महिला को निजता का अधिकार है तो उसके पति को…; तलाक के मामले में HC ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया

Feb 13, 2026 05:24 pm ISTSubodh Kumar Mishra लाइव हिन्दुस्तान, रायपुर
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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा है कि व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग सहित निजी इलेक्ट्रॉनिक कम्यूनिकेशन को वैवाहिक विवादों में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। हाई कोर्ट की पीठ ने एक जटिल वैवाहिक विवाद मामले की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया।

महिला को निजता का अधिकार है तो उसके पति को…; तलाक के मामले में HC ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने कहा है कि व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग सहित निजी इलेक्ट्रॉनिक कम्यूनिकेशन को वैवाहिक विवादों में साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की अध्यक्षता वाली हाई कोर्ट की पीठ द्वारा एक जटिल वैवाहिक विवाद मामले की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया गया।

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, वैवाहिक विवादों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता के प्रश्न पर जस्टिस राजपूत ने कहा कि निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है। इसे निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट का यह आदेश महत्वपूर्ण है क्योंकि यह डिजिटल युग में पारिवारिक मुकदमों के बदलते स्वरूप को दर्शाता है। साथ ही, निजता के अधिकार और न्याय के अधिकार के बीच संतुलन की न्यायिक व्याख्या भी सामने आई है।

रायपुर निवासी ने पारिवारिक अदालत में अपनी पत्नी के खिलाफ तलाक की याचिका दायर की। पति ने कहा कि अन्य व्यक्तियों के साथ उसकी पत्नी की व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग उसके आरोपों को साबित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। उसने अदालत से इन दस्तावेजों को रिकॉर्ड में लेने की अनुमति मांगी।

हालांकि, महिला ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए आरोप लगाया कि उसके पति ने उसका मोबाइल फोन हैक करके उसमें से सामग्री चुरा ली। इससे उसके निजता के अधिकार का उल्लंघन हुआ। पारिवारिक न्यायालय ने पति की याचिका स्वीकार कर ली, जिसके खिलाफ उसकी पत्नी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।

जस्टिस राजपूत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त निजता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन निरपेक्ष नहीं है। निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार भी न्याय व्यवस्था का एक मूलभूत तत्व है। यदि प्रासंगिक साक्ष्य को केवल निजता के आधार पर छिपाया जाता है, तो न्यायालय सत्य तक नहीं पहुंच पाएगा।

हाई कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 14 का हवाला दिया। इसमें कहा गया है कि पारिवारिक न्यायालय किसी भी ऐसे दस्तावेज या सामग्री को रिकॉर्ड में ले सकता है जो विवाद के प्रभावी समाधान में सहायक हो। भले ही वह सामान्य साक्ष्य नियमों के तहत तकनीकी रूप से स्वीकार्य न हो। इसका मतलब पारिवारिक मामलों में न्यायालय का लक्ष्य तकनीकी बाधाओं से ऊपर उठकर सत्य तक पहुंचना है।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां महिला को निजता का अधिकार है, वहीं उसके पति को निष्पक्ष सुनवाई और अपने दावे को साबित करने का अधिकार है। हाई कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखना उसका कर्तव्य है। यदि डिजिटल साक्ष्य विवाद से सीधे तौर पर संबंधित है तो उसे केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उसे कैसे प्राप्त किया गया था। इसके बाद हाई कोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी।

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सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के 'डीडी न्यूज' से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।

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