कौन हैं IPS बजरंग प्रसाद, पिता के हत्यारों को दिलाई 10 साल की कैद, हिंदी मीडियम से क्रैक किया था UPSC
IPS Bajrang Prasad : 14 अगस्त का दिन आईपीएस बजरंग प्रसाद के लिए जिंदगी का सबसे यादगार दिन बन गया। पिता के हत्यारों को सलाखों के पीछे भेजने और उन्हें न्याय दिलाने का उनके जीवन का सबसे बड़ा ख्वाब पूरा हो गया।

IPS Bajrang Prasad : 14 अगस्त का दिन आईपीएस बजरंग प्रसाद के लिए जिंदगी का सबसे यादगार दिन बन गया। पिता के हत्यारों को सलाखों के पीछे भेजने और उन्हें न्याय दिलाने का उनके जीवन का सबसे बड़ा ख्वाब पूरा हो गया। उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के कलवारी थाना क्षेत्र के धोबहट गांव में आईपीएस बजरंग प्रसाद के पिता की हत्या के छह साल पुराने मामले में न्यायालय ने 9 अभियुक्तों को दोषी ठहराया। शुक्रवार को अपर सत्र न्यायाधीश ने सभी 9 दोषियों को 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। प्रत्येक दोषी पर 7,500 रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया। अपने जीवन का मकसद पूरा होने के बाद बजरंग प्रसाद ने सोशल मीडिया पर लिखा, 'आज पिताजी की हत्या के जुर्म में सभी 9 अभियुक्तों को प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश, बस्ती द्वारा गैर इरादतन हत्या के जुर्म में 10-10 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई और उन्हें जेल भेजा गया।'
2020 में किसान पिता की हत्या के बाद UPSC क्रैक कर IPS बनने की ठानी
बजरंग प्रसाद के पिता पेशे से किसान थे। उनके पिता खेती के साथ-साथ गांव के जरूरतमंद और कमजोर लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। साल 2020 में कुछ दबंगों ने बेरहमी से उनकी हत्या कर दी थी। इस दर्दनाक घटना ने उनके पूरे परिवार को दुख से भर दिया था। पिता के जाने के बाद बजरंग ने ठान लिया था वे अन्याय के खिलाफ आवाज बनेंगे और अगर वह कुछ बन जाएंगे तो किसी परिवार के साथ ऐसी घटना न हो। यहीं से UPSC को उन्होंने अपना जुनून बना लिया और आगे बढ़े। तमाम पारिवारिक संकटों, आर्थिक तंगी और हिंदी मीडियम बैकग्राउंड के बावजूद बजरंग ने अपने तीसरे प्रयास में यूपीएससी क्रैक कर 454वीं रैंक हासिल की और आज वे एक शानदार आईपीएस (IPS) अफसर हैं।
गांव से हुई शुरुआत और किसान पिता का वो सपना
बजंरग प्रसाद यादव मूल रूप से बस्ती जिले के धोबहट गांव के रहने वाले हैं। उनकी शुरुआती शिक्षा गांव के ही एक साधारण स्कूल से हुई, जिसके बाद उन्होंने एक प्राइवेट स्कूल से अपनी 10वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी की। बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी बजरंग ने इसके बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी (प्रयागराज) का रुख किया और वहां से मैथमेटिक्स में बीएससी (BSc) की डिग्री हासिल की।
एक बेहद साधारण किसान परिवार से आने के बावजूद उनके पिता का सपना था कि उनका बेटा एक बड़ा प्रशासनिक अधिकारी बने।
अनाज बेचकर भरी दिल्ली की फीस, मां बनीं सबसे बड़ा संबल
पिता की मृत्यु के बाद पूरा परिवार गहरे आर्थिक संकट में घिर गया था। दिल्ली में रहकर कोचिंग और पढ़ाई का खर्च उठाना बजरंग के लिए नामुमकिन सा हो गया था। ऐसी विपरीत स्थिति में उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और खेत की फसल अनाज बेचकर दिल्ली में अपनी कोचिंग की फीस जमा की। एक बार तो वह यूपीएससी मेन्स परीक्षा में सिर्फ 27 नंबर से असफल हो गए थे । रिजल्ट के बाद दुख तो हुआ लेकिन फिर से मजबूत होकर वह लगे रहे।
यूपीएससी (UPSC) परीक्षा हिंदी माध्यम से पास की
इस कठिन दौर में उनकी मां ने फोन पर लगातार उनका हौसला बढ़ाया और एक मजबूत दीवार की तरह खड़ी रहीं। दो प्रयासों में असफल रहने के बाद भी बजरंग ने अपने हौसले को टूटने नहीं दिया। उन्होंने अपनी गलतियों को सुधारा, हिंदी माध्यम को अपनी ताकत बनाया और तीसरे प्रयास 2023 में देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा में 454वीं रैंक लाकर अपने स्वर्गीय पिता के सपने को साकार कर दिखाया। बजरंग की यह कहानी आज देश भर के लाखों हिंदी मीडियम के छात्रों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बन चुकी है।


