छतीसगढ़ के गांवों में पादरियों की एंट्री बैन, सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत

Feb 17, 2026 11:14 am ISTSudhir Jha लाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली, भाषा
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सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर कथित रोक से संबंधित होर्डिंग के सिलसिले में हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका सोमवार को खारिज कर दी।

छतीसगढ़ के गांवों में पादरियों की एंट्री बैन, सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर कथित रोक से संबंधित होर्डिंग के सिलसिले में हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका सोमवार को खारिज कर दी। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस तरह के होर्डिंग को हटाने के अनुरोध वाली दो अलग-अलग याचिकाओं का पिछले साल अक्टूबर में निपटारा कर दिया था।

हाई कोर्ट ने शीर्ष अदालत के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि लालच या धोखाधड़ी के जरिए धर्मांतरण पर लगाम लगाने के लिए होर्डिंग लगाने के कदम को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता के सामने सुनवाई के लिए आई।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने पादरियों पर कथित हमलों से संबंधित एक अलग मामले का हवाला दिया, जो सबसे बड़ी अदालत के सामने लंबित है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हाई कोर्ट के सामने दायर याचिका सीमित थी, लेकिन याचिकाकर्ता ने अब सर्वोच्च न्यायालय में दायर अर्जी में कई नये तथ्य और दस्तावेज शामिल किए हैं। दलीलें सुनने के बाद पीठ ने याचिका खारिज कर दी।

क्या है विवाद और कहा कहा था हाई कोर्ट ने

गौरतलब है कि कांकेर जिले के अनेक ग्राम पंचायतों ने गांवों में बाहरी धर्म प्रचारकों के प्रवेश पर रोक को लेकर बोर्ड लगाए थे। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि परंपराओं के संरक्षण के लिए पेसा कानून के अंतर्गत ग्राम सभाएं ऐसे निर्णय लेने के अधिकार रखती हैं। हाई कोर्ट ने कहा था, 'संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग जबरदस्ती, लालच या धोखे के माध्यम से किए जाने पर गंभीर चिंता का विषय बन गया है। सामूहिक या प्रेरित धर्मांतरण की घटनाएं न केवल सामाजिक सौहार्द को प्रभावित करती हैं, बल्कि स्वदेशी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान को भी चुनौती देती हैं।'

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सुधीर झा | वरिष्ठ पत्रकार और स्टेट टीम लीड
(दिल्ली-एनसीआर, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश)


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