़ आने लगेंगे। 'अरे, मैदान के प्रबंधक, माफ कीजिए, पिच के कार्यकारी से गलती हो गई। उन्होंने मौसम के पूर्वानुमान के अनुसार काम किया, जिसमें गर्म मौसम की भविष्यवाणी की गई थी, इसलिए उन्होंने थोड़ी अधिक घास छोड़ दी। और इसी वजह से पिच पर अत्यधिक उछाल आया।' या फिर क्रिकेट से जुड़ा एक और बहाना कि बल्लेबाजों के पास उछाल से निपटने की तकनीक नहीं थी। इसमें पिच की कोई गलती नहीं थी। अगर घरेलू टीम के बल्लेबाजों ने अच्छा प्रदर्शन किया होता तो इस आखिरी बहाने को कुछ हद तक स्वीकार किया जा सकता था, लेकिन जब घरेलू बल्लेबाज भी एक रन या एक अच्छी साझेदारी नहीं बना पा रहे हैं, तो इससे पिच के बारे में क्या पता चलता है?"

1983 विश्व कप विजेता ने यह भी कहा कि शृंखला का पहला मैच हारने के बाद ऑस्ट्रेलिया का तेज पिच का सहारा लेना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि इससे यह मिथक टूट गया कि सेना देशों की पिचें उनकी ताकत के अनुसार तैयार नहीं की जातीं। गावस्कर ने अपने लेख में आगे लिखा "मैके की पिच कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। पहले टेस्ट में बांग्लादेश के हाथों ऑस्ट्रेलिया की करारी हार के बाद, वे एक ऐसी पिच तैयार करने वाले थे जो तेज और उछाल भरी हो। और, जाहिर है, वे दावा करेंगे कि ग्राउंड्समैन ने यह सब अपनी मर्जी से किया था और टीम प्रबंधन की तरफ से कोई निर्देश नहीं थे। हम सब जानते हैं कि असलियत क्या है। फर्क सिर्फ इतना है कि भारतीय प्रबंधन खुलकर अपनी गेंदबाजी की ताकत के अनुरूप पिचें चाहता है, जबकि पुराने दिग्गज लोग दबी जबान से इशारे करके अपनी मनचाही पिचें बनवा लेते हैं।"

गावस्कर ने और क्या कहा?

पूर्व सलामी बल्लेबाज ने तेज और स्पिन गेंदबाजी के लिए अपनाए जाने वाले अलग-अलग मानकों पर भी निशाना साधा। लिखा- "आज भी यह रूढ़िवादी सोच हावी है कि बल्लेबाज का मूल्यांकन तेज, उछाल भरी पिचों पर उसकी बल्लेबाजी के आधार पर किया जाना चाहिए, जबकि कोई यह सवाल भी नहीं उठाता कि स्पिन गेंदबाजी खेलने के लिए आवश्यक कौशल, फुटवर्क की कमी को नकारात्मक क्यों नहीं माना जाता और रनों की कमी का सारा दोष पिच पर डाल दिया जाता है। स्पिन खेलना बल्लेबाजी कौशल की असली परीक्षा है। क्योंकि इसमें कुशल फुटवर्क और सटीक हैंड मूवमेंट की आवश्यकता होती है, जबकि तेज गेंदबाजी खेलने में मूल रूप से केवल दो ही मूवमेंट होते हैं, या तो आगे का पैर या पीछे का पैर।" उन्होंने आगे लिखा “फिर भी उपमहाद्वीप में साधारण रिकॉर्ड वाले कई खिलाड़ियों को पुरानी शक्तियों वाले देश महान मानते हैं। हैरानी की बात यह है कि उनके तेज गेंदबाजों का मूल्यांकन कभी भी उपमहाद्वीप की तथाकथित धीमी पिचों पर विकेट न ले पाने के आधार पर नहीं किया जाता। तेज पिचों पर रन न बनाने वाले बल्लेबाजों को तो महत्व नहीं दिया जाता, लेकिन धीमी पिचों पर विकेट न लेने वाले उनके तेज गेंदबाजों को आज भी महान कहा जाता है।”

गावस्कर ने लिखा "मैच रेफरी द्वारा मैके पिच की रिपोर्ट और रेटिंग देखना दिलचस्प होगा। रेफरी आमतौर पर सत्ताधारी मीडिया से वाहवाही बटोरने की होड़ में रहते हैं, इसलिए अगर मैके पिच को कोई नकारात्मक रेटिंग न मिले, जैसा कि हमने हाल के वर्षों में इसी तरह के दो दिवसीय मैचों में देखा है, तो आश्चर्य नहीं होगा। लेकिन देखिए, अगर भारत में कोई मैच तीन दिन में खत्म होता है, तो पिचों, बीसीसीआई और भारतीय क्रिकेट के बारे में तरह-तरह की अपमानजनक रिपोर्टें और आरोप लगाए जाएंगे। यह पाखंड इतना बेशर्म है कि स्तब्ध रह जाता है। तेज गेंदबाजी के सामने अक्षमता का वही पुराना बहाना सामने आएगा। जब विदेशी बल्लेबाज स्पिन गेंद नहीं खेल पाते, तब कोई ऐसा नहीं कहता। तब तो क्षमता की कमी नहीं होती, बल्कि पिच में ही कुछ गड़बड़ होती है।"

उन्होंने आगे लिखा "जैसा कि मैंने पहले भी कहा, दोहरा मापदंड सरासर चौंकाने वाला है। देखते हैं मैच रेफरी मैके पिच को क्या रेटिंग देते हैं। लेकिन भारतीय प्रशंसकों, ज्यादा उम्मीद न रखें। ऑस्ट्रेलियाई पहले से ही निश्चिंत हैं, क्योंकि उन्हें चिंता करने की कोई बात नहीं है।"

Vimlesh Kumar Bhurtiya

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विमलेश कुमार भुर्तिया (Vimlesh Kumar Bhurtiya): खेल पत्रकार

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विमलेश कुमार भुर्तिया पिछले 4 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान में स्पोर्ट्स टीम में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई की है।

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